Wednesday, November 4, 2026

अमेरिका के चुनाव परिणाम के मायने

अमेरिका के 2026 मध्यावधि चुनावों के नतीजे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका हैं: डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट—दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लिया है। यह “ब्लू वेव” कहे जाने वाले विपक्षी सुधार का संकेत है।प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों पर चुनाव हुआ; डेमोक्रेट्स ने बहुमत की 218 सीटों की सीमा पार कर ली है।सीनेट की 35 सीटें चुनी गईं; डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिकन से कम से कम सात सीटें जीतीं और सीनेट पर नियंत्रण हासिल किया।डेमोक्रेट्स ने टेक्सास, आयोवा, कंसास, ओहायो, नॉर्थ कैरोलिना, साउथ कैरोलिना और मेन जैसे रिपब्लिकन-मजबूत राज्यों में सीनेट सीटें जीतीं।
कई राज्यों में गवर्नर पद भी डेमोक्रेट्स को मिले; ओहायो में ट्रंप-समर्थित विवेक रामास्वामी को हार का सामना करना पड़ा।
हार के कारण
चुनावी सर्वेक्षणों में लगभग आधे मतदाताओं ने इसे ट्रंप के खिलाफ राय देने का मौका बताया, और लगभग तीन-चौथाई ने देश की दिशा से नाराजगी जताई।
प्रमुख कारण ये रहे:
ईरान युद्ध और सुरक्षा मुद्दे: ट्रंप की सैन्य नीति पर सवाल उठे और यह चुनावी नाराजगी का बड़ा कारण बना।
महंगाई और जीवन-यापन की लागत: ईंधन व रोज़मर्रा की कीमतों में बढ़ोतरी ने मतदाताओं को प्रभावित किया।
टैरिफ और आर्थिक चिंता: व्यापार नीतियों से जुड़ी अनिश्चितता ने भी असंतोष बढ़ाया।
रिपब्लिकन पार्टी की कमजोर उम्मीदवारी और आंतरिक कलह: कई मजबूत गढ़ों में पार्टी को अप्रत्याशित हार मिली।
ट्रंप पर असर
इस हार का मतलब ट्रंप का राष्ट्रपति पद खोना नहीं है—वे राष्ट्रपति बने रहेंगे—लेकिन उनकी विधायी शक्ति अब काफी सीमित हो जाएगी।
डेमोक्रेट-नियंत्रित हाउस ट्रंप के कानूनी एजेंडे को रोक सकता है और प्रशासन की जांच शुरू कर सकता है।
सीनेट पर नियंत्रण से डेमोक्रेट्स न्यायिक और प्रशासनिक नियुक्तियों को रोक या धीमा कर सकते हैं।
महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने का रास्ता खुल सकता है, हालांकि इसके लिए सीनेट में पदच्युति के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत अलग और कठिन स्थिति है।
आगे की राजनीति
यह नतीजा 2028 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले डेमोक्रेट्स को नैतिक और संगठनात्मक ताकत देता है, जबकि रिपब्लिकन पार्टी को नेतृत्व, संदेश और ट्रंप-केंद्रित रणनीति पर पुनर्विचार का दबाव है। ऐतिहासिक रूप से भी मध्यावधि चुनावों में राष्ट्रपति की पार्टी को हार आम रही है—पिछले 21 में से 19 बार ऐसा हुआ है—लेकिन इस बार का नुकसान दोनों सदनों में बहुमत खोने तक पहुंचना विशेष रूप से गंभीर है।
