Wednesday, November 20, 2019

काल विभाजन

  • प्रागैतिहासिक काल
  • 500,000 से पुर्व ऐतिहासिक काल
  • 500,000-10,000 ईसा पूर्व पाषाण काल संस्कृति - 100,000 ईसा पूर्व अफ्रीका में होमो सेपियंस सेपियंस (Homo Sapiens Sapiens) का उदय|
  • 10,000-4000 ईसा पूर्व मध्य पाषाण संस्कृति|
  • 4000 ईसा पूर्व नवपाषाण काल|
  • 3200 ईसा पूर्व सुमेर निवासियों (Sumerian) ने विश्व की पहली सभ्यता की स्थापना की।
  • 3000-2600 ईसा पूर्व हड़प्पा सभ्यता की शुरुआत।
  • 2600-2500 ईसा पूर्व हड़प्पा सभ्यता अपनी सबसे विकसित अवस्था में- 2200 ईसा पूर्व चीनी सभ्यता का उदय।
  • 2000-1900 ईसा पूर्व हड़प्पा सभ्यता का पतन और यह वैदिक परंपरा थी।
  • 1500-500 ईसा पूर्व वैदिक युग का प्रारंभ।
  • 1200-900 ईसा पूर्व चार संहिताओं अथर्ववेद, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद (Atharva Veda, Rig Veda, Sama Veda, Yajur Veda) की रचना हुई – 1200 ईसा पूर्व हिब्रू सभ्यता (Hebrew civilization) का उदय।
  • 1000 ईसा पूर्व आर्यों ने गंगा की घटी में प्रवास किया।
  • 800-700 ईसा पूर्व उपनिषदों की रचना हुई।
  • 600 ईसा पूर्व ऋग्वेद में सबसे प्राचीन तिथि किखी गयी।
  • 600 ईसा पूर्व सोलह महान राज्यों (महाजनपद) का उदय।
  • 563-483 ईसा पूर्व बुद्ध का जीवन काल।
  • 540-493 ईसा पूर्व बिम्बिसार का शासनकाल - 509 ईसा पूर्व रोमन गणराज्य की स्थापना।
  • 540-468 ईसा पूर्व चौबीसवें जैन तीर्थंकर महावीर का जीवन काल
  • 527 ईसा पूर्व बुद्ध ने पहला धर्मोपदेश दिया।
  • 517 ईसा पूर्व फारस (Persia) के हख़ामनी साम्राज्य (Achaemenid empire) ने गांधार पर कब्जा कर लिया।
  • 500 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र में मगध राज्य का उदय।
  • 490-459 ईसा पूर्व अजातशत्रु का शासनकाल।
  • 400 ईसा पूर्व महाभारत और रामायण की रचना।
  • 362-321 ईसा पूर्व उत्तर और मध्य भारत में नंद वंश का शासन।
  • 326 ईसा पूर्व सिकंदर ने सिंधु नदी को पार किया, सिकंदर और पोरस के बीच हायडापेस का युद्ध- प्राचीन ग्रीक भाषा में झेलम नदी को हायडापेस (Hydaspes) और ऋग्वेद में वितस्ता कहा गया है।
  • 321-297 ईसा पूर्व मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त (Chandragupta) का शासनकाल।
  • 321-296 ईसा पूर्व अर्थ शास्त्र की रचना।
  • 302 ईसा पूर्व यूनानी राजदूत मेगस्थनीस (Megasthenes) चंद्रगुप्त के दरबार में आया, जिसे यूनानी राजा सेल्यूकस प्रथम (Hellenistic king Seleucus I) ने भेजा था। मेगस्थनीस ने इंडिका (Indica) की भी रचना की थी। - चीन में महान दीवार का निर्माण।
  • 297-272 ईसा पूर्व बिन्दुसार का शासनकाल।
  • 268-231 ईसा पूर्व अशोक का शासनकाल।
  • 260 ईसा पूर्व अशोक द्वारा कलिंग की विजय।
  • 257-256 ईसा पूर्व अशोक के कलिंग शिलालेखों के साथ, 14 शिलालेखों का निर्माण।
  • 251 ईसा पूर्व अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र को सीलोन (श्रीलंका) बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भेजा।
  • 250-240 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध संगीति।
  • 242 ईसा पूर्व अशोक के सात स्तंभ शिलालेखों का निर्माण।
  • 240-232 ईसा पूर्व लघु स्तंभ शिलालेखों का निर्माण।
  • 184 ईसा पूर्व अंतिम मौर्य राजा ब्रिह्दार्थ की मृत्यु, शुंग राजवंश के राजा पुष्यमित्र का उदय।
  • 73 ईसा पूर्व अंतिम शुंग राजवंश के राजा देवभूति की हत्या।

भारतीय-बैक्ट्रियंस (Indo-Bactrians) एवं उत्तर पश्चिम भारत

  • 250 ईसा पूर्व बक्ट्रियन यूनानियों द्वारा ओक्सस नदी (Amu Darya, greek- Oxus River) के मैदानों पर राज्य की स्थापना।
  • 200-190 ईसा पूर्व देमेत्रियस (Demetrius) भारतीयों का राजा बना।
  • 166-155 ईसा पूर्व सबसे प्रसिद्ध इंडो-ग्रीक शासक मिनांडर (Menander) का शासन काल।
  • 150 ईसा पूर्व गांधार कला का विकास एवं प्रसार।
  • 140-130 ईसा पूर्व अंतिम भारतीय-बक्ट्रियन राजा हेलिओक्लीज (Heliokles) का शासन|
  • 94 ईसा पूर्व उत्तर-पश्चिम भारत में मॉएस (Maues), शक् या इंडो-पार्थियन राजाओं का शासन।
  • 78 ईसवी कनिष्क ने "गांधार के राजा” के रूप में कुषाण वंश की स्थापना की।

दक्षिण और मध्य भारत

  • 50 ईसा पूर्व- 50 ईसवी रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार अपनी ऊँचाईयों पर।
  • 5 ईसा पूर्व-ईस्वी 29, यीशु का जीवन और ईसाई धर्म का उदय।
  • 27 ईसा पूर्व-2 ईस्वी सातवाहन (आंध्र) राजवंश।
  • 68 ईसवी, मायलापुर, मद्रास में सेंट थॉमस का मौत।
  • 150 ईसवी, रुद्र्मन ने पश्चिमी भारत में शक् सत्ता की स्थापना की।
  • 174-203 ईसा पूर्व यजन के अंतर्गत आन्ध्र में विकसित राज्य की स्थापना।
  • 225 ईसा पूर्व सातवाहन वंश (आन्ध्र प्रदेश) का अंत।
  • 255 ईसा पूर्व-मध्य 6 वीं शताब्दी बुंदेलखंड के वाकाटक का शासन।
  • 325 ईसा पूर्व पल्लव वंश की स्थापना।

गुप्त वंश

  • 320-335 ईसवी चंद्रगुप्त प्रथम द्वारा गुप्त साम्राज्य की स्थापना।
  • 320 ईसवी पुराणों की रचना।
  • 335-380 ईसवी समुद्रगुप्त का शासनकाल।
  • 380–415 ईसवी चंद्रगुप्त द्वितीय या चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासन के दौरान गुप्त वंश का स्वर्ण काल। चन्द्रगुप्त द्वितीय के दरबार में कालिदास भी रहा करते थे।
  • 405-411 ईसवी चीनी तीर्थयात्री फ़ह्सिएन (Fa-hsien) का भारत में चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में आगमन।
  • 454 ईसवी जैन धर्म की वल्लभी परिषद् का आयोजन - श्वेतांबर और दिगंबर दो अलग संप्रदायों में उदभव।
  • 455-467 ईसवी स्कन्दगुप्त का शासनकाल, हूणों का उत्तर पश्चिमी भारत पर आक्रमण।
  • 543-566 ईसवी पुलकेशिन प्रथम के तहत बादामी के चालुक्यों के राजवंश की स्थापना।
  • 560-574 ईसवी सिम्हाविष्णु द्वारा कांची में पल्लव राजवंश की स्थापना।
  • 600-630 ईसवी महेन्द्रवर्मन के तहत पल्लव शक्ति का का विकास - 570-632 ईसवी मोह्हमद साहब का जीवन काल, 7-8 वीं शताब्दी इस्लाम की वृद्धि और प्रसार
  • 609-642 ईसवी पुलकेशिन द्वितीय के अंतर्गत चालुक्य शक्ति का विस्तार, दक्षिण भारत में प्रभुत्व के लिए पल्लव और चालुक्यों के बीच संघर्ष|
  • 752 ईसवी-10वीं के बीच राष्ट्र्कूटों द्वारा एलोरा गुफाओं का निर्माण।
  • 756-757 ईसवी एलोरा में कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण।

उत्तर भारत

  • 606-647 ईसवी कन्नौज के हर्ष वर्धन का
  • 629-645 ईसवी चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनसांग (Hsieun Tsang) की भारत यात्रा।
  • 630 ईसवी चालुक्यों द्वारा हर्ष वर्धन की पराजय।
  • 711 ईसवी में अरबों द्वारा सिंध की विजय, भारत में इस्लाम की स्थापना।
  • 736 ईसवी दिल्लिका (दिल्ली) स्थापित।
  • 750-770 ईसवी गोपाल द्वारा बंगाल में पाल वंश की स्थापना।
  • 752 ईसवी पल्लव राजा ने चालुक्यों को हराया।
  • 780 ईसवी उज्जैन में गुर्जर-प्रतिहारों ने अपनी शक्ति स्थापित की।
  • 788-836 ईसवी शंकराचार्य का जीवनकाल।
  • 814-840 ईसवी सबसे शक्तिशाली राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष का शासनकाल।
  • 836-885 ईसवी राजा भोज द्वारा प्रतिहार साम्राज्य की स्थापना।
  • 885-910 ईसवी राजा महेन्द्रपाल द्वारा प्रतिहार साम्राज्य का प्रसार।
  • 1077-1120 ईसवी पाल वंश के राजा रामपाल के तहत पाल राजवंश की शक्ति में वृद्धि।
  • 11वीं-13वीं शताब्दी में धर्मयुद्ध के परिणामस्वरूप पूर्व-पश्चिम में अधिक से अधिक संपर्क।
  • 1148 ईसवी कल्हण द्वारा राजतरंगिणी की रचना

