Friday, April 29, 2016

हिन्दुस्थान’ नाम जानबूझकर भुलाया जा रहा है

अपने देश में, जो हिन्दुस्थाननाम से विख्यात था, ‘हिन्दूशब्द को बदनाम करने के प्रयास बड़ी ताकत से किये जा रहे हैं। आश्चर्य और लज्जा की भी बात यह है कि जिनको दुनिया हिन्दूनाम से पहचानती है, वे लोग ही इस बदनामी मुहिम में सबसे आगे हैं। अपने देश का हिन्दुस्थानयह नाम जानबूझकर भुलाया जा रहा है। अपने संविधान की पहली धारा की शब्दावली ही देखें। वह बताती है India that is Bharat shall be a union of States इस धारा की शब्दावली का अर्थ यह होता है कि अपने देश का मूल नाम इंडियाहै। यहां के अनपढ़ लोगों के समझ में आने के लिये उसका अनुवाद भारतकिया है। यह शब्दावली यह भी अधोरेखित करती है कि यह देश मूलत: एक नहीं है। अनेक राज्यों का वह संघ है। मतलब यहां मूलभूत इकाई राज्यहै, भारत नहीं। इस प्रकार के वैचारिक विभ्रम का मतलब यहां दिखाई देता है कि हिमालय से लेकर सागर तक फैला यह देश एक है, ऐसा आभास तक किसी को न हो ।

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भारत और हिन्दुस्थान हमारे माननीय संविधानकर्ताओं ने, विष्णु पुराण का एक श्लोक भी अपने संज्ञान में लिया होता, तो संपूर्ण भारत के एकत्व का बोध उनको हो जाता। वह श्लोक है-

                 उत्तरं यत् समुद्रस्य
हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वषंर् तद् भारतं नाम
भारती यत्र सन्तति:।।
श्लोक का अर्थ है- समुद्र के उत्तर में और हिमाचल के दक्षिण में जो प्रदेश है उसका नाम भारत है और वहां रहनेवाले लोग भारतीहंै। संविधानकर्ताओं ने जरा भी स्वत्व का अभिमान और आत्मविश्वास होता तो वे ….ऐसा शब्द प्रयोग करते भारतशब्द, विष्णु पुराण के वचन के अनुसार इस देश का विस्तार बतायेगा और हिन्दुस्थानशब्द उसका गुणात्मक आशय (…) प्रकट करेगा
धर्म और रिलिजन   हम यह मान लेंगे कि वे लोग नया संविधान बनाने की जल्दी में थे या हिन्दूशब्द के अर्थ के जो आयाम है, उनसे वे अनभिज्ञ थे। सम्भवत: ईसाई तथा इस्लाम के समान हिन्दूभी केवल एक मजहब है ऐसा ही वे मानते होंगे। यह बौद्घिक संभ्रम तो अभी भी विद्यमान है। वे धर्मऔर रिलिजनके अथों का भेद समझने में असमर्थ दिखाई देते हैं। धर्मका अर्थ बहुत व्यापक है। रिलिजन’ ‘धर्मका एक अंग मात्र है। रिलिजनकेवल परमार्थ तक सीमित है। धर्मऐहिक भी है और पारमार्थिक भी है। वैशेषिकों ने धर्मकी सही परिभाषा की है।