इन नतीजों का भारत पर असर मुख्यतः सकारात्मक लेकिन सीमित होगा: ट्रंप प्रशासन के एकतरफा टैरिफ और प्रतिबंधात्मक इमिग्रेशन कदमों पर कांग्रेस की निगरानी बढ़ेगी, जिससे भारत को व्यापार वार्ता में थोड़ी जगह मिल सकती है। लेकिन ट्रंप के पास कार्यकारी शक्तियां बनी रहेंगी, इसलिए तुरंत बड़ी राहत की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
व्यापार और टैरिफ
भारत के निर्यातकों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा अमेरिकी टैरिफ है। भारतीय उत्पादों पर शुल्क पहले 50% तक पहुंचा था, फिर अधिकांश सामान पर 18% हो गया; सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद वैश्विक आधार शुल्क 10% तक आ गया।
डेमोक्रेट-नियंत्रित कांग्रेस टैरिफ के अमेरिकी व्यापार, उपभोक्ताओं और सप्लाई चेन पर प्रभाव की जांच कर सकती है।
इससे ट्रंप की मनमानी टैरिफ नीति की राजनीतिक कीमत बढ़ सकती है और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता अधिक प्रतिबद्ध व अनुमानित हो सकती है।
फिर भी, कांग्रेस किसी मौजूदा टैरिफ को अपने आप रद्द नहीं कर सकती; इसके लिए कानूनी आधार और राष्ट्रपति की सहमति/वीटो की स्थिति मायने रखेगी।
H-1B और भारतीय पेशेवर
अमेरिका में काम करने वाले भारतीय आईटी पेशेवरों और भारतीय आईटी कंपनियों के लिए यह नतीजा सावधानीपूर्ण राहत का संकेत है। ट्रंप प्रशासन के H-1B पर $100,000 शुल्क के प्रस्ताव को अदालतों ने रोका है, और डेमोक्रेट कांग्रेस इसके आर्थिक प्रभाव पर अधिक जोर दे सकती है।
कांग्रेस सुनवाई, जांच और बजटीय दबाव से कुशल इमिग्रेशन पर प्रतिबंधों को धीमा कर सकती है।
लेकिन वीजा नियमों का बड़ा हिस्सा कार्यकारी निर्णय और नियम-निर्माण पर निर्भर है, इसलिए मौजूदा पाबंदियों में तुरंत बदलाव असंभावित है।
भारतीय आईटी कंपनियों के लिए अमेरिकी टेक-खर्च, आउटसोर्सिंग बजट और वीजा नियम अब भी मुख्य जोखिम बने रहेंगे।
रूसी तेल और ऊर्जा
भारत की रूसी कच्चे तेल की खरीद द्विपक्षीय रिश्तों में एक जटिल मुद्दा बनी रहेगी। डेमोक्रेट-नियंत्रित कांग्रेस इस पर अधिक सख्त निगरानी कर सकती है, इसलिए यह क्षेत्र राहत के बजाय नई चुनौती भी बन सकता है।
दूसरी ओर, अगर मध्य पूर्व में तनाव घटता है और कच्चे तेल की कीमतें नरम पड़ती हैं, तो भारत के लिए आयात बिल, मुद्रास्फीति और रुपये पर दबाव कम हो सकता है।
रक्षा और रणनीतिक संबंध
भारत-अमेरिका रक्षा और रणनीतिक साझेदारी को इस चुनाव परिणाम से बुनियादी रूप से बदलने की संभावना नहीं है, क्योंकि विदेश नीति का बड़ा हिस्सा राष्ट्रपति और कार्यकारी एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र में रहता है।
हालांकि, कांग्रेस रक्षा सौदों, हथियार बिक्री, प्रशांत क्षेत्र की नीति और भारत-पाकिस्तान/कश्मीर संबंधी अमेरिकी रुख पर अधिक सवाल उठा सकती है। इससे नीति अधिक पारदर्शी हो सकती है, पर निर्णय प्रक्रिया धीमी या अधिक राजनीतिक भी हो सकती है।संक्षेप में, भारत के लिए सबसे बड़ा लाभ टैरिफ और H-1B संबंधी अनिश्चितता में कमी की संभावना है; सबसे बड़ा जोखिम रूसी तेल और व्यापार समझौते की शर्तों से जुड़ा है। 
