Friday, February 16, 2018
Maoists should fight against Pak-sponsored terrorism: Ahir
Sunday, February 11, 2018
।।दीनदयाल उपाध्याय जी को शत् शत् नमन।।
दीनदयाल उपाध्याय का जन्म २५ सितम्बर १९१६ को जयपुर जिले के धानक्या ग्राम में, नाना चुन्नीलाल के यहाँ हुआ था | इनके पिता का नाम भगवती प्रसाद उपाध्याय था ये नगला चंदभान( फरह, मथुरा) के निवासी थे | माता रामप्यारी धार्मिक वृत्ति की थीं। पिता रेल्वे में जलेसर रोड स्टेशन पर सहायक स्टेशन मास्टर थे | रेल की नौकरी होने के कारण उनके पिता का अधिक समय बाहर ही बीतता था। कभी-कभी छुट्टी मिलने पर ही घर आते थे। थोड़े समय बाद ही दीनदयाल के भाई ने जन्म लिया जिसका नाम शिवदयाल रखा गया। पिता भगवती प्रसाद ने बच्चों को ननिहाल भेज दिया। उस समय उनके नाना चुन्नीलाल शुक्ल धनकिया में स्टेशन मास्टर थे। मामा का परिवार बहुत बड़ा था। दीनदयाल अपने ममेरे भाइयों के साथ खाते खेलते बड़े हुए।
३ वर्ष की मासूम उम्र में दीनदयाल पिता के प्यार से वंचित हो गये। पति की मृत्यु से माँ रामप्यारी को अपना जीवन अंधकारमय लगने लगा। वे अत्यधिक बीमार रहने लगीं। उन्हें क्षय रोग लग गया। ८ अगस्त १९२४ को रामप्यारी जी का देहावसान हो गया। ७ वर्ष की कोमल अवस्था में दीनदयाल माता-पिता के प्यार से वंचित हो गये।
उपाध्याय जी ने पिलानी, आगरा तथा प्रयाग में शिक्षा प्राप्त की। बी०.एससी० बी०टी० करने के बाद भी उन्होंने नौकरी नहीं की। छात्र जीवन से ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता हो गये थे। अत: कालेज छोड़ने के तुरन्त बाद वे उक्त संस्था के प्रचारक बन गये और एकनिष्ठ भाव से संघ का संगठन कार्य करने लगे। उपाध्यायजी नितान्त सरल और सौम्य स्वभाव के व्यक्ति थे।
सन १९५१ ई० में अखिल भारतीय जनसंघ का निर्माण होने पर वे उसके संगठन मन्त्री बनाये गये। दो वर्ष बाद सन् १९५३ ई० में उपाध्यायजी अखिल भारतीय जनसंघ के महामन्त्री निर्वाचित हुए और लगभग१५ वर्ष तक इस पद पर रहकर उन्होंने अपने दल की अमूल्य सेवा की। कालीकटअधिवेशन (दिसम्बर १९६७) में वे अखिल भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। ११ फरवरी१९६८ की रात में रेलयात्रा के दौरान मुगलसराय के आसपास उनकी असामयिक मृत्यु हो गयी।
विलक्षण बुद्धि, सरल व्यक्तित्व एवं नेतृत्व के अनगिनत गुणों के स्वामी भारतीय राजनीतिक क्षितिज के इस प्रकाशमान सूर्य ने भारतवर्ष में समतामूलक राजनीतिक विचारधारा का प्रचार एवं प्रोत्साहन करते हुए सिर्फ ५२ साल क उम्र में अपने प्राण राष्ट्र को समर्पित कर दिए। अाकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी दीनदयालजी उच्च-कोटि के दार्शनिक थे किसी प्रकार का भौतिक माया-मोह उन्हें छू तक नहीं सका।
।। शत् शत् नमन।।
Friday, February 9, 2018
शहीद गुण्डाधुर को शत्-शत् नमन।
Wednesday, February 7, 2018
कलश या कलाश लोग
रायपुर। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