यतोऽभ्युदयनि:श्रेयससिद्घि: स धर्म:यानी जिस से अभ्युदय यानी ऐहिक उन्नति और नि:श्रेयस यानी पारमार्थिक कल्याण की सिद्घि होती है वह धर्महै। यह वैशेषिकों की परिभाषा है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन् ने ठीक ही कहा है कि Hinduism is not a religion, it is a common-wealth of many religions- मतलब है हिन्दूकोई एक रिलिजन नहीं है, अनेक रिलिजनों का वह संघ है। वे आगे कहते हैं- Hindus, if they accept the Hindu system of culture and life. Hinduism insists not on religious conformity but on a spiritual and ethical outlook of life. Hinduism is not a sect, but a fellowship of all who accept the law of right and earnestly seek for truth हिन्दू के इस व्यापक आशय की अनदेखी कर आज के हमारे नेताओं ने हिन्दूको इस्लाम और ईसाई मत की पंक्ति में बिठाकर उसे एक संप्रदाय बना डाला है। इसलिये जो कोई हिन्दूकी बात करता है, उसे वे सांप्रदायिक, कम्युनल, संकीर्ण मानते हैं।
हिन्दू धर्म अभी अपने देश में स्वामी विवेकानंद के जन्म की सार्द्ध शती मनाई जा रही है। सम्भवत: तथाकथित सेक्युलर पार्टियों के लोग भी सार्द्ध शती समारोह मनायेंगे या दिखाने के लिये क्यों न सार्द्ध शती समारोहों में शामिल होंगे। उनके लिये तथा अन्य सभी के लिये भी स्वामी जी ने हिन्दू’, ‘हिन्दू धर्म’, ‘हिन्दू राष्ट्रइन विषयों के सम्बन्ध में क्या कुछ कहा है, यह बताना मुझे आवश्यक लगता है। यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि स्वामी विवेकानंद के अमरीका तथा अन्य यूरोपीय देशों में जो भाषण हुये, वे 19वीं शताब्दी में हुए थे। उन लोगों को धर्मशब्द का अर्थ ज्ञात होना असम्भव था। अंग्रेजी भाषा में धर्मशब्द का सम्यक् और समग्र आशय प्रकट करने वाला शब्द ही नहीं है। क्योंकि ऐसी व्यापक अवधारणा का उनके विचार विश्व में उदय ही नहीं हुआ था। उनके बीच में भाषण करते हुये स्वामी जी ने ह्यरिलिजनह्ण शब्द का प्रयोग किया है। किन्तु उस शब्द के व्यापक आशय के बारे में उनके मन में यत्किंचित भी संदेश नहीं था। इस संदर्भ में उनके कुछ वचन ध्यान में लेने चाहिये।