दक्षिण भारत

  • 897 ईसवी राजा आदित्य द्वारा चोल राजवंश की स्थापना।
  • 907 ईसवी परांतक प्रथम के तहत चोलों की शक्ति में वृद्धि।
  • 939-968 ईसवी दक्कन में राष्ट्रकूटों का प्रभुत्व।
  • 973 ईसवी तायला, कल्याणी के चालुक्यों ने राष्ट्रकूटों को हराया, और बाद में चालुक्य वंश की स्थापना की।
  • 985-1016 ईसवी राजराजा प्रथम ने चोल साम्राज्य स्थापित किया।
  • 1016-1044 ईसवी राजेंद्र चोल का शासनकाल।
  • 1025 ईसवी चोलों दक्षिण पूर्व एशिया में नौसेना के साथ युद्ध का संचालन किया।
  • 1025-1137 ईसवी वैष्णव शिक्षक रामानुज का जीवनकाल।
  • 1077 ईसवी चोल व्यापारियों ने चीन की यात्रा की।
  • 1100 ईसवी रामानुज ने भक्ति आंदोलन का नेतृत्व किया।
  • 1246-1279 ईसवी राजेन्द्र तृतीय, अंतिम चोल राजा का जीवनकाल।

उत्तर भारत में ग़ज़नवी और ग़ोरी साम्राज्य

  • 971-1030 गजनी के महमूद का शासनकाल
  • 973–1048 अलबरूनी फिरदौसी का जीवनकाल
  • 997-1014 अफगानिस्तान में गजनी के महमूद का उत्तरी भारत पर आक्रमण एवं हर साल लूटपाट। मुह्हमद गोरी ने, गजनवी को हराया और पंजाब पर कब्ज़ा कर लिया।
  • 1175 मुहम्मद ग़ोरी का भारत पर पहला आक्रमण।
  • 1179 मुहम्मद ग़ोरी द्वारा पेशावर पर कब्ज़ा।
  • 1186 मुहम्मद ग़ोरी द्वारा लाहौर पर कब्ज़ा।
  • 1192 मोहम्मद गोरी ने तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज चौहान के नेतृत्व में राजपूतों को हराया।
  • 1193 मुहम्मद ग़ोरी ने दिल्ली और उत्तर भारत पर कब्ज़ा किया।
  • 1206 मुहम्मद ग़ोरी की लाहौर में हत्या कर दी गयी।

दिल्ली सल्तनत

  • 1206-1210 कुतुब-उद-दीन ऐबक ने मामलुक वंश (गुलाम वंश, या दिल्ली सल्तनत) की स्थापना की।
  • 1211-1136 शम्स-उद-दीन इल्तुतमिश का शासनकाल।
  • 1221-1222 मंगोल द्वारा उत्तर पश्चिम भारत में आक्रमण शुरू।
  • 1231 इल्तुतमिश द्वारा ग्वालियर पर कब्ज़ा।
  • 1235 उज्जैन पर कब्ज़ा|
  • 1236-1240 रजिया का शासनकाल।
  • 1240–1246 चालीस रईसों के एक विशिष्ट समूह द्वारा शासन।
  • 1246–1286 बलबन का शासन।
  • 1266-1286 बलबन द्वारा दिल्ली की मुस्लिम कला और अध्ययन केंद्र के रूप में स्थपना।
  • 1290 खिलजी वंश की स्थापना।
  • 1290-1296 पहले खिलजी शासक जलाल-उद-दीन फ़िरोज़ शाह का शासनकाल – मंगोलों के आक्रमण को रोका।
  • 1296-1326 अलाउद्दीन मुहम्मद खिलजी का शासनकाल।
  • 14 वीं सदी सुहरावर्दी, चिश्ती और फिरदौसी सूफी संप्रदाय का उदय। 1300 ईसवी एज़्टेक सभ्यता अपने चरमोत्कर्ष पर।
  • 1301 अलाउद्दीन मुहम्मद खिलजी द्वारा राजपूत किला रणथम्भौर पर कब्जा।
  • 1303 अलाउद्दीन मुहम्मद खिलजी द्वारा राजपूत किला चित्तौड़ पर कब्जा।
  • 1309-1311 अलाउद्दीन मुहम्मद खिलजी द्वारा दक्षिण भारत पर विजय।
  • 1316 शिहाब-अल-दीन उमर का शासनकाल।
  • 1316-1320 कुतुब-अल-दीन मुबारक शाह का शासनकाल।
  • 1320 तुगलकों ने, खलजियों को दिल्ली के सुल्तानों के रूप प्रतिस्थापित किया।
  • 1320-1324 गयासुद्दीन तुगलक शाह प्रथम का शासनकाल।
  • 1324-1351 मुहम्मद तुगलक शाह का शासनकाल।
  • 1334 मालाबार तुग्लकों के शासन से मुक्त हुआ।
  • 1336-1646 विजयनगर साम्राज्य।
  • 1337 बंगाल पर मलिक शम्स-उद-दीन का शासनकाल, तुग्लकों के शासन से मुक्त हुआ।
  • 1347-1526 बहमनी राजवंश।
  • 1351 गियास-अल-दीन महमूद शाह का शासनकाल।
  • 1351-1388 फ़िरोज़ शाह का शासनकाल।
  • 1388-1389 गियास-अल-दीन तुगलक शाह द्वितीय का शासनकाल।
  • 1389-1390 अबू बक्र शाह का शासनकाल।
  • 1390-1394 नासिर अल-दीन मुहम्मद शाह का शासनकाल।
  • 1394 अला-अल-दीन सिकंदर शाह का शासनकाल।
  • 1394-1412 नासिर अल-दीन महमूद शाह का शासनकाल।
  • 1398–1399 तैमुर लंग की सेनाओं द्वारा दिल्ली में लूटपाट।
  • 1414-1450 दिल्ली के सुल्तानों के रूप में सय्यदों का शासन।
  • 1440-1518 कबीर द्वारा सभी धर्मों की एकता का उपदेश।
  • 1450 में लोधियों ने सय्यदों को दिल्ली में प्रस्थापित किया।
  • 1469-1539 गुरु नानक, सिख धर्म के संस्थापक का जीवनकाल।
  • 1480-1564 कर्नाटक संगीत के संगीतकार पुरन्दर दास का जीवनकाल।
  • 1482-1673 अहमदनगर, बरार, बीजापुर के दक्षिणी सल्तनतों,
  • 1482-1673 दक्कन के सल्तनत अहमदनगर, बरार, बीजापुर, बीदर, और गोलकुंडा का उदय।
  • 1486-1533 हिंदू भक्ति के शिक्षक चैतन्य का जीवनकाल। 1492 कोलंबस ने अमेरिका के लिए पहली यात्रा की।
  • 1498 वास्को डा गामा द्वारा भारत में पुर्तगाली उपस्थिति स्थापित।
  • 1509-1529 विजयनगर पर कृष्णदेव राय का शासनकाल।
  • 1510 अफोंसो डी अल्बुकर्क के नेतृत्व में पुर्तगालियों ने गोवा पर अधिकार किया।
  • 1526 बाबर ने पानीपत की पहली लड़ाई में दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को पराजित किया।
  • 1530 बाबर की मौत और हुमायूं का शासन।
  • 1532-1623 तुलसी दास का जीवनकाल।
  • 1540 शेरशाह ने हुमायूं को पराजित किया, हुमायूं का फारस में निर्वासन।
  • 1551-1602 अबुल फज़ल का जीवनकाल।
  • 1555 हुमायूं की वापसी और हुमायूं द्वारा दिल्ली पर पुनः कब्ज़ा।
  • 1556 हुमायूं की मौत और अकबर गद्दी का उत्तराधिकारी बना। पानीपत का द्वितीय युद्ध।
  • 1556-1605 अकबर का शासनकाल। 1558 एलिजाबेथ प्रथम का इंग्लैंड में सिंहासन आरोहण।
  • 1563 हिंदुओं पर तीर्थयात्रा कर की समाप्ति।
  • 1564 गैर मुस्लिमों पर लगने वाले कर जिजया की समाप्ति।
  • 1571 फतेहपुर सीकरी में नई राजधानी का निर्माण।
  • 1573 गुजरात पर विजय।
  • 1575 इबादतखाना का निर्माण।
  • 1576 बंगाल पर विजय।
  • 1581 काबुल पर विजय।
  • 1582 अकबर द्वारा दीन-ए-इलाही का आरंभ।
  • 1584 फतेहपुर सीकरी का त्याग।
  • 1592 उड़ीसा की विजय।
  • 1595 बलूचिस्तान की विजय।
  • 1600 महारानी एलिजाबेथ प्रथम द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी को चार्टर दिया गया।
  • 1605-1627 जहांगीर का शासनकाल।
  • 1612 ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा सूरत में व्यापारिक केंद्र की स्थापना।
  • 1616-1618 सर थॉमस रो जहांगीर के दरबार में आया, ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में व्यापार करने के लिए अनुमति।
  • 1619 सूरत में ब्रिटिश "कारखाने" की स्थापना।
  • 1628-1658 शाहजहां का शासनकाल।
  • 1630-1680 मराठा वंश के संस्थापक, शिवाजी का जीवनकाल।
  • 1642 ब्रिटिश व्यापारिक किले फोर्ट सेंट जॉर्ज की मद्रास में स्थापना।
  • 1643 ताजमहल का निर्माण पूरा हुआ।
  • 1658-1707 औरंगजेब का शासनकाल।
  • 1664 फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना।
  • 1674 शिवाजी की छत्रपति के रूप में ताजपोशी।
  • 1679 औरंगजेब ने गैर मुसलमानों पर जिजया पुनः लगाया।
  • 1681 औरंगजेब ने दक्कन की विजय के लिए अभियान शुरू किया।
  • 1686 बीजापुर पर विजय।
  • 1689 गोलकुंडा पर कब्ज़ा, शम्भूजी को पकड़ कर हत्या की गयी।
  • 1690 जॉब चर्नोक ने कलकत्ता में ब्रिटिश व्यापारिक केंद्र की स्थापना की।
  • 1699 सिख खालसा दसवें गुरु, गोबिंद राय द्वारा स्थापित।

अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में मुगल

  • 1707-1712 बहादुर शाह का शासनकाल।
  • 1713-1719 फर्रुख़ सियर का शासनकाल। सैयद बंधु हुसैन अली और अब्दुल्ला का ‘राजा निर्माताओं’ के रूप में वर्चस्व।
  • 1714 पेशवा बालाजी विश्वनाथ के तहत मराठा शक्ति का उदय।
  • 1719 रफी-उद दरजात, रफी-उद दौलत, और निकुसियर का शासनकाल।
  • 1719-1748 मुहम्मद शाह का शासनकाल।
  • 1723 निजाम अल-मुल्क ने हैदराबाद में निज़ामी स्थापना की।
  • 1739 करनाल की लड़ाई। ईरान के नादिर शाह ने दिल्ली में लूटपाट की।
  • 1748-1754 अहमद शाह का शासनकाल। 1750 यूरोप में औद्योगिक क्रांति।
  • 1754-1759 आलमगीर द्वितीय का शासनकाल।
  • 1759-1806 शाह आलम द्वितीय का शासनकाल।
  • 1806-1837 अकबर द्वितीय का शासनकाल।
  • 1837-1857 बहादुर शाह द्वितीय का शासनकाल।

अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के भारत में ब्रिटिश

  • 1742-1763 दक्षिण भारत पर वर्चस्व के लिए, अपने वैश्विक युद्ध के परिणाम के रूप में ब्रिटिश और फ्रेंच में लड़ाईयां।
  • 1746 जोसेफ फ़्राँस्वा दुप्लेइक्स द्वारा मद्रास पर कब्जा।
  • 1746-1794 सर विलियम जोन्स का जीवनकाल।
  • 1748 अंग्रेजों ने मद्रास वापस प्राप्त किया।
  • 1751 रॉबर्ट क्लाइव ने अर्काट पर कब्जा किया।
  • 1756 कलकत्ता की ब्लैक होल घटना।
  • 1757 क्लाइव ने प्लासी की लड़ाई जीती।
  • 1760 में ब्रिटिश द्वारा फ्रांसीसियों की पराजय।
  • 1761 हैदर अली द्वारा मैसूर में मुस्लिम सत्ता स्थापना।
  • 1764 बक्सर की लड़ाई में ब्रिटिश जीत।
  • 1765 ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल की दीवानी मिली।
  • 1772–1785 वारेन हेस्टिंग्स, बंगाल का 1772-1773 गवर्नर जनरल; भारत का 1784-1785 गवर्नर जनरल।
  • 1774 रोहिल्ला युद्ध।
  • 1778 प्रथम मराठा युद्ध।
  • 1784 में बंगाल एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना।
  • 1786-1793 चार्ल्स कार्नवालिस, भारत का गवर्नर जनरल।
  • 1793 कार्नवालिस द्वारा स्थायी जमींदारी व्यवस्था की स्थापना।
  • 1789-1805 रिचर्ड कोले वेलेस्जली गवर्नर जनरल।
  • 1799 मैसूर के टीपू सुल्तान को श्रीरंगपट्टम में अंग्रेजों द्वारा हरा दिया गया।
  • 1801-1839 रणजीत सिंह द्वारा सिख साम्राज्य की स्थापना।
  • 1802 भसीन की संधि।
  • 1803 द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध।
  • 1805 जुलाई-अक्टूबर, चार्ल्स कार्नवालिस, गवर्नर जनरल बना।
  • 1805-1807 जॉर्ज बारलो कार्यवाहक गवर्नर जनरल बना।
  • 1807-1813 गिल्बर्ट इलियट, फर्स्ट अर्ल ऑफ़ मिंटो, गवर्नर जनरल।
  • 1813 ईसाई मिशनरियों का भारत आगमन।
  • 1813–1823 वारेन हेस्टिंग्स गवर्नर जनरल।
  • 1814-1816 आंग्ल-गोरखा युद्ध।
  • 1818 तीसरे मराठा युद्ध में, मराठों की हार।
  • 1817-1898 सैयद अहमद खान का जीवनकाल।
  • 1823-1828 विलियम पिट एमहर्स्ट गवर्नर जनरल।
  • 1826 बर्मा के साथ यांदबू की संधि।
  • 1827 शिमला का गर्मियों में कामकाज के लिए इस्तेमाल शुरू किया गया।
  • 1828 राम मोहन राय द्वारा ब्रह्म समाज की स्थापना।
  • 1828-1835 विलियम कैवेंडिश बेंटिक, गवर्नर जनरल।
  • 1829 सती प्रथा को अवैध घोषित किया गया।
  • 1835-1836 चार्ल्स थियोफिलस मेटकाल्फ, कार्यवाहक गवर्नर जनरल।
  • 1836-1842 जॉर्ज ईडन, ऑकलैंड का अर्ल, गवर्नर जनरल।
  • 1838-1842 पहला अफगान युद्ध।
  • 1839-1842 अफ़ीम युद्ध।
  • 1842-1844 एलनबरो गवर्नर जनरल|
  • 1843 सिंध पर ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा कब्जा।
  • 1844–1848 हेनरी हार्डिंग गवर्नर जनरल।
  • 1845 प्रथम सिख युद्ध।
  • 1848–1856 डलहौजी गवर्नर जनरल।
  • 1848-1849 द्वितीय आंग्ल सिख युद्ध।
  • 1849 ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा पंजाब का विलय।
  • 1852 द्वितीय बर्मा युद्ध।
  • 1853 मुंबई और ठाणे के बीच पहली रेलवे लाइन, कोलकाता और आगरा के बीच पहली टेलीग्राफ लाइन।
  • 1856 अवध का विलय।
  • 1856–1861 कैनिंग, भारत का गवर्नर जनरल और वाइसराय।
  • 1856-1920 बाल गंगाधर तिलक का जीवनकाल।
  • 10 मई 1857, भारतीय विद्रोह की शुरुआत।
  • 1858 में महारानी की घोषणा।
  • 1862–1863 एल्गिन भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1864–1869 जॉन लारेंस भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1865 इंग्लैंड और भारत के बीच टेलीग्राफ कनेक्शन।
  • 1866-1915 गोपाल कृष्ण गोखले का जीवनकाल।
  • 1867 प्रेस और पुस्तक पंजीकरण अधिनियम लागू।
  • 1869–1872 मेयो भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1869-1948 मोहनदास करमचंद गांधी का जीवनकाल।
  • 1872 भारत की पहली जनगणना।
  • 1872–1876 नार्थब्रुक भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1875 मुहम्मद एंग्लो ओरिएंटल कालेज अलीगढ़ में स्थापित।
  • 1875 मेयो कॉलेज अजमेर में स्थापित।
  • 1875-1950 सरदार वल्लभभाई पटेल का जीवनकाल।
  • 1876 रॉयल टाइटल अधिनियम द्वारा महारानी विक्टोरिया, भारत की महारानी बनी।
  • 1876–1880 लिटन भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1876-1948 मोहम्मद अली जिन्ना का जीवनकाल।
  • 1878 वर्नाकुलर प्रेस एक्ट एवं दूसरा आंग्ल-अफगान युद्ध।
  • 1880–1884 रिपन भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1880 मेवंद (अफगानिस्तान) का युद्ध, लार्ड रॉबर्ट्स ने कंधार की ओर कूच किया।
  • 1882 मद्रास के पास थियोसोफिकल सोसायटी के मुख्यालय की स्थापना।
  • 1883-1884 इल्बर्ट विधेयक विवाद।
  • 1884–1888 डफरिन भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1885 बंबई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना तीसरा आंग्ल-बर्मा युद्ध।
  • 1886 बर्मा को कब्जे में लिया गया।
  • 1888–1894 लैंसडाउन भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1889 पंजाब में अहमदिया संप्रदाय स्थापित किया गया।
  • 1889-1964 जवाहर लाल नेहरू का जीवनकाल।
  • 1891 सहमति अधिनियम लागू (Age of Consent Act) किया गया।
  • 1892 भारतीय परिषद अधिनियम लागू किया गया।
  • 1894-1899 एल्गिन भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1895-1951 लियाकत अली खान का जीवनकाल।
  • 1899–1905 कर्जन भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।

बीसवीं सदी से 1947 तक

  • 1900 उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत बनाया।
  • 1904 तिब्बत में यंगहसबंद अभियान।
  • 1905 बंगाल का विभाजन।
  • 1905–1910 मिन्टो भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1906 ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की स्थापना।
  • 1907 कांग्रेस सूरत में उदारवादियों और चरमपंथियों (नरम दल व गरम दल) के बीच विभाजित।
  • 1908 समाचार पत्र अधिनियम।
  • 1909 तिलक राजद्रोह का दोषी पाया। भारत के कानून की परिषदों (मिंटो-मोर्ले सुधारों) की स्थापना। लार्ड सिन्हा गवर्नर-जनरल की परिषद के लिए नियुक्त।
  • 1910 श्री अरविंद घोष द्वारा पांडिचेरी में आश्रम की स्थापना।
  • 1910 समाचार पत्र (अपराध के लिए उकसाना) अधिनियम।
  • 1911 में दिल्ली दरबार। भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित कर दी गयी। बंगाल के विभाजन को रद्द कर दिया।
  • 1911–1916 हार्डिंग भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1913 रवीन्द्रनाथ टैगोर को साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार।
  • 1915 भारत रक्षा अधिनियम। प्रथम विश्व युद्ध, 1914-1918।
  • 1916 ऑल इंडिया मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच लखनऊ समझौता। होम रूल आंदोलन।
  • 1916–1921 चेम्सफोर्ड भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1917 मोंटेग्यू घोषणा।
  • 1917-1984 इंदिरा गाँधी का जीवनकाल।
  • 1918 में भारत सरकार अधिनियम (मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार)।
  • 1919 रोलेट अधिनियम। अमृतसर (जलियांवाला बाग) नरसंहार।
  • 1920 महात्मा गांधी के पहले असहयोग आंदोलन की शुरूआत।
  • 1920-1924 खिलाफत आंदोलन।
  • 1921–1926 रीडिंग भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1921-1992 सत्यजीत रे का जीवनकाल।
  • 1922 चौरा चौरी घटना। गांधीजी को छह साल की कैद की सजा सुनाई गयी। स्वराज पार्टी का गठन।
  • 1924 गांधी जेल से रिहा।
  • 1925 मुद्दिमन समिति की रिपोर्ट। सिख गुरुद्वारा अधिनियम।
  • 1925–1931 इरविन भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1927 साइमन कमीशन नियुक्त।
  • 1928 नेहरू रिपोर्ट। लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत।
  • 1929 में मोहम्मद अली जिन्ना का चौदह सूत्रीय फार्मूला।
  • 1930 जनवरी 26, स्वतंत्रता दिवस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा घोषित। दांडी यात्रा। साइमन कमीशन की रिपोर्ट प्रस्तुत। प्रथम गोलमेज सम्मेलन। सर मुहम्मद इकबाल द्वारा मुस्लिम राज्य के निर्माण की मांग।
  • 1931 मुंबई में पहली भारतीय फिल्म का निर्माण। गांधी-इरविन पैक्ट। दूसरा गोलमेज सम्मेलन। भारतीय प्रेस (आपातकालीन शक्तियां) अधिनियम।
  • 1931–1936 विलिंगटन भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1932 अगस्त 16, सांप्रदायिक पुरस्कार। तीसरा गोलमेज सम्मेलन।
  • 1935 भारत सरकार अधिनियम।
  • 1936–1943 लिनलिथगो भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1937 आम चुनाव। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा सात प्रांतों में सरकार का गठन।
  • 1939 भारत रक्षा अधिनियम। 1939-1945 द्वितीय विश्व युद्ध। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रांतीय सरकारों ने इस्तीफा दिया। 22 दिसंबर, ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने मुक्ति दिवस मनाया।
  • 1940 अगस्त प्रस्ताव।
  • 1941 मार्च 23, ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की लाहौर घोषणा, पाकिस्तान की मांग।
  • 1942 क्रिप्स मिशन। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 'भारत छोड़ो' अभियान।
  • 1943 में बंगाल का अकाल। सुभाष चंद्र बोस द्वारा इंडियन नेशनल आर्मी का गठन।
  • 1943–1947 वेवेल भारत का गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1944 गांधी-जिन्ना वार्ता।
  • 1945 देसाई-लियाकत समझौता। 27 जून से 14 जुलाई, पहला शिमला सम्मेलन।
  • आम चुनाव।
  • 1946 कैबिनेट मिशन। अगस्त 16 ऑल इंडिया मुस्लिम लीग द्वारा सीधी कार्रवाई दिवस (Direct Action Day)। नोआखली के दंगे। दूसरा शिमला सम्मेलन। अंतरिम सरकार का गठन।
  • 1947 20 फ़रवरी, प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली का बयान। माउंटबेटन गवर्नर जनरल और वायसराय। 3 जून की योजना, भारत की स्वतंत्रता और विभाजन की घोषणा। अगस्त 14, भारत और पाकिस्तान की आजादी।

