Sunday, February 11, 2018

।।दीनदयाल उपाध्याय जी को शत् शत् नमन।।

दीनदयाल उपाध्याय का जन्म २५ सितम्बर १९१६ को जयपुर जिले के धानक्या ग्राम में, नाना चुन्नीलाल के यहाँ हुआ था | इनके पिता का नाम भगवती प्रसाद उपाध्याय था ये नगला चंदभान( फरह, मथुरा) के निवासी थे | माता रामप्यारी धार्मिक वृत्ति की थीं। पिता रेल्वे में जलेसर रोड स्टेशन पर सहायक स्टेशन मास्टर थे | रेल की नौकरी होने के कारण उनके पिता का अधिक समय बाहर ही बीतता था। कभी-कभी छुट्टी मिलने पर ही घर आते थे। थोड़े समय बाद ही दीनदयाल के भाई ने जन्म लिया जिसका नाम शिवदयाल रखा गया। पिता भगवती प्रसाद ने बच्चों को ननिहाल भेज दिया। उस समय उनके नाना चुन्नीलाल शुक्ल धनकिया में स्टेशन मास्टर थे। मामा का परिवार बहुत बड़ा था। दीनदयाल अपने ममेरे भाइयों के साथ खाते खेलते बड़े हुए।
३ वर्ष की मासूम उम्र में दीनदयाल पिता के प्यार से वंचित हो गये। पति की मृत्यु से माँ रामप्यारी को अपना जीवन अंधकारमय लगने लगा। वे अत्यधिक बीमार रहने लगीं। उन्हें क्षय रोग लग गया। ८ अगस्त १९२४ को रामप्यारी जी का देहावसान हो गया। ७ वर्ष की कोमल अवस्था में दीनदयाल माता-पिता के प्यार से वंचित हो गये।
उपाध्याय जी ने पिलानीआगरा तथा प्रयाग में शिक्षा प्राप्त की। बी०.एससी० बी०टी० करने के बाद भी उन्होंने नौकरी नहीं की। छात्र जीवन से ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता हो गये थे। अत: कालेज छोड़ने के तुरन्त बाद वे उक्त संस्था के प्रचारक बन गये और एकनिष्ठ भाव से संघ का संगठन कार्य करने लगे। उपाध्यायजी नितान्त सरल और सौम्य स्वभाव के व्यक्ति थे।
सन १९५१ ई० में अखिल भारतीय जनसंघ का निर्माण होने पर वे उसके संगठन मन्त्री बनाये गये। दो वर्ष बाद सन् १९५३ ई० में उपाध्यायजी अखिल भारतीय जनसंघ के महामन्त्री निर्वाचित हुए और लगभग१५ वर्ष तक इस पद पर रहकर उन्होंने अपने दल की अमूल्य सेवा की। कालीकटअधिवेशन (दिसम्बर १९६७) में वे अखिल भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। ११ फरवरी१९६८ की रात में रेलयात्रा के दौरान मुगलसराय के आसपास उनकी असामयिक मृत्यु  हो गयी।
विलक्षण बुद्धि, सरल व्यक्तित्व एवं नेतृत्व के अनगिनत गुणों के स्वामी भारतीय राजनीतिक क्षितिज के इस प्रकाशमान सूर्य ने भारतवर्ष में समतामूलक राजनीतिक विचारधारा का प्रचार एवं प्रोत्साहन करते हुए सिर्फ ५२ साल क उम्र में अपने प्राण राष्ट्र को समर्पित कर दिए। अाकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी दीनदयालजी उच्च-कोटि के दार्शनिक थे किसी प्रकार का भौतिक माया-मोह उन्हें छू तक नहीं सका।
।। शत् शत् नमन।।