रायपुर। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन सोमवार को किया गया। संगोष्ठी “भारतीय संस्कृति का वैश्विक स्वरूप एवं संचार” विषय पर आयोजित की गई। इस दौरान कार्यक्रम के मुख्यअतिथि के रूप लिथुवेनिया की गुरुमाता, संपादक इंडीजिनस ट्रेडिसन टुडे पूर्व एवं नेता प्रतिपक्ष लिथुवेनिया संसद मुख्य रूप से उपस्थित रहे। कार्यक्रम के मुख्यअतिथि के रूप में इनिया ट्रिकूनेइने गुरुमाता लिथुवेनिया ने उद्बोधन में कहा कि विश्व में शांति और सदभाव वैदिक संस्कृति की मुख्य उद्देश्य रहे है। चूंकि भारत वैदिक संस्कृति की जननी है जहां हम अपनी संस्कृति की मूल जड़ों की ओर लौट कर विश्व में शांति की स्थापन कर सकते हैं। श्री जोनास, संपादक इंडीजिनस ट्रेडिसन टुडे, ने अपने वक्तव्य में कहा कि लिथुवेनिया ने यूरोपियन संस्कृति के बीच अपनी धार्मिक-संस्कृति और विरासत को बनाए रखा है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता में ये समानताएँ देखने को मिलती है। कार्यक्रम के अगली कड़ी में श्री जिंटारक सोंगैला पूर्व नेता प्रतिपक्ष लिथुवेनिया संसद ने शोध-परक जानकारी देते हुए बताया कि भाषा विज्ञान की दृष्टि से भारत कि प्राचीन भाषा संस्कृत और यूरेशिया कि संस्कृति व भाषा एक दूसरे से संबद्ध है। कार्यक्रम में विशेष रूप से आमंत्रित रिटायर्ड मेजर सुरेन्द्र नारायण माथुर ने लिथुवेनिया से आए अतिथियों का परिचय कराते हुए बताया कि आज हम भारत में रहते हुए भी अपनी संस्कृति और सभ्यता भूलते जा रहे हैं पर सुदूर देश में बसे हमारे विदेशी बंधुओं ने आज भी हमारी वैदिक संस्कृति को विभिन्न रूपों में आत्मसात किए हुए हैं जिसकी छाप उनके वेष-भूषा, खानपान, तीज-त्योहार एवं देवी-देवताओं के रूप में देखने को मिलती हैं। कार्यक्रम के अध्यक्षता कराते हुए कुलपति प्रोफेसर (डॉ.) मानसिंह परमार ने अपने उद्बोधन की शुरुआत वसुधेव- कुटुंबकम से की। उन्होने कहाँ किभारत की भारत कि संस्कृति में अनेक समांताए हैं जो कि विश्व-बंधुत्व व विश्व गुरु की कल्पना को पूर्ण करती है। कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. अतुल तिवारी ने प्रस्तुत किया। उक्त अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का संयोजन डॉ. आशुतोष मंडावी विभागाध्यक्ष विज्ञापन एवं जनसम्पर्क अध्ययन द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. संध्या शर्मा एवं सुश्री पूनम तिवारी द्वारा किया गया। कार्यक्रम में पंडित दीनदायल उपाध्याय शोधपीठ के अध्यक्ष श्री प्रवीण मैशेरी, माधव राव सप्रे शोधपीठ के अध्यक्षा सुश्री आशा शुक्ला के साथ ही जनसंचार एवं समाजकार्य अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. शहीद अली, पत्रकारिता अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष श्री पंकज नयन पांडेय, इलेक्ट्रानिक अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. राजेंद्र मोहंती, पत्रकारिता विभाग से श्री नृपेन्द्र शर्मा के साथ विश्वविद्यालय परिवार के समस्त शिक्षकगण, अधिकारी-कर्मचारी एवं विद्यार्थीगण आदि मुख्य रूप से उपस्थित रहे।



