1947 के बाद का भारत

  • 1947-1948 लुईस माउंटबेटन गवर्नर जनरल एवं वाइसराय।
  • 1947-1964 जवाहरलाल नेहरू भारत के प्रधानमंत्री।
  • 30 जनवरी 1948, मोहनदास करमचंद गांधी की हत्या। हैदराबाद पर आक्रमण और विलय।
  • 1948-1950 चक्रवर्ती राजगोपालाचारी भारत के गवर्नर जनरल।
  • 26 जनवरी 1950, डा. भीम राव अंबेडकर द्वारा निर्मित भारतीय संविधान अस्तित्व में आता है। राजेन्द्र प्रसाद, भारत के प्रथम राष्ट्रपति। राष्ट्रीय योजना आयोग की स्थापना। वल्लभभाई पटेल की मौत। मदर टेरेसा द्वारा चैरिटी ऑफ़ मिशनरीज स्थापित।
  • 1951 प्रथम पंचवर्षीय योजना।
  • 1952 पहला आम चुनाव।
  • 1955 बांडुंग सम्मेलन।
  • 1956 भारत के पहले परमाणु रिएक्टर आपरेशन ने काम करना शुरू किया। राज्य पुनर्गठन अधिनियम। दूसरी पंचवर्षीय योजना।
  • 1957 में जम्मू-कश्मीर के भारत में शामिल। दूसरा आम चुनाव।
  • 1959 में दलाई लामा का तिब्बत से भारत के लिए पलायन।
  • 1960 दिल्ली से दूरदर्शन का प्रसारण। पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि।
  • 1961 गोवा पर आक्रमण किया और विलय।
  • 1962 नागालैंड राज्य का गठन। पूर्वोत्तर में भारत और चीन के साथ सीमा युद्ध।
  • 1962-1967 सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के राष्ट्रपति।
  • 1964 मई 24, जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु।
  • 1964-1966 लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री।
  • 1965 पाकिस्तान के साथ युद्ध।
  • 1966 पाकिस्तान के साथ ताशकंद समझौता। इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी।
  • 1967 चौथा आम चुनाव।
  • 1967-1969 जाकिर हुसैन भारत के राष्ट्रपति।
  • 1968 हरित क्रांति की शुरूआत।
  • 1969-1974 वराहगिरि वेंकट गिरि, भारत के राष्ट्रपति। मानव का चन्द्रमा पत पहला कदम 1969।
  • 1971 प्रिंसेस प्रिवी पर्स समाप्त कर दिया। शांति, मैत्री और सहयोग पर भारत-सोवियत संधि। 4 दिसंबर, पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तान के साथ युद्ध।
  • 1974 मई 5, भारत द्वारा परमाणु परीक्षण।
  • 1975 26 जून, "राष्ट्रीय आपातकाल" इंदिरा गांधी द्वारा घोषित।
  • 1977-1979 मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने।
  • 1980 में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री पद के लिए दुबारा चुनी गयीं।
  • 1984 जून, अमृतसर में, 'ऑपरेशन ब्लूस्टार'। अक्टूबर 31, इंदिरा गांधी की हत्या। राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने।
  • 1985 नई आर्थिक नीति।
  • 1987 मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और गोवा नए राज्य बने। जुलाई, भारतीय-श्रीलंका ने संधि पर हस्ताक्षर किए।
  • 1989 विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने।
  • 1990 चन्द्र शेखर प्रधानमंत्री बने।
  • 1991 मई 21, राजीव गांधी की हत्या। पी वी नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने।
  • 1992 अक्टूबर, बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया।
  • 1996 तेरह दिनों के लिए अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। एच डी देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बने।
  • 1997 इंदर कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने।
  • कोचेरी रमन नारायणन भारत के राष्ट्रपति। 29 सितंबर, भारत ने अंतरिक्ष में रॉकेट भेजने की शुरूआत की।
  • 1998 मार्च 20, अटल बिहारी वाजपेयी, प्रधानमंत्री। 11-13 मई, भारत ने परमाणु परीक्षण किया। 13 मई, संयुक्त राज्य अमेरिका ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाया। ईसाइयों के खिलाफ हिंसा।
  • 2004 आम चुनावों में कांग्रेस सत्ता में लौटी।
  • २०१४ लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को बहुमत ;  नरेन्द्र भाई मोदी प्रधानमन्त्री बने।

Sunday, October 27, 2019

पूरब से पश्चिम तक हर जगह राम .

पूरब से पश्चिम तक हर जगह राम .

भारत की जिवंत संस्कृति, अध्यात्म संस्कृति और आत्मशक्ति के प्रतिनिधि राम और उसकी रामकथा में हैं, राम की कथा चतुर्दिक है. पूरब से पश्चिम तक राम के मूल्य और आदर्श किसी न किसी रूप में मौजूद है, जो भारत की अध्यात्मिक पहचान से सांस्कृतिक पहचान को जोड़ते है, वाल्मीकि की रामायण अपने अलग अलग रूपों में कई देशों में मौजूद है, जैसे- रामवत्थु(बर्मा), रामकियेन अथवा रामकीर्ति (थाईलैंड), रामकोर (कम्बोडिया), मलेराज कथाव (सिंहली), काकविन रामायण(इंडोनेशिया), रामकेर्ति-रियामकेर (कम्बोडिया), काव्यादर्श(तिब्बती), होबुत्सुशु (जापानी), फ्रलक-फ्रलाम-रामजतक(लाओस), हिकायत सेरीराम(मलेशिया), खोतानी रामायण(तुर्किस्तान), जीवक जातक(मंगोलिया), मसीही रामायण(फारसी) आदि. ये ग्रन्थ यह सन्देश देते हैं की राम और उनके आदर्श किसी न किसी रूप में मौजूद है. मेडागास्कर से ऑस्ट्रेलिया तक देश द्वीपों तक राम रमते हैं. अब तो पाश्चात्य देशों में विशेषकर रूस, जर्मनी, अमेरिका आदि देश में राम की प्रतिष्ठा व् प्रासंगिकता बढ़ रही है. श्री राम तमाम देशों की लोक  कलाओं, नुक्कड़ नाटकों व् रामलीलाओं वहां की जनजीवन से जुडी परम्पराओं, नामों, या वंशावलियों में दिखाई देते हैं. मलेशिया में मुस्लिम अपने नाम के साथ राम, लक्ष्मण व् सीता नाम जोड़ते हैं. थाईलैंड में पुराने राजाओं में भारत की तरह राम के खडाऊ लेकर राज करने की परंपरा मौजूद थी और थाई राजा स्वयं को रामवंशी मानते हैं. वहां तो अजुधिया, लवपुरी व् जनकपुर जैसे नगर भी हैं. हिन्दचीन में कुछ शिलालेखों में राम नाम का वर्णन मिलता है यहाँ की मान्यताओं व्  परम्पराओं के अनुसार यहाँ के निवासी स्वयं को वानर कुल नसे उत्पन्न मानते हैं और राम को अपना प्रथम शासक. जावा में राम राष्ट्र में पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्टित हैं जबकि सुमात्रा के जनजीवन में रामायण ठीक उसी प्रकार से अनुप्राणित हैं जैसे भारतीय जनजीवन में. दक्षिण पूर्व एशिया में काव्यों के साथ साथ पत्थर की शिलाओं पर भी राम कथा की व्यंजन अपने वैभवशाली रूपों में हुई है. इस दृष्ठि से इंडोनेशिया की प्रम्बनान की शिला चित्रकारी सबसे ऊपर है, जहाँ संपूर्ण रामकथा का अंकन किया गया है. इसके अलावा कम्बोडिया के अंकोरवाट, अन्कोरथाम आदि स्थानों पर रामकथा शिलाओं पर उकेरी गई है. अंकोरवाट का महत्व इसलिए है क्योंकि इसकी प्रस्तुति वाल्मीकि रामायण के अनुरूप हुई हैं. थाईलैंड के बंकोक के राजभवन परिषर के दक्षिणी किनारे स्थित एक बौद्ध विहार में रामकथा के १५२ शैलचित्र है. दक्षिण पूर्व एशिया के उन देशों में जहाँ धर्म इस्लाम होने बाद भी संस्कृति में राम ही रचे बसे हैं राम का चरित्र उनके लोकजीवन में इतना गहराई तक जुड़ा है की राम उनकी संस्कृति हा मूल अधर बन गए हैं. एक विएतनामी कलाकार के अनुसार राम कथा जीने का सही तरीका सिखाती है. यही कारन है की दुनिया की सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया में रामायण(काकविन रामायण) पवित्र  राष्ट्रीय पुस्तक है. मलेशिया के अनेक मुसलमान रामकथा के मंचन में कलाकार, दर्शक व् आयोजक के रूप में चढ़-बढ़कर हिस्स लेते है. थाईलैंड के अधिकांश निवासी बौद्ध धर्मं के उपासक होने के बाद भी उनके रजा अपने नाम के साथ राम लगते आये हैं. इस दृष्टि से रामायण का मूल स्थान भले ही भारत है पर वह मलेशिया, सिंगापूर, कम्बोडिया, थाईलैंड आदि की संस्कृति का अभिन्न अंग है.