अमेरिका में मूलनिवासी (NativeAmerican/Indigenous) उम्मीदवारों की जीत का मतलब है कि अमेरिकी राजनीति में ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे समुदायों की प्रतिनिधित्व-शक्ति बढ़ रही है। इस बार दो बड़े रिकॉर्ड बने: डेब हालैंड न्यू मेक्सिको की पहली मूलनिवासी महिला गवर्नर बनीं, और पेगी फ्लैनागन मिनेसोटा से पहली मूलनिवासी महिला अमेरिकी सीनेटर चुनी गईं।राजनीतिक मायने
यह जीत केवल प्रतीकात्मक नहीं है। फ्लैनागन की सीनेट जीत ने डेमोक्रेट्स को सीनेट बहुमत दिलाने में मदद की, इसलिए मूलनिवासी नेतृत्व अब संघीय विधायी निर्णयों में सीधे हिस्सेदार बना है।
नीति प्राथमिकताएं: भूमि अधिकार, जल अधिकार, जनजातीय संप्रभुता, स्वास्थ्य, शिक्षा और जलवायु न्याय जैसे मुद्दों को कांग्रेस व राज्य सरकारों में अधिक प्राथमिकता मिल सकती है।
गवर्नर की शक्ति: हालैंड की जीत का असर न्यू मेक्सिको की राज्य नीतियों—खासकर प्राकृतिक संसाधन, ऊर्जा और जनजातीय मामलों—पर अधिक सीधा होगा।
डेमोक्रेटिक गठबंधन: इन जीतों से डेमोक्रेट पार्टी का अल्पसंख्यक, महिला और प्रगतिशील मतदाता आधार मजबूत हुआ है।
बड़ा संदेश
इस चुनाव में 30 राज्यों से 225 से अधिक मूलनिवासी उम्मीदवार मैदान में उतरे, जो इस बात का संकेत है कि यह एक अलग-थलग जीत नहीं, बल्कि बढ़ती राजनीतिक भागीदारी की प्रवृत्ति है। इसका अर्थ यह भी है कि अमेरिकी लोकतंत्र में “प्रतिनिधित्व” अब केवल जनसंख्या-आधारित नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों की सत्ता में भागीदारी का मुद्दा बन रहा है।पेगी फ्लैनागन मिनेसोटा से अमेरिकी सीनेट के लिए चुनी गई पहली मूलनिवासी महिला हैं। वे डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता, मिनेसोटा की वर्तमान उपराज्यपाल और व्हाइट अर्थ नेशन (ओजिब्वे) की नागरिक हैं।
ऐतिहासिक जीत
2026 मध्यावधि चुनाव में फ्लैनागन ने रिपब्लिकन उम्मीदवार मिशेल टाफोया को हराया और सेवानिवृत्त हो रहीं डेमोक्रेट सीनेटर टीना स्मिथ की सीट बरकरार रखी। उनकी जीत ने डेमोक्रेट्स को सीनेट में बहुमत बनाए रखने में मदद दी और उन्हें अमेरिकी सीनेट की पहली मूलनिवासी महिला सदस्य बना दिया।
पृष्ठभूमि
फ्लैनागन का जन्म 22 सितंबर 1979 को हुआ और वे मिनेसोटा के सेंट लुईस पार्क से हैं। उनकी मां ने उन्हें अकेले पाला; परिवार को समय-समय पर खाद्य सहायता, मेडिकेड, चाइल्डकेयर सहायता और आवास सहायता का सहारा मिला।
वे व्हाइट अर्थ बैंड ऑफ ओजिब्वे की नागरिक हैं और स्वयं को व्हाइट अर्थ नागरिक तथा वुल्फ क्लैन की सदस्य बताती हैं।
उन्होंने मिनेसोटा विश्वविद्यालय से चाइल्ड साइकोलॉजी में स्नातक और अमेरिकन इंडियन स्टडीज़ में माइनर किया।
उनके पिता मार्विन मैनीपेनी व्हाइट अर्थ भूमि-अधिकार आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता थे।
राजनीतिक सफर
फ्लैनागन की राजनीतिक शुरुआत सामुदायिक संगठन और शिक्षा हिमायत से हुई। वे 2005 से 2009 तक मिनियापोलिस स्कूल बोर्ड की सदस्य रहीं और 25 वर्ष की उम्र में इस बोर्ड में चुनी जाने वाली सबसे कम उम्र की सदस्य बनीं।