1) ईसाई मत ईसा मसीह पर, इस्लाम मुहम्मद साहब पर, बौद्घ बुद्घ पर, जैन जिन पर- ऐसे ये रिलिजन व्यक्ति- आधारित हैं, लेकिन अपना धर्म व्यक्ति पर नहीं सिद्घान्तों पर आधारित है। भगवान् कृष्ण वेदों से श्रेष्ठ नहीं हैं। उनको भी वेद श्रेष्ठ लगते थे। श्रीकृष्ण का देवत्व इस में है कि उन्होंने अपने जीवन में वेदों की सर्वोत्तमता को प्रकट किया है।

2) हरेक देश की कार्य करने की एक विशेष रीति होती है। कुछ राजनीति के द्वारा प्रगति करते हैं। हमारे लिये धर्मही एकमात्र साधन उपलब्ध है, जिसकी सहायता से हम कुछ हलचल कर सकेंगे? हम हिन्दुओं को राजनीति भी धर्मके द्वारा ही समझ में आयेगी, समाज शास्त्र का भी आकलन होगा तो वह भी धर्मके द्वारा ही क्याकि धर्मही यहां की ओंकार ध्वनि है। अन्य सारे सुर राष्ट्रीय जीवन-संगीत के संवासुर हैं।
इससे यह स्पष्ट होगा कि धर्मकेवल उपासना का कर्मकांड नहीं होता वह जीवनव्यापी है। धारणाद् धर्म इत्याहु: धर्मो धारयते प्रजा:’, यह महाभारत का सुप्रसिद्घ वचन है-धर्मप्रजा की यानी जगत में उत्पन्न सभी को धारणा करने वाला तत्व है।
अस्मिता का बोधक शब्द हिन्दूशब्द कहां से आया? वैदिक साहित्य में उसका उल्लेख है क्या? पराये लोगों ने दिया हुआ वह अभिधान नहीं हैं क्या?- इस निरर्थक चर्चा में स्वामी विवेकानंद उलझे नहीं। उन्होंने यही बताया कि ह्यसिंधुह्ण से ह्यहिन्दूह्ण आया है। अनेक पश्चिमी तथा पूर्व भारतीय भाषाओं में ह्यसह्ण का उच्चारण ह्यहह्ण होता है। ह्यसप्ताहह्ण का ह्यहफ्ता बनता है। हम लोग ह्यअसमह्ण कहते हैं, किन्तु वहां के लोग ह्यआहोमह्ण कहते हैं। मैं एक बार असम के होजाई नगर में गया था। मेरा परिचय कराते हुए वक्ता ने कहा, ह्यये नागपुर से निकलने वाले तरुण भारत के पूर्व ह्यहम्पादकह्ण हैंह्ण। तथापि ह्यहिन्दूह्ण शब्द का मूल कुछ भी हो, वह अब हमारी विशेषता का, विशिष्टता का तथा अस्मिता का बोधक बन गया है। हमें उसका अभिमान धारण करना चाहिये। विवेकानंद कहते हैं, ह्यह्यमुझे हिन्दू कहने का अभिमान लगता है। मेरे देशबंधुओं, भगवान् की कृपा से आप को भी वैसा लगे। अपने पूर्वजों के बारे में श्रद्घा हमारे रक्त में होनी चाहिये। वह हमारे जीवन का अभिन्न अंग बने और हम संपूर्ण जगत की मुक्ति के लिये प्रयत्नशील हों।ह्णह्ण मूल अंग्रेजी वचन ऐसा है, “I am proud to call myself a Hindu. Through the grace of the Lord, may you, my countrymen, have the same pride. May that faith in your ancestors come into your blood. May it become a part and parcel of your lives. May it work towards the salvation of the world.” 
ह्यह्यहिन्दू इस शब्द पर और हिन्दू नाम धारण करने वाले हरेक व्यक्ति को हम अत्यन्त प्रेम करना सीखें । वह किसी भी प्रान्त का रहने वाला हो, कोई भी भाषा बोलने वाला हो, परिचय होते ही वह हमको अत्यंत निकटतम और प्रियतम लगे तभी हम सही अर्थ में हिन्दू कहलायेंगे।
सन् 1897 में लाहौर में दिये भाषण में स्वामी जी ने कहा- “We are Hindus. I do not use the word Hindu in any bad sense at all, nor do I agree with those that think there is any bad meaning in it. Upon us depends whether the name Hindu will stand for everything that is glorious, everything that is spiritual……….. Let us be ready to show that this is the highest word that any language can invent.” (Complete works: Vol III, Page 368)