Tuesday, April 2, 2019

https://ritam.app/t/26417?guid=7e7d0ab2-44a8-43cb-bb91-2993c8d59e2f&platform_id=5 Ritam - ऋतम् --- सोच आपकी दहलीज़ पर https://appritam.com/

Tuesday, February 27, 2018

जनजाति प्राचीन ग्राम व्यवस्था

कोयापुनेमी पंहादी पारी कुपार लिंगो के व्दारा इस "दुनियां" में सर्वप्रथम 750 गोत्र में बाटा गया जो "प्रकृति सम्मत "बनाये गये .." नार व्यवस्था," "रावेन व्यवस्था, "आदिवासी कोयतोर व्यवस्था," "गोटूल व्यवस्था"बनाया गया था। जो आज भी निरन्तर संचालित होता आ रहा है। पर वही शहर एवं शहर से सटे गांव के कुछ पढ़े लिखे बुद्धिजीवी वर्ग के लोग बहारी अंधविश्वासी संस्कृति,रीति,रिवाज एवं धर्मिक संरचनाओं के आडम्बरो में लीन हो चुके है। जिनको अनादिकाल से चलते आ रही वेल डिज़ाइन नार(गांव) व्य्वस्था जो कि रूढ़ि और प्रथा है जिसमे ग्राम सभा को पांचवी अनुसूची 244 (1 व 2) में पूर्ण स्वशासन एवं नियंत्रण की शक्ति प्राप्त है। जो कि हर किसी को आसानी से समझ नही आती है।
यह लेख समाज के उन पढ़े लिखे बुद्धिजीवी वर्ग के लोगो को नार व्य्वस्था को समझाने एवं उनके अंदर समाज के प्रति अपनी सहभागिता बनाये रखने अपनी रूढ़ि प्रथा को समझाने का एक छोटा सा प्रयास है।

बस्तर में जब कोई गांव(नार)बसाया जाता है। तो सबसे पहले किसी गाँव(नार) के गायता एवं ग्राम प्रमुख के द्वारा गांव(नार) में माटी की स्थापना कि जाति है।जिसे जिमेदारीन कहते है। गांव बसने के बाद आदिवासी गोत्र में पीढ़ी दर पीढ़ी उपासना करने करने वाले पुरखा(देव) होते है, साथ ही गाँव(नार) की सुरक्षा के लिए अन्य (देवी देवताओं) पेन पुरखों को स्थापित किया जाता है।
◆नार व्यवस्था :--जिम्मेदारिन,तलुरमुत्ते,शीतला याया,मावली याया ,दरसवाली, गढ़ियां याया.

◆नार नाग मुख पेनक:--जागा भूमियार्क,भैसासुर राव, भीमालपेन,कडरेंगाल ,भुकरा राव, चूहका राव.

◆10 रावपेन :- राजा राव, कप्पेराव, कोडाराव, हन्दराव, घाटराव, पैटर्न, डण्डराव, बैहाराव, अंगरी राव, बगरी राव.

◆कैना नाग पोरोईंग.. कैना कोडो :--घाट कन्याग, बही कन्याग, बैदर कन्याग, उजरी कन्याग, बगरी कन्याग, सुल्की कन्याग, जलकमति कन्याग, मुरयेर कन्याग, तोन्दे कन्याग!
सभी का दायित्व गांव(नार) की सुरक्षा करना होता है। रावपेन गांव(नार)की सुरक्षा करते है। बस्तर के गांव में अनादिकाल से आदिवासियों के अलावा अन्य जाती के लोग भी निवास करते है। जब यहाँ बाहरी धार्मिक आडम्बरो का आगमन नही हुवा था तब इस नार(गांव) व्य्वस्था के अनुसार सभी समाज जाती के लोग संचालित होते थे तथा इन पेन पुरखों (देवी-देवताओं) की आराधना सभी लोगो के द्वारा की जाती है।प्रत्येक गांव के सभी जातियों में एक निशित प्रकार की धार्मिक व्यवस्था पाया जाता है। तथा उनके द्वारा निशि्चत प्रकार का धार्मिक रूढ़ि प्रथा देव पूजन में पूर्ण योगदान दिया जाता है जैसे कि---
*1)धड़वा--* समाज के लोग के द्वारा देव पूजन समाग्री हेतु समाग्री बनाई जाती है या लाई जाती है। जैसे-- पेन पुरखों (देवी-देवताओं) के आभूषण  बाजूबंद, पैजनी, बाजनी पौड़ी, देव पूजन समाग्री में कलश, गुब्बा, घण्टी, मोहरी, तोड़ी आदि आदि बना कर धार्मिक रूढ़ि प्रथा व्य्वस्था देव कार्य मे सहयोग प्रदान करते है।
*2)लोहार* --- समाज के लोगो के द्वार पूजन समाग्री--- काटाकुरची(काटा झूला), देव मुकुट, बरछी, भाला, घोड़ा, खुटा दिया तथा वाद्ययंत्रों में नगाड़ा, चिलकुली, झुमका बगड़ी आदि बना कर धार्मिक रूढ़ि प्रथा व्य्वस्था देव कार्य मे सहयोग करते है।
*3)कुम्हार ---* समाज के लोगो के द्वारा देव कार्य हेतु----- हाथी, घोड़ा, बेदरी, हुमनी, रूखी दिया, करसा आदि बना कर धार्मिक रूढ़ि प्रथा व्य्वस्था देव कार्य मे सहयोग किया जाता है।
*4)बढ़ाई---* समाज के लोगो के द्वारा देव पूजन हेतु देव पीढा, डूमर सोली, डूमर पायली, देव कुरची, देव झूला आदि का निर्माण कर देव कार्य मे सहयोग दिया जाता है।
*5)कोस्टा/माहार----* समाज के लोगों के द्वारा देव कार्य हेतु कपड़ा बुना जाता है। डांग के ध्वज एवं देवी देवताओं के वस्त्र तैयार करने हेतु आज भी कपड़ा इन्ही के द्वारा बना जाता है।
*6)बंजारा----* समाज के लोगो के द्वारा देवी देवताओं के वस्त्रों को शृंगार किया जाता है। काचडी, जैकेट लहंगा, केटवा जिन्हें कौड़ियों एवं चमकीले रंग बी रंगे पत्थर एवं कांच से सजा कर तयार किया जाता है।
*7)राउत(यादव/अहीर)----* समाज के लोगो के द्वारा पानी लाया जाता है जिससे देवी देवताओ को स्नान कराया जाता है। तथा राउत के द्वारा बनाया गया भोजन सभी को ग्रहण होता है।
*8)तेली---* समाज के लोगो के द्वारा इनके द्वारा घर से बना कर लाया गया तेल से देवी देवताओं के गुड़ी में राउड में दीपक जलाया जाता तथा तेल की व्य्वस्था करता है।
*9)कलार---* समाज का व्यवसाय महुवे की शराब बनाने का था। इनके द्वारा बनाई गई शराब देवताओं, पुरखों को अर्पित एवं विभिन्न देव कार्य हेतु शराब का उपयोग किया जाता है।
‌*10)गाड़ा---* समाज के लोगो के द्वारा देव कार्य में शादी विवाह में वाद्ययन्त्र बजाते है। इनके वाद्ययन्त्र पर देवी देवताओं का नृत्य(जतरा)होता है। जिसमे मोहरी वादक की मुख्य भूमिकाभूमिका होता है | ढफरा , निशान , तुडबुडी आदि वाघ यंत्रो का प्रयोग कर देवी कार्य मे  अपनी अहम भूमिका निभाते है |
*11) सिंसोनार(सोनार) -* समाज के लोग  देवी देवताओ के लिए सोना चांदी के आभुषण का निर्माण करते है तथा पीढी दर पीढी विशेष अवसर पर देवी देवताओ को सजाते है।
*12) मरार (माली)-* समाज के लोग के व्दारा मडाई के दिन देवी देवताओ के लिए निशुल्क फुल और मालाओ की व्यवस्था की जाती है  एवं  विशेष पर्व शादी मे छिंद के पत्ते को गुथ कर  और बनाकर देवताओ  मे चढा कर  देव आराधना  की जाती है