2015 में वे मिनेसोटा हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में चुनी गईं।
2018 में गवर्नर टिम वाल्ज़ के साथ उपराज्यपाल चुनी गईं और 2019 से इस पद पर हैं।
वे मिनेसोटा में राज्य-स्तरीय कार्यालय जीतने वाली पहली मूलनिवासी महिला थीं।
नीतिगत प्राथमिकताएं
फ्लैनागन की छवि प्रगतिशील डेमोक्रेट के रूप में है। उनके चुनावी मुद्दों में सबके लिए मेडिकेयर, सार्वभौमिक चाइल्डकेयर, न्यूनतम मजदूरी को $17 प्रति घंटा करना, गर्भपात के अधिकारों की बहाली और ICE प्रणाली में बड़ा सुधार शामिल हैं।
उपराज्यपाल के रूप में उन्होंने मिनेसोटा की 11 जनजातीय राष्ट्रों के साथ परामर्श को अनिवार्य बनाने वाले कानून को आगे बढ़ाया; उनके कार्यकाल में जनजातीय भूमि की बहाली, लापता और हत्या के शिकार मूलनिवासी रिश्तेदारों के लिए पहला राज्य कार्यालय, तथा जनजातीय गांजा उद्योग को समर्थन जैसे कदम भी उठे।
मायने
इससे पहले अमेरिकी सीनेट में केवल चार पंजीकृत जनजातीय सदस्य—सभी पुरुष—शामिल हुए थे; फ्लैनागन की जीत इस असमानता को तोड़ती है। उनका चुनाव न केवल मूलनिवासी महिलाओं के प्रतिनिधित्व का ऐतिहासिक क्षण है, बल्कि सीनेट में जनजातीय संप्रभुता, भूमि-जल अधिकारों और मूलनिवासी समुदायों की नीतिगत प्राथमिकताओं को नई आवाज़ भी देगा।डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रमुख नेता अभी चक शूमर (सीनेट), हकीम जेफ्रीज़ (प्रतिनिधि सभा) और केन मार्टिन (डेमोक्रेटिक नेशनल कमिटी/DNC अध्यक्ष) हैं। 2026 के मध्यावधि चुनावों में पार्टी के दोनों सदनों पर कब्ज़े के बाद जेफ्रीज़ को अगले हाउस स्पीकर और शूमर को सीनेट मेजॉरिटी लीडर बनने की उम्मीद है।
हकीम जेफ्रीज़
हकीम जेफ्रीज़ न्यूयॉर्क से कांग्रेस सदस्य हैं और प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक दल के नेता हैं। डेमोक्रेट्स के हाउस बहुमत के बाद उन्हें अगला स्पीकर चुने जाने की संभावना है; ऐसा होने पर वे अमेरिकी इतिहास में हाउस के पहले काले स्पीकर बनेंगे।
उनकी प्राथमिकताओं में जीवन-यापन की लागत घटाना, स्वास्थ्य बीमा सब्सिडी बहाल करना, भ्रष्टाचार की जांच और ICE/CBP प्रणाली में सुधार शामिल हैं।
चक शूमर
चक शूमर न्यूयॉर्क के सीनेटर हैं और सीनेट में डेमोक्रेटिक दल के नेता हैं। नए कांग्रेस में उनसे सीनेट मेजॉरिटी लीडर के रूप में लौटने की अपेक्षा है।
शूमर का जोर महंगाई, आवास, स्वास्थ्य और रोज़मर्रा के खर्चों पर राहत पर है; साथ ही वे ट्रंप प्रशासन की नीतियों की कांग्रेसी जांच के पक्ष में हैं।
केन मार्टिन
केन मार्टिन डेमोक्रेटिक नेशनल कमिटी के अध्यक्ष हैं, यानी पार्टी के राष्ट्रीय संगठन के प्रमुख। उन्हें फरवरी 2025 में चार साल के कार्यकाल के लिए चुना गया था।
मार्टिन ने 2026 नतीजों को पार्टी की सदी की सर्वश्रेष्ठ जीतों में से एक बताया और ट्रंप टैरिफ हटाने तथा ईरान युद्ध समाप्त करने की वकालत की। उनका काम 2028 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए पार्टी की तैयारी, प्राइमरी कैलेंडर, बहसों और राष्ट्रीय अधिवेशन का संचालन भी है।