हिन्दू राष्ट्र हिन्दू, हिन्दू धर्म, इन शब्दों के साथ ह्यहिन्दू राष्ट्रह्ण इस शब्द का भी प्रयोग स्वामी जी ने अनेकों बार किया है। अपने एक भाषण में वे कहते हैं,
“So long as they (Hindus) forgot the past, the Hindu Nation remained in a state of Stupor…………. The more the Hindus study the past, more glorious will be their future; and whoever tries to bring the past to the door of everyone, is a great benefactor to his Nation.” (Complete works, Vol IV, Page 329) और एक भाषण में वे कहते हैं- ह्यह्यहमारी आत्मा हमारे धर्म में है उस आत्मा का कोई विनाश नहीं कर सका। अत: यह हिन्दू राष्ट्र अभी भी जीवित है“Because no one was able to destroy, therefore the Hindu Nation is still living.” (Complete works: Vol IV, Page 157)
मद्रास (आज का चेन्नई) में रंॅी२ ङ्मा कल्ल्रिंइस विषय पर बोलते हुये उन्होंने कहा- The sages of India have been almost innumerable; for what has the Hindu Nation be doing for thousands of years except producing sages? (Complete works: Vol III, Page 248)
आज कल अपने देश मे ह्यराष्ट्रह्ण और ह्यराज्यह्ण इन दो अवधारणाओं के संबंध में भ्रांतियां नजर आती हैं। वस्तुत: ह्यराज्यह्ण (२३ं३ी) यह राजनीतिक व्यवस्था है ऐसी व्यवस्था कि जो कानून द्वारा और कानून के बल पर चलती है। उस कानून के पीछे दण्डशक्ति खड़ी होती है। ह्यराज्यह्ण आवश्यक है, इसमें संशय नहीं, किन्तु ह्यराज्यह्ण अलग है ह्यराष्ट्रह्ण अलग है। ह्यराष्ट्रह्ण यानी लोग होते है ढीङ्मस्रह्णी ं१ी ३ँी ठं३्रङ्मल्ल. जो अपने देश को मातृभूमि मानते हैं, ह्यवन्दे मातरम्ह्ण कहते हुए जिनका सीना अभिमान से फूलता है, जिनको अपने पूर्वज और अपना इतिहास फिर वह विजय का हो या पराजय का हो, अपना लगता है, और सब से प्रधान बात यह है कि जिनका अच्छा-बुरा नापने के मापदण्ड समान होते हैं, यानी जिनकी मूल्यधारणा श्ंह्ण४ी-२८२३ीे समान होती है, उनका राष्ट्र बनता है। यह मूल्यधारणा यानि संस्कृति होती है। ऐसे कौन से लोग हैं जिनके मन में उपरि निर्दिष्ट भावनाओं का अस्तित्व है? उनका नाम ह्यहिन्दूह्ण है। इसलिये यह ह्यहिन्दू राष्ट्रह्ण है। ह्यराष्ट्रह्ण और ह्यराज्यह्ण इन अवधारणाओं के मौलिक भेद की अनदेखी कर, कई लोग बोल जाते हैं कि 15 अगस्त 1947 को नया राष्ट्र बना। वस्तुत:, उस दिन नये राज्य का आविर्भाव हुआ राष्ट्र तो अति प्राचीन काल से विद्यमान है।

परावर्तन
इस राष्ट्र का हिन्दू मुख्य प्रवाह है। उन हिन्दुओं को हिम्मत के साथ खड़ा होना चाहिये, विस्तार की आकांक्षा रखनी चाहिये और जगद्गुरु का पद प्राप्त करना चाहिये, ऐसी स्वामी जी की इच्छा थी। किसी भी कारण से हो स्वधर्म छोड़कर अन्य मत-पंथों में गये लोगों को फिर से हिन्दू धर्म में लाएं यह प्रश्न पूछे जाने पर उन्होंने कहा था ह्यअवश्य लाना चाहिए।ह्ण कुछ समय स्वामी जी स्तब्ध रहे और फिर उन्होंने कहा ह्यऐसा हुआ नहीं तो हमारी संख्या कम होगी। परधर्म में गए लोगों को वापस लाने की हमारी मानसिकता चाहिए और उस दिशा में पहल चाहिये।
पुरुषार्थ संपन्न बनें

विवेकानंद जी ने समग्र हिन्दू समाज की एकता को अधोरेखित कर, अनेकों बार कहा है कि समाज के हर व्यक्ति को पुरुषार्थ के साथ खड़ा होना चाहिये। अरे भाई, दिन-रात जयकार कर यही प्रार्थना कर कि, ह्यहे जगतजननी, मुझे पुरुषार्थ का दान दे, ह्यहे शक्तिदेव, मेरी दुर्बलता का विलय कर, मेरी क्लीबता नष्ट कर मुझे पौरुष संपन्न कर

भारत ने नेपाल को रहत सामग्री भेजी

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रांची में आयोजित अखिल भारतीय वनवासी खेलकूद महोत्सव

अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के तत्वावधान में सातवाँ अखिल भारतीय खेल महोत्सव आज दिनांक 27 दिसंबर को रांची (झारखंड) में प्रारम्भ हुआ | विशेष रूप से निर्मित खेल गाँव में भव्य उदघाटन कार्यक्रम संपन्न हुआ | केन्द्रीय जनजाति कार्य मंत्री जुएल उरांव तथा केन्द्रीय ग्राम विकास राज्य मंत्री सुदर्शन भगत कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे | कार्यक्रम की अध्यक्षता झारखंड के मुख्य मंत्री रघुवरदास ने की | मुख्य वक्ता के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी का उद्बोधन हुआ |
झारखंड के गाँव गाँव से खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए लगभग पचास हजार वनवासी व नगरवासीयों की उपस्थिति में वेद मन्त्रों के साथ उदघाटन कार्यक्रम संपन्न हुआ | कार्यक्रम का प्रारम्भ वनयोगी स्व. बालासाहब देशपांडे के चित्र पर माल्यार्पण के साथ हुआ | उपस्थित अतिथियों का स्वागत व परिचय वनवासी कल्याण केंद्र के अध्यक्ष डॉ. एच.पी. नारायण द्वारा किया गया | तत्पश्चात मंत्री महोदय ने खेल महोत्सव का ध्वजारोहण किया | देश भर से आये हुए 3100 खिलाड़ियों के संचलन (मार्च पास्ट) का दर्शकों ने उत्साह से स्वागत किया | इस मार्चपास्ट में सेना का बैंड भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहा | मार्च पास्ट के पश्चात् खिलाड़ियों ने शपथ ग्रहण की | अजय मलकानी ने मार्च पास्ट कि रोचक कमेंट्री की |वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगदेवराम जी ने स्वागत भाषण देते हुए कल्याण आश्रम वर्तमान तक चले कार्यों की जानकारी व उपलब्धियों पर प्रकाश डाला | केन्द्रीय जनजाति कार्य मंत्री जुएल उराम नेकहा कि जनजाति समाज के बंधुओं के हिता में सरकार सदा कार्यरत रही है, तथा भविष्य में भी रहेगी |
मुख्य वक्ता भैया जी जोशी ने अपने उद्बोधन में वनवासी समाज के हित में कल्याण आश्रम के योगदान की भूरि भूरि प्रशंसा की तथा कहा कि वनवासी समाज न केवल खेल, अपितु सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है | इस दिशा में कल्याण आश्रम के विशेष प्रयास अभिनंदनीय हैं |
विशिष्ट अतिथि के रूप में दो बार एवरेस्ट शिखर पर तिरंगा फहराने वाली अरुणांचल प्रदेश की अंजु जेन्समपाने ने अपने अनुभव सुनाये | अर्जुन अवार्ड से सम्मानित अंतर्राष्ट्रीय धाविका कविता राउत ने कहा कि मुझे इस बात का गौरव है कि मैं कल्याण आश्रम के माध्यम से खेल जगत में आगे आई हूँ | उन्होंने खेल महोत्सव में भाग लेने आये खिलाड़ियों को अपनी शुभकामना भी अर्पित कीं |रंगारंग कार्यक्रम में पूर्वांचल के रियांग एवं चकमा जनजाति का मनमोहक नृत्य हुआ | साथ में अन्य वनवासी कलाकारों द्वारा अकरा नृत्य और छौ नृत्य भी प्रस्तुत किया गया |अंत में झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवरदास ने अपने भाषण में समाज जीवन में सामूहिकता की भावना बढ़ाने में खेलों के महत्व पर प्रकाश डाला | उन्होंने यह महोत्सव झारखंड में आयोजित होने पर प्रसन्नता भी व्यक्त की |

कार्यक्रम का संचालन जशपुर से पधारे बीरबल सिंह ने किया | लिथोनिया से विशेष रूप से आईं गुरुमाता एवं बेट्रा बहिन ने सम्पूर्ण वन्देमातरम का सुमधुर गायन किया | कार्यक्रम के अंत में रिझु कश्यप ने धन्यवाद ज्ञापित किया | वनवासी कल्याण आश्रम के अखिल भारतीय खेलकूद  प्रमुख शक्तिपद ठाकुर तथा अन्य सहयोगी कार्यकर्ता कार्यक्रम की सफलता के लिए सतत जुटे हुए हैं |