|| यह जानकारी  ली गई है वह गयता, सिरहा पटेल, मांझी ,मुखिया से लिया गया है।।

Monday, February 26, 2018

जनजाति आस्था, परंपरा एवं संस्कृति

जनजाति आस्था, परंपरा एवं संस्कृति 
भारतीय सनातन संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति है। अध्यात्मिक सौंदर्य, श्रेष्ठ मानवीय गुणों की श्रेष्ठता तथा शाश्वत नैतिक मूल्य के कारण भारतीय सनातन संस्कृति में  प्रकृति के भांति समन्वय की अद्भुत क्षमता है। भारत माता के देश में अनेक विदेशी आक्रमणकारी आये तथा देश में अपना राजनैतिक प्रभुत्व भी स्थापित कर लिया, यहां तक की भारतीयों को बलात अन्य धर्मों को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया गया ऐसे संकट काल में भी भारतीय संस्कृति में आत्म दीपों भवः की भावना जनतातियों में बनी रही।  भारतीय जनजाति सनातन संस्कृति विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति है। देव संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि इसमें ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः‘‘ की भावना निहित है। जो मनुष्य तक ही सीमित न होकर समस्त प्राणी जगत के लिए स्वीकार की है। इसी कारण भारत माता देश में प्रकृति पुजारियों ने नदी, नाले, तालाबों, झरनों, पर्वतों, शिखरों, गुफा, कंदराओं, लता, बेल, वृक्ष, पशु-पक्षी में भी देवशक्तियों को अवतरित कर उनके प्रति आदर भाव प्रदर्शित किया है। ऐसे उदार भाव संसार के अन्य किसी संस्कृति में नहीं पायी जाती। प्रकृति पूजा की परम्परा आदि काल से ही संचालित परिचालित है प्रकृति एवं मानव का सहजात संबंध रहा है। मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक तथा मानवीय सामाजिक व्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए प्रकृति सदा से ही सहयोगी रही है। भारतीय आदि संस्कृति इसी भावना से अनुप्रेरित रही है। यही कारण है प्रकृति पुजारी देव कबीलों में प्रकृति सबके लिए है, बिना भेदभाव के है, प्रकृति के नियम लुप्त गुप्त है, उसी पर आधारित इनका जन्म से लेकर मृत्योपरांत तक जीवन है। इसलिए सर्व धर्म सम्मान के अनुकूल है। जीवन चक्र स्वार्थी नहीं परमार्थी और परिश्रमी है प्रकृति ही उनका गुरू है और ग्रंथ है। इसी कारण भारत देश को विश्व गुरू कहा गया है। अतः किसी केा भी लूट-पाट, छीना छपटी, छल-कपट, करने की कभी आवश्यकता ही नहीं पड़ी। समस्त छोटे छोट मानव समूहों के अपने समूह, समुदायों के कठोर नियमों से बंधे सब कुछ व्यवस्थित, शांतिपूर्ण जीवन जीते हुए, देश को संपन्नता की उंचाइयों तक ले जा सके और देश को सोने की चिडि़या कहलवा सके। पशुपालन से देश में दूघ की नदियां बहा दीं, और सृष्टि प्रकृति के गूढ़तम रहस्यों को आत्मज्ञान में जागृत कर अघ्यात्म गुरू का स्थान भारत को दिलाया तब यहां मानव-मानव में कोई उंच नीच, अमीर गरीव, का भेद नहीं था। कबीलों के सरदार ही अपने अधिकृत भूभाग के राजा थे। प्रजा के अंदर नाम मात्र का राज्य भार होता था। स्वतंत्रता पूर्वक अपने कार्यों को संपन्न कराने में दक्ष थे। पूरा अखण्ड भारत देश के एक सूत्र में संगठित था। उसने कभी भी कल्पना भी नहीं कि थी कि हमारी सम्पन्नता व सुख शांति, अमन चैन की जीवन शैली में बाहरी आक्रमणकारियांे का इस तरह हस्तक्षेप होगो कि तिनका तिनका बिखर जावेगा। वर्तमान में भारत की आबादी 1 अरब, 21 करोड़, 5 लाख, 69 हजार 5 सौ 73 है जिसमंे 4693 समुदाय, 4500 सजातीय समुह, 325 बोलियंा व 25 लिपिया हैं। तथा मानव प्रजातियां 4 तरह की हैं- 1. भारतीय यूरोपीय 2. द्रविड़ 3. तिब्बती वर्मी 4. आस्ट्रो एसियाई है। वैज्ञानिकों की यह रिपोर्ट है कि आधुनिक मानव आज से करीब 1,50,000 वर्ष पहले पूर्वी आफ्रिका में हुए और वहां से प्रथम फैलाव भारत में हुआ। दुनियां की सभी प्रारंभिक ज्ञात मानव अनवांशिक शाखाएं भारत में पाइ जाती है। भारत , आफ्रिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा जीन भंडार वाला देश है और यहीं से अनुवांशिक बीज पूरी दुनिया में फैला। ऋगवेद प्रथम साहित्य स्रोत है जिसमें हमे उन लोगों के बारे में पता चलता है कि जो ई.पू. 1500 के लगभग भारत आकर बसे थे यह ीवह समय था जब भारत देश पर विदेशी आक्रमणकारी पार्शिया के लोग आक्रमण किये। लगभग 8वीं शताब्दीं में अरब मुसलमानों द्वारा भारत पर आक्रमण किया गया और पर्शिया आक्रमण से  टूटे बिखरे भारतियों को मुटठी भर सैनिको के सहारे पूरे भारत को अपने आधिपत्य मेें कर लिया। इन्होने बलात धर्म परिवर्तन कर मुसलमानों की संख्या बढ़ाई तथा प्राचीन भारत के देवी देवताओं को खंडित किया, स्थानों के नाम मुस्लिम धर्म अनुसार कर डाला। हिंदु मुस्लिम और जनजातियांे के फूट का लाभ लेते हुए 17वीं शताब्दी में अंग्रेजों ने तीसरे विदेशी आक्रमणकारियों के रूप् में भारत पर आक्रमण कर अपना आधिपत्य जमा लिया। और भारत का अधिक मात्रा में धर्म परिवर्तन कर देश का नाम इंडिया रख डाला। पार्शिया के आक्रमण के बाद विरोध स्वरूप् दो धर्मांे का उदय हुआ। प्रथम बौद्व धर्म दूसरा जैन धर्म तथा हिंदू, मुस्लिम इसाई तीनों धर्मों के विरोध स्वरूप् सिक्ख धर्म का उदय हुआ।
धर्म क्या है .....................
धर्म वह धारक तत्व है जो समस्त विश्व का प्राण व परिचालित करने बाली शक्ति है। जो संपूर्ण विश्व को धारण कर रही है। और वस्तुओं का मूल आधार है, एवं समाज की एकता को मूर्तिमान करने वाली है। नियम पालन, आज्ञापालन व कर्म कर्तव्य पालन धर्म है। 
ऑक्सफोर्ड डिक्सनरी के अनुसार-  व्यक्ति एक एैसी उच्चतर अदृश्य शक्ति पर विश्वास करती है जो उसके कर्तव्य पर नियंत्रण करती है और जा उसकी आज्ञाकारिता , शील सम्मान तथा अराधना का विशय है।
अंग्रेजी में धर्म को रिलीजन कहा जाता है, जो कि लेटिन भाषा के शबद त्मसपंहमत  से बना है, जिसका अर्थ होता है बांधना या जोड़ना, यदि इस व्युत्पत्ति के आधार पर रिलीजन को समझाा जाये तो वह एक ऐसी वस्तु है जो अराध्य तथा अराधक, उपास्य तथा उपासक व्यक्ति तथा समाज को बांधती है। मूलरूप् से धर्म का यही स्वरूप रहा है। भारतीय दृष्टि से भी धर्म का यही स्वरूप् माना गया है। उदाहरणपार्थ-- महाभारत में  धर्म की व्युत्पत्ति धृ धारण करना नामक धातु से संबद्व है। अतः धर्म का अर्थ हुआ वह वस्तु जो समस्त विश्व को धारण कर रही है। अर्थात जो समस्त वस्तुओं का मूल आधार है और समाज की एकता को मूर्तिमान करती है। 
शक्ति विधान के अनुसार समूचे सृष्टि ब्रम्हाण्ड में चौबिसों धण्डे दो प्राकार की शक्ति धाराओ का निरंतर प्रवाह बना रहाता है। ऋणात्मक और धनात्मक या रक्ष और भक्ष या सल्ला -गागरा जैसे नामों से लोग पुकारते हैं। इन शक्ति धाराओं को क्षेत्र भाषा, बोली, अनुसार जो भी नाम से पुकारे जीव से निर्जीव तक सूक्ष्म से स्थूल तक, देव से दानव तक, समूचे ब्रम्हाण्ड में इनहीं के कारण गति और हलचल बनी रहती है। जन्म मृत्यु, उत्पत्ति, पुर्नउतपत्ति, सुख-दुख, भूख-तृप्ति जैसी परस्पर विरोधाभाषी इसी कारण बनते हैं। सुख शांति समृद्वि बनाने वाली, रक्षा सुरक्षा करने वाली, उत्पत्ति, पुर्नउत्पत्ति जनम पुर्नज्न्म देने वाली संसार को बनाये रखने वाली पावन पवित्र शकितयों को पूजयनीय माना गया अैर इन्ही शक्तियों की पूजा को शक्ति पूजा के नाम से जाना गया। इन शक्तियों को जिन्होने जैसा समझा जाना वैसा माना और उसे अपनाया। आदिकाल से मानव की अबतक शक्ति स्थल की पहचान बनी हुई है जिसमें- 1. घर देवालय या कुल देवालय 2. गौशाला देवालय 3. खेत देवालय 4. खलिहान देवालय 5. ग्रामदेवी देवालय 6. गढ़ गढ़ी देवालय 6. मंदिर, मस्जित, गिरजाघर, गुरूद्वारे , मठ-मढि़या 7. सिद्ध पीठ, सिद्ध स्थल, तीर्थ स्थल आदि पवित्र कहे गये हैं।    
        जनजातियां विश्व के लगभग सभी भागों में पायी जाती है, भारत में जनजातियों की संख्या आफ्रीका के बाद दूसरे स्थान पर है। प्राचीन महाकाव्य साहित्य में भारत में निवासरत विभिन्न जनजातियों जैसे भारत, भील, कोल, किरात, किननर, कीरी, मत्स्य व निषाद आदि का वर्णन मिलता है। प्रत्येक जनताति की अपनी स्वयं की प्रशासन प्रणाली थी, व उनके मध्य सत्ता का विकेन्द्रीकरण था। परंपरागत जनजाति संस्थाएं वैधानिक, न्यायिक तथा कार्यपालिक शक्तियों से निहित थी। बिहार के सिंहभूम में मानिकी व मुण्डा तथा संथाल परगना में मांझी व परगनैत की प्रणालियां पारंपरिक संस्थाओं के कुछ उदाहरण है जिनका संचालन जनजातीय मुखियाओं के द्वारा किया जाता था। जो कि अपने-अपने जनजातीयों की सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक मामलों पर विशिष्ट प्रभाव रखते हैं।
जनजातीय के उद्भव के संदर्भ में भारत में जनजाति कई जिलों से मिलकर बनी एक उच्चतम राजनैतिक इकाई थी जो कि कबीलों के रूप में संयोजित थी। जिसके अधिकार क्षेत्र में एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र था और अपने लोगों के उपर प्रभावी नियंत्रण रखता था। किसी विशेष जनजाति का निश्चित भू-अधिकार क्षेत्र का नामकरण उस जनजाति के उपर हुआ करता था। एैसा विश्वास किया जाता है कि भारत देश का नाम शक्तिशाली भारत जनजाति के नाम से हुआ है। इसी प्रकार मत्स्य गणराज्य जो कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी में अस्तित्व में था उसका उद्भव मत्स्य जनजाति से हुआ माना जाता है। राजस्थान और मध्यप्रदेश में निवासरत मीणा जनजाति मत्स्य जनजाति के ही वंसज है। मीणाओं का विश्वास है कि इस संसार का मूल मत्स्य यानि मीन अर्थात मछली से जुड़ा हुआ है। मीणा लोग मत्स्यावतार को भगवान के अवतार के रूप् में पूजते हैं। राजस्थान के दौस जिले में मत्स्यावतार का बहुत बड़ा मंदिर भी है। भारत में आज भी कई एैसे क्षेत्र हैं जिसका नाम वहां के जनजाति के नाम पर है जैसे. मिजोरम - मिजो, नागालैण्ड- नागा, त्रिपुरा-त्रिपुरी, संथाल परगना- संथाल, हिमाचल प्रदेश का लाहोल, स्वाग्ला व किन्नौर वहां के लाहोला, स्वांगला व किन्नौरा जनजाति के नाम के आधार पर पड़ा।
परंतु आठवीं शताब्दी में मुगलों के आक्रमण के कारण छोटा नागपुर व अन्य क्षेत्रों के उराव, मुण्डा व हो जनजातियों तथा पश्चिम भारत के भाील जनजाति बड़ी मात्रा में आतंक के शिकार हुए। मध्यभारत के जबलपुर के पास गड़हा नामक गोंडवाना राज्य में लगभग 200 बर्षो तक शाासन करने वाले गोंड राजा दलपत शाह, रधुनाथ शाह का मुगलों के साथ लंबे संमय तक संधंर्ष हुआ आैंार अंतत्ः अठारवीं शताब्दी में गांेड राज्य का अंत हो गया।  मुगलों ने जब दक्षिण भारत की ओर आक्रमण किया तब उन्होंने उत्तर पश्चिम भारत के उद्यमी जनजाति बंजारों के पशुओं को अपने रसद के परिवहन के लिए उपयोग में लाने के लिए बाध्य किया गया। इस प्रकार जनजातियों की क्षीण होती शक्ति का फायदा उठाकर मुगलों ने बड़ी मात्रा में जनतातियों को इस्लाम धर्म में परिवर्तित किया। व्रिटिश शासनकाल में ब्रिटिशर्स ने बीहड़ जनजातीय क्षेत्रों में आक्रमण न कर पाने के कारण उन क्षेत्रों मंे मिशनरियों के द्वारा सास्कृतिक आक्रमण किया गया और जनजातीय क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में धर्म परिवर्तन किया गया जिसका खामियाजा हमें आज भी चुका रहे हैं।  
सन् 1941 में भारत में जनजातियों की कुल जनसंख्या 2 करोड़ 47 लाख क लगभग थी। आज वर्तमान में 2011 के संेसस के रजिस्टार जनरल ऑफ इंडिया के रिपोर्ट के आधार पर भारत की कुल जनसंख्या 1 अरब, 21 करोड़, 5 लाख, 69 हजार 5 सौ 73 है जिनमे से  जनजातियों की जनसंख्या 10 करोड़ 42 लाख, 81 हजार 34 है जो भारत की कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत है। भारत की जनजातियों के संदर्भ में विशेष बात यह है कि यहां पर भील जनजातियां सर्वाधिक है जिनकी कुल जनसंख्या 1 करोड़ 26 लाख, 89 हजार, 9 सौ 52 है, दूसरे स्थान पर गोंड जनजाति है जिसकी कुल जनसंख्या 1 करोड़ 5 लाख, 89 हजार, 4 सौ 22 है। तीसरे स्थान पर संथाल जनजाति का है जिसकी संख्या 58 लाख, 38 हजार 16 है वही चतुर्थ स्थान पर मीणा जनजाति है जिनकी संख्या 38 लाख 2 है।
भारत में 50 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या जिलों की बात करें तो वे कुल 90 जिले है जिनमें से छत्तीसगढ़ में 7 जनजाति जिले, मध्यप्रदेश में 6 जिले , ओडिसा में 8 जिले, झारखण्ड में 5 जिले तथा गुजरात में 5 जिले है वहीं भारत में 25 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक की जनसंख्या वाले जिले 62 है।  