अन्य महत्वपूर्ण चेहरे
कैथरीन क्लार्क: प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक माइनॉरिटी व्हिप; हाउस नेतृत्व टीम का हिस्सा।
सुज़ान डेलबेन: डेमोक्रेटिक कांग्रेशनल कैंपेन कमिटी की अध्यक्ष, जो हाउस चुनावों में पार्टी की रणनीति और चुनावी तैयारी से जुड़ी हैं।
पेगी फ्लैनागन: नई सीनेटर और उभरती प्रगतिशील आवाज़, हालांकि अभी पार्टी की शीर्ष राष्ट्रीय नेतृत्व पंक्ति में नहीं हैं।
ध्यान रहे कि अमेरिका में पार्टी का कोई एकमात्र “प्रधानमंत्री जैसा” नेता नहीं होता; कांग्रेस में दोनों सदनों के दलनेता और DNC अध्यक्ष अलग-अलग भूमिकाएं निभाते हैं।हकीम जेफ्रीज़ डेमोक्रेटिक पार्टी के उदारवादी-प्रगतिशील धड़े से जुड़े नेता हैं, जिनका राजनीतिक एजेंडा सस्ती जीवन-यापन, स्वास्थ्य सुरक्षा, न्याय सुधार और ट्रंप प्रशासन की जवाबदेही पर केंद्रित है। डेमोक्रेट्स की हाउस जीत के बाद वे अगले हाउस स्पीकर बनने की स्थिति में हैं और ऐसा होने पर अमेरिका के पहले काले हाउस स्पीकर बनेंगे।
राजनीतिक सफर
जेफ्रीज़ का जन्म 4 अगस्त 1970 को ब्रुकलिन, न्यूयॉर्क में हुआ। उन्होंने बिंघमटन यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में स्नातक, जॉर्जटाउन से सार्वजनिक नीति में मास्टर और NYU से कानून की डिग्री पाई।
2007–2012 तक वे न्यूयॉर्क राज्य विधानसभा के सदस्य रहे।
2012 में न्यूयॉर्क के 8वें कांग्रेसनल जिले से पहली बार हाउस में चुने गए और 2013 से सांसद हैं।
2019–2023 तक हाउस डेमोक्रेटिक कॉकस के अध्यक्ष रहे; 2022 में नैंसी पेलोसी के बाद हाउस माइनॉरिटी लीडर बने।
2020 में वे ट्रंप के पहले महाभियोग में हाउस इंपीचमेंट मैनेजर थे।
वे कांग्रेस के किसी भी सदन में किसी बड़ी पार्टी का नेतृत्व करने वाले पहले अश्वेत नेता हैं।
मुख्य एजेंडा
जेफ्रीज़ ने नए हाउस बहुमत के लिए “पहले 100 दिन” का एजेंडा घोषित किया है, जिसका केंद्र बिंदु है: कामकाजी अमेरिकियों के लिए खर्च घटाना और सरकार में भ्रष्टाचार की जांच।राजनीतिक शैली
जेफ्रीज़ की राजनीति को प्रगतिशील माना जाता है, लेकिन वे पार्टी के विभिन्न धड़ों को एक साथ रखने में सक्षम “यूनिटी” नेता के रूप में भी जाने जाते हैं। उनका संदेश अक्सर वर्ग-आधारित आर्थिक मुद्दों—काम, मजदूरी, किराया, स्वास्थ्य और महंगाई—पर केंद्रित रहता है, साथ ही नस्लीय न्याय और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा भी उनकी पहचान है।
सत्ता में आने पर चुनौतियां
अगर वे स्पीकर बनते हैं, तो उनकी सबसे बड़ी चुनौती होगी अपने मध्यमार्गी और प्रगतिशील सांसदों के बीच संतुलन बनाना, खासकर स्वास्थ्य, कर, टैरिफ और ट्रंप प्रशासन की जांच के मुद्दों पर। साथ ही, हाउस में कानून पास कराने के लिए उन्हें सीनेट में डेमोक्रेटिक बहुमत और राष्ट्रपति की वीटो शक्ति—दोनों की वास्तविकता से भी जूझना होगा।हकीम जेफ्रीज़ की राजनीतिक शैली शांत, संवादात्मक, संदेश-अनुशासित और सर्वसम्मति बनाने वाली मानी जाती है। वे नैंसी पेलोसी की केंद्रीकृत “टॉप-डाउन” शैली के विपरीत अधिक सुनने और दल को साथ लेकर चलने वाले नेता माने जाते हैं।