Friday, February 9, 2018

शहीद गुण्डाधुर को शत्-शत् नमन।

शहीद गुंडाधुर 
छत्तीसगढ़ के बस्तर के एक छोटे से गांव में पले-बढ़े गुंडाधुर ने अंग्रेजों को इस कदर परेशान किया था कि कुछ समय के लिए अंग्रेजों को गुफाओं में छिपना पड़ा था. अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाला ये क्रांतिकारी आज भी बस्तर के लोगों में जिंदा है.
देश के लिए अपनाा सब-कुछ न्यौछावर करने वाले वीर सपूतों के साथ ही कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने आजादी के समर में अपना एक अलग योगदान दिया है, जिन्हें इतिहास कभी भुला नहीं सकता. ऐसे ही एक वीर क्रातिकारी का नाम है *शहीद गुंडाधुर.*
छत्तीसगढ़ के बस्तर के एक छोटे से गांव में पले-बढ़े गुंडाधुर ने अंग्रेजों को इस कदर परेशान किया था कि कुछ समय के लिए अंग्रेजों को गुफाओं में छिपना पड़ा था. अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाला ये क्रांतिकारी आज भी बस्तर के लोगों में जिंदा है. रियासतकालीन वैभव से भरे-पूरे बस्तर का इतिहास काफी समृद्धशाली रहा है. यहां की परम्पराएं, रीति-रिवाज और संस्कृति अपने आप में खास है. देश का ऐसा कोई कोना नहीं होगा जो बस्तर की वैभव सम्पदा को नहीं जानता होगा. चालुक्य और मराठा तथा नागवंशी राजवंशों के शासनकाल से लेकर अंग्रेजों के शासनकाल की दास्तान इतिहास के पन्नों में आज भी दर्ज है.
इन्हीं इतिहास के पन्नों में एक ऐसा नाम भी आता है, जिसने बस्तर को एक अलग पहचान दिलाई. बस्तर के महान क्रांतिकारी शहीद गुंडाधुर को लोग आज भी बड़ी शिद्दत के साथ याद करते हैं. गुलामी की जंजीरों में जकड़े देश के हर हिस्से के तरह बस्तर भी अंग्रेजों की दासता से मुक्त होना चाहता था. हालांकि उस जमाने में अंग्रेजों के अधीन राजवंश अंग्रेजों की मुखालफत करने की इजाजत नहीं देते थे. लेकिन कुछ आवाजें थीं, जो अंग्रेजों की हुकूमत को उखाड़ फेकना चाहती थी. ऐसी ही एक आवाज थी शहीद गुंडाधुर की.
बस्तर के नेतानार में रहने वाले गुडांधुर को उस समय लोग बागा धुरवा के नाम से जानते थे. चूंकि बाहरी दासता के खिलाफ संघर्ष बस्तर की प्रकृति रही है, उसी के अनुरूप शहीद गुंडाधुर ने अंग्रेजों की मुखालफत शुरू की और 1910 में अंग्रेजों की सत्ता को उखाड़ फेंकने शंखनाद कर दिया. भूमकाल आंदोलन में लाल मिर्च क्रांतिकारियों की संदेश वाहक कहलाती थी, जैसे 1857 की क्रांति के समय रोटी और कमल.
बस्तर से ब्रिाटिश हुकूमत की नीवें हिलानें के लिए गांव-गांव तक लाल मिर्च, मिट्टी का धुनष-बाण और आम की टहनियां लोगों के घर-घर तक पहुंचाने काम इस मकसद से शुरू किया गया कि लोग बस्तर की अस्मिता को बचाने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ आगे आएं. इतिहास इस बात का साक्षी है कि अंग्रेजों के खिलाफ उठाई गई इस आवाज में करीब 25 हजार लोगों ने अपनी कुर्बानी दी थी.
भूमकाल की गाथा आज भी बस्तर के लोकगीतों में गाई और सुनाई जाती है. कोई आदिवासी आज भी जब रात के अंधेरे में भूमकाल के गीत छेड़ता है तो आदिवासियों के पांव ठहर जाते हैं. उस सदी में शुरू हुई सफल क्रांति की मर्मान्तक पीड़ा आज भी आदिवासियों को पीड़ा से भर देती है. बस्तर का इतिहास आज भी इतिहास के पन्नों से ज्यादा लोककथाओं, लोकगीतों और जनश्रुतियों में संकलित और जीवित है.
शहीद गुंडाधुर को सर्वमान्य नेता माना जाता है. शहीद गुंडाधुर सामान्य आदिवासी थे, जिन्होंने न तो कभी पाठशाला का मुंह देखा था और न ही बाहरी दुनिया में कदम रखा था. 35 साल की उम्र में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ ऐसी लडाई छेड़ी कि कुछ समय तक अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे. हालात तो ये हो चले थे कि अंग्रेजों को कुछ समय छिपने के लिए जंगलों में गुफाओं का सहारा लेना पड़ा थाउस जमाने के कई अंग्रेज अफसरों ने अपनी डायरी में भूमकाल आंदोलन को लेकर कई बातें भी लिखी है, जो आज भी इतिहास के पन्नों में अंकित हैं. बस्तर की सम्पदा लूट रहे अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हुए भूमकाल आंदोलन ने पूरी ब्रिाटिश सत्ता को हिलाकर रखा दिया. ऐसे में इस आंदोलन के कई प्रणेता को उल्टा फांसी पर लटका दिया गया, जिसका गवाह आज भी जगदलपुर के गोलबाजार चौक पर स्थित इमली का पेड़ है, जहां इस आंदोलन से जुड़े लोगों को मौत की सजा दे दी गई थी.
बस्तर के इस वीर क्रांतिकारी बागा धुरवा को अंग्रेजों ने ही गुंडाधुर की उपाधि दी थी. दरअसल शहीद गुंडाधुर के विद्रोह करने के चलते ये नाम अंग्रेजों ने ही उन्हें दिया था. इतिहास के पन्नों में दर्ज शहीद गुंडाधुर का व्यक्तित्व और कृतित्व आज भी लोगों में मन में जिंदा है.
बस्तर के इस माटीपुत्र के लिए राज्य सरकार खेल प्रतिभाओं को उनके नाम पर पुरस्कृत करती है. तीरंदाजी के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए खिलाड़ियों को शहीद गुंडाधुर अवार्ड से सम्मानित किया जाता है।
।।शहीद गुण्डाधुर को शत्-शत् नमन।।