प््रादेश प््रादेश की कुल जनसंख्या प््र.ादेश की कुल जनजातियों की जनसंख्या प््रादेश की जनजातियों का प्रतिशत प््रादेश के जनतातियों का साक्षरता का प्रतिशत देश की जनसंख्या का जनजाति प्रतिशत
छत्तीसगढ़ 2,55,45,199 78,22,902 30.62 प्रतिशत 59.1 प्रतिशत 7.50 प्रतिशत
मघ्यप्रदेश 7,26,26,809 1,53,16,784 21.09 प्रतिशत 50.6 प्रतिशत 14.69 प्रतिशत
महाराष्ट 11,23,74,333 1,05,10,213 10.08 प्रतिशत 65.7 प्रतिशत 9.35 प्रतिशत
आध्रप्रदेश 8,45,80,777 59,18,073 49.2 प्रतिशत
झारखण्ड 3,29,88,134 86,45,042 8.29 प्रतिशत 57.1 प्रतिशत 26.21 प्रतिशत
प्श्चिम बंगाल 9,12,76,115 52,96,953 57.9 प्रतिशत
गुजरात 6,04,39,692 89,17,174 8.55 प्रतिशत 62.5 प्रतिशत 14.75 प्रतिशत

भारत के जनजातियों के लिए शिक्षा एक केन्द्र बिंदु है जिस पर उनका विकास निर्भर करता है शिक्षा से ज्ञान का प्रसार होता है। ज्ञान आंतरिक बल देता है जो कि जनजातियों को शोषण व गरीबी से मुक्ति पाने के लिए बहुत ही आवश्यक है। वर्तमान समय में जनजातियों के शोषण व दयनीय स्थिति के लिए मुख्य रूप् से शिक्षा ही जिम्मेदार है। निरक्षरता से उत्पन्न अज्ञानता के कारण जनजाति लोग नयी आर्थिक सुअवसरों का लाभ नहीं उठा पाये। जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है, जिसके अंतर्गत आर्थिक एवं राजनीतिक क्षेंत्रों में विकास के साथ ही विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में नये प्रवर्तनों के बारे में समुदाय को सूचित करता है। इस कारण शिक्षा जनजातियों के अत्यंत आवश्यक है।
      जनजातियों के लिए शिक्षा की महत्ता को समझते हुए संविधान निर्माताओं ने संविधान के अनुच्छेद 15 (4) एवं 46 में अनुसूचित जनजातियों में शिक्षा के प्रसार के लिए विशेश प्रावधान किये गये है। अनुच्छेद 15( 4 )के अनुसार राज्य सरकार को किसी भी सामाजिक अथवा शैक्षणिक रूप् से पिछड़े वर्ग के नागरिकों के प्रगति के लिए अथवा अनुसूचित जाति जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान बनाने का अधिकार प्रदान करता है। संविधान के अनुच्छेद 46 में सामाज के कमजोर बर्गो विशेषकर अनुसुचित जाति जनजााति को विशेष रूप से ध्यान में रखकर शैक्षणिक एवं आर्थिक लाभ पहुंचान का दिशा निर्देश राज्य सरकार को दिये है। परंतु रजिस्टार जनरल ऑफ इंडिया के द्वारा जारी किया गया है चौकाने वाले हैं कक्षा पहली से 12वीं तक सिर्फ 13.9 प्रतिशत जनजाति ही पहुंच पाता है। वहीं भारत की पहली से 10वीं तक के जनजातीय बालकों का डॉपआउट रेट 70.6 प्रतिशत है तथा बालिकाओं का 71.3 प्रतिशत है। जो कि चिंताजनक है। इसी तरह छत्तीसगढ़ के संदर्भ में महत्वपूर्ण सांख्यिकी निम्नानुसार है-
   शिक्षा राज्य एव ंकेन्द्र दोनो का विशय है तथा शिक्षा के प्रसार का मूल दायित्व राज्य सरकार को सौपा गया है। केन्द्र सरकार उच्च शिक्षा, अनुसंधान, वैज्ञानिक एवं तकनीकि शिक्षा के क्षेत्रे में सुविधाओं के समन्वय तथा मानक निर्धारण के लिए उत्तरदायी है। केन्द्र सरकार का मु,ख्य प्रयास अनुसूचित जनजातियों को मैटिक उपरांत छात्रवृति दिलवाना, बालक, बालिका छात्रवासों की स्थापना करवाना और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोचिंग केन्द्र का प्रबंध करवाना होता है कल्याण मंत्रालय द्वारा इस कार्यक्रम के लिए विषेश केन्द्रीय सहायता प्रदान करती है। शिक्षा मंत्रालय/एच आर डी द्वारा दी गई कुछ प्रमुख सुविधाओं के सभी केन्द्रीय विश्वविद्यालयों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानो, क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेजों, मेडिकल कॉलेजों और केन्द्री विद्यालयों में 71/2 प्रतिशत जनजातियों के लिए तथा 15 प्रतिशत अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था प्रदान करती है। हालाकि पिछले वर्षों में जनजातियों की साक्षरता में वृद्धि हुई है लेकिन फिर भी हर साक्षरता के उस सामान्य स्तर तक नहीं पहुंच पाये है। रजिस्टार जनरल आफ इंडिया द्वारा जारी पिछले कुछ वर्षों के साक्षरता दर पर ध्यान दे तो पायेंगें कि-

वर्ष   सभी सामाजिक समूह का प्रतिशत  अनुसूचित जनजातियों का प्रतिशत
1961 28.3 प्रतिशत                           8.53 प्रतिशत
1971 34.45 प्रतिशत                           11.30 प्रतिशत 
1981 43.57 प्रतिशत                           16.35 प्रतिशत
1991 52.21 प्रतिशत                           29.60 प्रतिशत 
2001 64.84 प्रतिशत                           47.10 प्रतिशत
2011 72.99 प्रतिशत                           58.96 प्रतिशत