नेतृत्व शैली
जेफ्रीज़ को अपने दल में “सुनने वाला” नेता कहा जाता है—वे सांसदों की बैठकों में बातें नोट करते हैं, विभिन्न विचारधाराओं को टेबल पर लाते हैं और फिर राय बनाते हैं। उनके सहयोगी उन्हें शांत, सोच-समझकर काम करने वाला और व्यापक गठबंधन बनाने में कुशल बताते हैं।
वे प्रगतिशील और मध्यमार्गी डेमोक्रेट्स—दोनों को एक साथ रखने की कोशिश करते हैं।
उनकी शैली विचारधारा की “शुद्धता” थोपने के बजाय बड़े गठबंधन को बनाए रखने पर आधारित है।
आलोचक उन्हें कभी-कभी अत्यधिक सतर्क, धीमा या प्रक्रिया-केंद्रित मानते हैं, खासकर तेज़ राजनीतिक निर्णय की मांग वाले समय में।
भाषण शैली
जेफ्रीज़ के भाषण धीमी, लयबद्ध और वकील/उपदेशक जैसी शैली में होते हैं। उनकी भाषा में दोहराव, अनुप्रास (alliteration), सटीक वाक्य-संरचना और हाथ के ठोस संकेतों का प्रयोग दिखता है।
उनकी सबसे पहचानी विशेषता है संदेश की दोहराव। वे एक ही मुख्य बात—जैसे महंगाई, आवास, स्वास्थ्य और किराने की कीमतें—लगभग रोज़ दोहराते हैं, ताकि दल का संदेश स्पष्ट और यादगार बना रहे।
सांस्कृतिक रंग
ब्रुकलिन में बड़े होने और चर्च में भाषण करने के अनुभव ने उनकी बोलने की शैली को आकार दिया है। वे बाइबिल के उद्धरणों को राजनीतिक बातों के साथ जोड़ते हैं और कभी-कभी जे-ज़ेड या नोटोरियस बी.आई.जी. जैसे ब्रुकलिन के रैपरों के संदर्भ भी डालते हैं।
उनका प्रसिद्ध “ABCs of Democracy” भाषण इसका अच्छा उदाहरण है: उन्होंने अमेरिकी लोकतंत्र के सिद्धांतों को वर्णक्रम के रूप में प्रस्तुत किया, जैसे “democracy over demagogues” और “constitution over a cult.”
प्रभावी और विवादास्पद पक्ष
जेफ्रीज़ की ताकत है उनका संयम, दल को एकजुट रखना और जटिल मुद्दों को सरल, दोहराए जाने योग्य संदेश में बदलना। उन्होंने रिपब्लिकन विधेयक के विरोध में 8 घंटे 44 मिनट का लंबा भाषण देकर प्रक्रियागत रूप से भी प्रतिरोध दिखाया था।
लेकिन आलोचकों के अनुसार उनकी भाषण शैली कभी-कभी अत्यधिक गणना की हुई या “रोबोटिक” लग सकती है, और उनका संयम प्रगतिशील आधार के लिए पर्याप्त जोशीला नहीं माना जाता। फिर भी, उनकी मुख्य रणनीति स्पष्ट है: ट्रंप विरोध को रोज़मर्रा की महंगाई और आर्थिक सुरक्षा के मुद्दों से जोड़कर व्यापक मतदाता वर्ग तक पहुंचाना।
क्लेयर वाल्डेज़ — न्यूयॉर्क से कांग्रेस पहुंचने वाली पहली ज्ञात मूलनिवासी महिला। 
डेब हालैंड — न्यू मेक्सिको की पहली मूलनिवासी महिला राज्य-गवर्नर।
पेगी फ्लैनागन — अमेरिकी सीनेट की पहली मूलनिवासी महिला सदस्य। 
मैरी पेल्टोला — अलास्का की पूर्व कांग्रेस सदस्य और पहली अलास्का नेटिव कांग्रेस सदस्य; इस चुनाव में उनका सीनेट नतीजा रैंक-चॉइस गणना के कारण अभी अनिश्चित है।