Wednesday, February 7, 2018

कलश या कलाश लोग




कलश या कलाश लोग हिन्दु कुश पर्वत शृंखला में बसने वाली एक जाती है। यह उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान के ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा राज्य के चित्राल ज़िले में रहते हैं। कलश लोग अपनी कलश भाषा बोलते हैं। कलश लोग और पड़ौस में रहने वाले अफ़ग़ानिस्तान के नूरिस्तानी लोग एक ही जाती की दो शाखाएँ हैं। नूरिस्तानी लोगों को उन्नीसवी सदी के अंत में अफ़ग़ानिस्तान के अमीर अब्दुर रहमान ख़ान ने पराजित करके मुस्लिम बनाया था जबकि बहुत से कलश लोग अभी भी अपने हिन्दू धर्म से मिलते-जुलते प्राचीन धर्म के अनुयायी हैं। अनुमान लगाया जाता है के अब इनकी जनसंख्या ६,००० के लगभग है। कलश लोग अधिकतर बुमबुरेत, रुम्बुर और बिरिर नाम की तीन घाटियों में रहते हैं और कलश भाषा में इस क्षेत्र को "कलश देश" कहा जाता है।

रायपुर। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन


रायपुर। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन सोमवार को किया गया। संगोष्ठी “भारतीय संस्कृति का वैश्विक स्वरूप एवं संचार” विषय पर आयोजित की गई। इस दौरान कार्यक्रम के मुख्यअतिथि के रूप लिथुवेनिया की गुरुमाता, संपादक इंडीजिनस ट्रेडिसन टुडे पूर्व एवं नेता प्रतिपक्ष लिथुवेनिया संसद मुख्य रूप से उपस्थित रहे। कार्यक्रम के मुख्यअतिथि के रूप में इनिया ट्रिकूनेइने गुरुमाता लिथुवेनिया ने उद्बोधन में कहा कि   विश्व में शांति और सदभाव वैदिक संस्कृति की मुख्य उद्देश्य रहे  है। चूंकि भारत वैदिक संस्कृति की जननी है जहां हम अपनी संस्कृति की मूल जड़ों की ओर लौट कर विश्व में शांति की स्थापन कर सकते हैं। श्री जोनास, संपादक इंडीजिनस ट्रेडिसन टुडे, ने अपने वक्तव्य में कहा कि लिथुवेनिया ने यूरोपियन संस्कृति के बीच अपनी धार्मिक-संस्कृति और विरासत को बनाए रखा है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता में ये समानताएँ देखने को मिलती है। कार्यक्रम के अगली कड़ी में श्री जिंटारक सोंगैला पूर्व नेता प्रतिपक्ष लिथुवेनिया संसद ने शोध-परक जानकारी देते हुए बताया कि भाषा विज्ञान की दृष्टि से भारत कि प्राचीन भाषा संस्कृत और यूरेशिया कि संस्कृति व भाषा एक दूसरे से संबद्ध है। कार्यक्रम में विशेष रूप से आमंत्रित रिटायर्ड मेजर सुरेन्द्र नारायण माथुर ने लिथुवेनिया से आए अतिथियों का परिचय कराते हुए बताया कि आज हम भारत में रहते हुए भी अपनी संस्कृति और सभ्यता भूलते जा रहे हैं पर सुदूर देश में बसे हमारे विदेशी बंधुओं ने आज भी हमारी वैदिक संस्कृति को विभिन्न रूपों में आत्मसात किए हुए हैं जिसकी छाप उनके वेष-भूषा, खानपान, तीज-त्योहार एवं देवी-देवताओं के रूप में देखने को मिलती हैं।  कार्यक्रम के अध्यक्षता कराते हुए कुलपति प्रोफेसर (डॉ.) मानसिंह परमार ने अपने उद्बोधन की शुरुआत वसुधेव- कुटुंबकम से की।  उन्होने कहाँ किभारत की  भारत कि संस्कृति में अनेक समांताए हैं जो कि विश्व-बंधुत्व व विश्व गुरु की कल्पना को पूर्ण करती है। कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. अतुल तिवारी ने प्रस्तुत किया। उक्त अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का संयोजन डॉ. आशुतोष मंडावी विभागाध्यक्ष विज्ञापन एवं जनसम्पर्क अध्ययन द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. संध्या शर्मा एवं सुश्री पूनम तिवारी द्वारा किया गया। कार्यक्रम में पंडित दीनदायल उपाध्याय शोधपीठ के अध्यक्ष श्री प्रवीण मैशेरी, माधव राव सप्रे शोधपीठ के अध्यक्षा सुश्री आशा शुक्ला के साथ ही जनसंचार एवं समाजकार्य अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. शहीद अली, पत्रकारिता अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष श्री पंकज नयन पांडेय, इलेक्ट्रानिक अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. राजेंद्र मोहंती, पत्रकारिता विभाग से श्री नृपेन्द्र शर्मा  के साथ विश्वविद्यालय परिवार के समस्त शिक्षकगण, अधिकारी-कर्मचारी एवं विद्यार्थीगण आदि मुख्य रूप से उपस्थित रहे।