Tuesday, December 2, 2025

गुरु तेग बहादुर सिंह जी को नमन्

शहीद हुए जो माँ के खातिर, जीते थे जो शर्तों पे। 
गुरु तेग बहादुर जन्मा था जो, अमृतसर की धरती में।। 
झुके नहीं वो लड़ते थे, अपनी अंतिम सासों तक, 
अभी निकलना बाकी है इतिहास के परतों से।। 
पांच भाई को लेकर जिसने, हुआ रवाना दिल्ली को, 
पकड़ ना आया फिर भी वो औरंगी फर्मानी से। 
मतिदास को रेता जिसने, मुगलों की उस आरी से। 
भाई दयाला को जिसने बीच चौक पर उबाला था। 
सतीदास को उन मुगलों ने, रुई लपेट जलाया था। 
दिया यातना था मुगलों ने, अपने मजहब लहराने को, 
पर डिगा ना पाए, झुका ना पाये उन वीरों को, 
जो मातृभूमि पर हँसते हँसते शीश चढ़ाने जाते थे।। 

किया कैद था गुरु तेग को, शूलों के एक पिंजरे में। 
दिया यातना था फिर भी, वह वीर जो ना डोला था। 
किया वार था, एक प्रहार था, उस मुगली तलवारों ने। 
कर दिया अलग गुरु तेग को फिर से, फेका था चौराहों में। 
टुकड़े टुकड़े अंगों को, टांगा था दीवारों में। 
नहीं उठाना शीश गुरु का, ऐसा औरंगी फर्मानी था। 
धड़ के टुकड़ों को भी उसने, नहीं बक्शा था मुगलों ने। 
वीर हुआ धरती पर ऐसा, शीशगंज के गुरुद्वारे में। 
हुआ दुबारा दाह गुरु का, सुना कहीं इतिहासों में। 
हुए वीर बहादुर ऐसे, रहेंगे सदा एहसासों में। 
बन प्राणवायु गुरु तेग बहादुर, सदा रहेंगे सासों में। 
बन गये मिशाल अब तेग बहादुर, लोगों के विश्वाशों में।। 
लोगों के विश्वाशों में।। 

वीर रानी, राज रानी, अबक्का अबक्का।।

वीर अबक्का की गाथाएँ, 
बहुत सुनी कथाओं में। 
कुंदन बन चमकी थी वो, 
उस जलती ज्वालाओं में।। 
शहीद हुई जो सबसे पहले, 
नहीं लिखा इतिहासों में। 
हुए 500 आज जनम के, 
जो जीवित है विश्वासों में।। 

पूर्तगालों की सेना ने, 
जब वार किया था 55 में। 
हरा ना सके थे फिर भी रानी को
वीरता की जो मिशाल थी। 
डटकर किया सामना था जिसने, 
साख बचाने उल्लाल की। 
साख बचाने उल्लाल की।।
शहीद हुई जो सबसे पहले, 
नहीं लिखा इतिहासों में। 
हुए 500 आज जनम के, 
जो जीवित है विश्वासों में।। 


सन् 58 में भी उसने 
रानी को जब घेरा था। 
झुकी नहीं वो रानी फिर भी, 
पूर्तों को जिसने खदेड़ा था।
शहीद हुई जो सबसे पहले, 
नहीं लिखा इतिहासों में। 
हुए 500 आज जनम के, 
जो जीवित है विश्वासों में।। 


भेद रहा था सागर तट को, 
भारत में घुस आने को। 
उल्लालों की सेना लेकर, 
निकल पड़ी भगाने को। 
सन् 67 में पूर्तों ने, 
फिर से हमला डाला था। 
दिया करारा उन पूर्तों को, 
निकले थे जो कब्जाने को।। 
शहीद हुई जो सबसे पहले, 
नहीं लिखा इतिहासों में। 
हुए 500 आज जनम के, 
जो जीवित है विश्वासों में।। 

बार बार के हमलों ने भी, 
झुका ना पाये रानी को, 
अग्निबाण से उस रानी ने, 
पूर्तों को जब घेरा था। 
वीर बहादुर शौर्य पराक्रम, 
लड़े बहुत सीमाओं में। 
किया वार जब तुलुनाडु में, 
उस पूर्ति सेनाओं ने। 
नहीं टूटने दिया मान को
झुका ना पाये रानी को। 
टूटी नहीं अबक्का फिर भी
ऐसी माँ भवानी थी।। 
शहीद हुई जो सबसे पहले, 
नहीं लिखा इतिहासों में। 
हुए 500 आज जनम के, 
जो जीवित है विश्वासों में।। 

नौका डूबी नाव भी डूबा, 
उल्लाली सेनानी का, 
शत् शत् वंदन् करे ये धरती, 
वीर अबक्का रानी का। 
वीर अबक्का रानी का।। 

शहीद हुई जो सबसे पहले, 
नहीं लिखा इतिहासों में। 
हुए 500 आज जनम के, 
जो जीवित है विश्वासों में।। 

Saturday, November 22, 2025

चार घोड़े चालीस मील

वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।। 

लहू से था लतपथ, रास्ता भी लहू था, 
लहू थी वो गलियाँ, वो चौक भी लहू था। 
छोटी सी धोती में, वो गोरों को तरेरता, 
वो देख भी रहा था, तो आँख भी लहू था। 
पेड़ पर जो लटका, पर झुकता नहीं था। 
वही था, वही था, ये तिलका वही था।। 
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।। 

हमें याद है, हम ये भूले नहीं हैं, 
सिक्खों की वीरता पर, डायर की वो गोलियां
जलिया के बागों में, खून की वो होलियाँ
सन् तेरह की होली को, हमनें भुलाया कहाँ हैं। 
लहू के निशानों को, हमने मिटाया कहाँ है। 
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा। 

मानगढ़ की पहाड़ी पर, आस्था जो चली थी
भीलों के हुज़ूमों में, भिलनियाँ भी खड़ी थी। 
गोरों की तोपों ने  आगें जो उगली। 
आगस्टस की बंदूक से गोली जो निकली। 
पड़ी थी वहाँ बहनें, माताएँ पड़ी थी। 
लाशों के ढेर  में वो बिखरी पड़ी थी। 
भीलों की धरती पर आज मौत फिर खड़ा था। 
पड़ी थी जो लाशें, उसमें दुधमुहाँ पड़ा था। 
उसमें दुधमुहाँ पड़ा था।। 

मानगढ़ की पहाड़ी पर, आस्था का था वो मेला। 
भीलों के हुज़ूमों में था, वीरों का वो रेला। 
गोरों की तोपों ने जब, उगली थी आगें। 
आगस्टस की गोली ने, रोकी थी सांसें। 
पड़ी थी जो लाशें, उसमें दुधमुहाँ पड़ा था। 
पड़ी थी जो लाशें उसमें दुधमुहाँ पड़ा था। 
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।। 

द्वार भी खुले थे, बोले थे फिर भी, 
आती थी उसमें, हजारों की टोलियाँ। 
भागे नहीं थे, आखिर में फिर भी, 
भीलों ने खेली थी, खूनों की होलियाँ। 
भीलों ने खेली थी, खूनों की होलियाँ।। 
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।। 

रांची के जेलों की यातना, हमें याद है। 
चालकंद की वो दुष्टता, हमें अब भी याद है। 
याद है हमें, हमारी मातृभूमि को हमसे छीनना। 
पर डिगा कहाँ सके तुम, डिगाने से तनिक भर, 
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।। 

चूड़ियों की खनक, हम सभी ने सुनी है। 
पायलों की झंकार भी, हम सभी ने सुना है। 
सुनाता हूँ आज मैं, जो कभी ना सुना है। 
जेलों के बेड़ियों में, होती है खनक भी, 
बिरसा के बेड़ियों की वो, खनक हमने सुनी है।।
बिरसा के बेड़ियों की वो, खनक हमने सुनी है।।
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।। 

पड़ा था जब सूखा, उस सोने के खान में। 
गोरों ने मांगा था था, फिर भी लगान में। 
लटका के रखा था, दस दिन तक उसको। 
कर दिया न्यौछावर
इस मिट्टी के खातिर उसने अपना शरीर......... 
प्रजा को बचाने जो निकला था वीर। 
प्रजा को बचाने जो निकला था वीर।। 
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।। 

लड़ा था मेरा देश, सारा समाज भी लड़ा था। 
गोंड भी लड़े थे, मुंडा भी लड़ा था। 
संथाल भी लड़े थे, परलकोट भी लड़ा था। 
रमोतिन मढ़ीया भी लडी थी, धुरुआ राम भी लड़ा था। 
जगरतन भरता भी लड़ा था, वीर झाड़ा सिरहा भी लड़ा था। 
हरचंद् नायक भी लड़ा था, सुखदेव पातर हलबा भी लड़ा था। 
चिंतु हलबा भी लड़ा था, डेबरी धुर लड़ी थी। 
लड़ा था वो गुंडाधुर भी, मेरे देश के सम्मान में। 
बस्तर के वो वीर थे, हो गये शहीद वो, 
महान भूमकाल में, महान भूमकाल में।। 
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।। 

एक था महान हुआ, बस्तर की जमीन पर, 
आंच को ना आने दिया, पुरखों की जमींर पर। 
बचा के रखा था जिसने, परलकोट की उस थाती को, 
ठाकुर गैन्दसिंग था नाम जिसका, 
छूने ना दिया अंतिम सांस तक जिसने, 
बस्तर की उस पवित्र माटी को। 
बस्तर की उस पवित्र माटी को।। 
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।।