पारंपरिक लोककलाओं, लोकनृत्यो व लोकगीतों के विकास तथा संवर्धन हेतु हमारे विभिन्न विष्वविद्यालयों द्वारा संचालित पाठ्यक्रमों में स्थान देने की जरूरत है, तथा विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी गोंडी, हल्बी, भतरी जैसी बोलियों को संरक्षित करने के आदिवासी भाषा व लोककला संस्थान स्थापित करने के प्रयास किये जाने की आवष्यकता है, क्योकि ये आदिवासी बोलियां, ये लोककलाएं, ये नृत्य, ये चित्रकला तथा मूर्तिकला हजारों वर्षों के अनुभवों को अपने में संचित तथा समाहित किये हुये हैं। सरकार द्वारा  आदिवासी लोककला संग्राहलयों, सांस्कृतिक केन्द्रों, लोकसंगीत नाटक अकादमी तथा लोककला वीथिका की स्थापना किये जाने की आवष्यकता है, जिससे लोगों में इन विलुप्त हो रही लोककलाओं के प्रति जागरूकता पैदा हो सके तथा साथ-साथ इसका भी ख्याल रखा जाना आवश्यक है कि बड़ी तेजी से उभरते महानगरीय संस्कृति की चकाचौंध का प्रभाव इन लोककलाओं पर न पडे । लोककलाओं को आज व्यवसाय का माध्यम बनाने हेतु भी आवष्यक कदम उठाने की जरूरत है जिससे इन विधाओं से जुड़े लोककलाकारों को आजीविका के साधन उपलब्ध हो सकेंगे तभी देश का सही मायने में विकास हो पायेगा। 
                                                                                                              
वर्ण प्रथा के साथ साथ जीवन में चार आश्रम का भी प्रचलन था। जीवन के वे चार आश्रम थे- ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम। प्रथम आश्रम में लोग 25 वर्ष तक गुरूकुल में रहकर ज्ञान प्राप्त करते थे तथा ब्रम्हचर्य का पालन करते थे। जीवन का दूसरा चरण गृहस्थाश्रम माना जाता था। तृतीय खण्ड वानप्रस्थ आश्रम था जो 50 वर्ष के पश्चात प्रारंभ होता था तथा 75 वर्ष तक वानप्रस्थ आश्रम के पश्चात 75 से 100 वर्ष या जीवन में अंतिम बिंदु तक सन्यास आश्रम का होता था। इस तरह हजारों की संख्या में नागरिक अपने नगर, बस्ती के आसपास के वनों में बने आश्रम में रहने लगते थे। इन वानप्रस्तियों के अलावा मुनि गण भी हजारांे की संख्या में बनों में आश्रम बाना कर रहते थे। नैमिषारण्य में लगभग 80000 ऋषि मुनि आश्रम बनाकर रहते थे। आदिवासी, गिरिवासी, गिरिजन और वनवासी पर्यायवाची शब्द है। राजा महाराजा इनका पूर्ण सम्मान करते थे। क्योंकि महाराजा इनका पूर्व सम्मान करते थे। क्योंकि बनवासी उत्सवों के अवसर पर राजा महाराजाओं तथा आयुर्वेदाचार्य को वनोपज, शहद, जड़ी बूटि तथा कीमती काष्ट भेंट करते थे। व्यापारी एवं कलाकार उनसे बनोपज के अलावा प्शुचर्म, सींग, हड्डी, काष्ट, पत्थर कोड़ी मनके आदि खरीदते थे। इस प्रकार प्राचीनकाल में राजकीय संबंध आदिवासियों के साथ सौहार्द्र पूर्ण एवं व्यापारिक थे। जनजाति समुदाय भगवान शिव एवं माता पार्वती का कई रूपाांें में पूजा करते हैं । शिव को बड़ा देव, बूढ़ादेव महादेव आदि के रूप् में तथा माता पार्वती को दंतेश्वरी के रूप् में अराध्य देव मानकर पूजा करते हें। छत्तीसगढ़ में नैमिषारण्य की भांति विशल सुरक्षित आश्रमों का  एक वलयक्षेंत्र तुरतुरिया वाल्मीकि आश्रम, शिवरीनारायण आश्रम, आरंग, राजिम, सिहावा, नगरी, कांकेर क्षेत्र में स्थापित था। महर्षि अगस्त्य, अंगिरा, मुचकुन्द, लोमश, विभाण्डक, ऋष्यश्रृंग, शरभंग, भृगु, कंक एवं गौतम ऋषियों के आश्रम बने थे जो दण्डकवन या दण्डकारण्य के नाम से प्रसिद्ध था।दक्षिणापथ का यह भी एक मार्ग माना जाता था, जिसके द्वारा भगवान श्रीराम ने अयोध्या से रामेश्वरम तक की निष्कंटक यात्रा की । महाभारत काल में भी आदिवासी-वनवासी-गिरिजनों ने पाण्डवों एवं भगवान कृष्ण को पूर्ण सहयोग दिया। महाभारत के रचयिता व्यास जी वनवासी मत्स्य आखेटक की पुत्री सत्यवती की संतान थे। महाबली भीम ने आदिवासी कन्या हिडिम्बा से विवाह किया जिससे घटोत्कच नामक महाबली पुत्र हुआ तथा घटोत्कच से बर्बरीक हुआ। बर्बरीक अपने पिता से भी बलवान था तथा वह कमजोर वर्ग की सहायता करने के लिए तत्पर रहता था। अर्जुन ने भी नागवंशी जनजाति कन्या उलूपी से विवाह किया। जरातकरू नामक ब्राह्मण ऋषि ने भी नागवंशी कन्या से विवाह किया जिससे आस्तिक नामक परम विद्वान पुत्र पैदा हुआ। 
छत्तीसगढ़ के दक्षिण में विशाल भुभाग में फैले आदिवासी बहुल बस्तर अंचल देवी-देवताओं की ही पुण्यभूमि है । यहां हर गांव के अपने देवी-देवता हैं। हर गांव में देवगुढ़ी है।। ये देवी देवता और देवगुड़ी बस्तर के गांवों में धार्मिक आस्थाओं के केन्द्र माने जाते हैं। बस्तर के ग्राम्य देवी देवताआंे के नाम इस प्रकार हैं---
1. टेकनार ग्राम - परदेसीन माता, हिरमा देवी
2. मटेनार  - ममेेरिया माता
3. वेंगलूर ग्राम - पाटका देवी, शीतला देवी
4. मसेनार - पीलादाई
5. तुमनार - शीतलादेवी
6. गीदम - शीतलादेवी
7. भेलबोड़ा - गंगनादेवी
8. फरसपाल - कलेपालिनमाता
9. चित्तालूर -हिंगलाजिन माता
10. समलूर - कोला कामिनी माता
11. कलेपाल - बूढ़ी माता

इन हजारों ग्राम की हजारों नाम की अलग अलग देवियां है दंतेश्वरी माता की पर्व उत्सव में पूजा-अर्चना में इन देवियों को भी आमंत्रण रहता है। बस्तर के दंतेवाड़ में शांखिनी और डंकिनी नदियों के संगम पर माई दंतेश्वरी का भव्य ऐतिहासिक मंदिर है ये दोनो ंही नदियां बस्तर की जीवनरेखा इंद्रावती की सहायक हैं। लोहे के पहाड़ बैलाडीला नामक पहाड़ी से डंकिनी निकली है। एक पौराणिक कथा के अनुसार दक्ष यज्ञ में भगवान शंकर का अपमान देखकर सती को इतना गहरा आघात लगा कि उन्होने अपनी योगशक्ति से अग्नि उत्पन्न किया और अपना प्राण त्याग दिया। यज्ञ में हुए अपमान और सती के वियोग में शकर जी विक्षिप्त से हो गये और सती के शरीर को लेकर पागलों की तरह पृथ्वी के चक्कर काटने लगे। उनकी एैसी हालत देखकर देवताओं को चिंता हुई ओर इन सबने भगवान विष्णु से कोइ उपाय करने का आग्रह किया। इस पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र चलाकर सती के निर्जीव शरीर के 52 खण्ड कर दिये। ये खण्ड जहां जहां गिरे वहां शक्तिपीठ स्थापित हो गये। शंखिनी ओर डंकिनी के संगम में सती के दांत गिरे थं और वहां माई दंतेश्वरी नामक शक्तिपीठ की स्थापना हुई । शिव और सती के युग सतयुग से माई दंतेश्वरी की सिद्ध पीठ के रूप्  में स्थापना, राम सीता युग के त्रेता युग का दण्डकारण्य, राधाकृष्ण युग द्वापर का वाणासुर का बारसूर जहां 2-2 शिवलिंग, 2-2 विशाल आकृति वाले गणेश मूर्तियांे की स्थापना और वर्तमान युग कलियुग में बस्तर के इतिहास में नल, गंग, नाग और चालुक्य काकतीय राजवंशों का उल्लेख मिलता है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में चारों युगों की दैवी संस्कृति से सरोबार है। 
वनवासी मान्यता के अनुसार व पौराणिक कथा के अनुसार  भगवान परशुराम और श्री गणेश के बीच बस्तर क्षेत्र मं द्वंद युद्ध हुआ था युद्ध में अपने फरसे से गणेश जी के एक दांत को काट दिया था। फलस्वरूप् वे एकदंत कहलाए। इसी कारण पहाड़ी के नीचे के क्षेत्र का नाम ‘फरसपाल‘ पड़ा। इसी फरसपाल के अंर्तगत बस्तर के छिंदक नागवंशी राजाओं द्वारा 10वीं व 11वीं शताब्दी में निर्मित ढोलकल पहाड़ी पर 1000 वर्ष से भी अधिक पुरानी गणेश जी की प्रतिमा जो कि समुद्रतल से 2,994 फुट की उंचाई पर स्थित है जिसे अभी हाल ही में नक्सलियों/ माओवादियों के द्वारा गिराकर खंडित कर दिया गया था। 
ज्नजाति समाज यह विचार पोषित करता है कि मनुष्य की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा नहीं मरती किन्तु नये श्रीर में चली जाती है और अगला जन्म पूर्व जन्म के कृत्यों और आचरणों पर निर्भर करता है। तात्कालीन बस्तर में सबसे अधिक पूजे जाने वाले देवता शिव थे। शिव की पत्नि की उपासना भी जुड़ी जो विविध नामों से पुकारी जाती है। विन्ध्यवासिनी या माणिक्येश्वरी को रक्तमय बलि की अपेक्षा करने वाली विकराल देवी माना जाता था, जहां पार्वती और उमा की कल्पना स्नेहमयी जननी के रूप में की गई थी। बस्तर में विष्णु पुजा ‘‘नारायण‘‘ के रूप में ही प्रचलित थी। 1111 ई. के अभिलेख से ज्ञात होता है कि नाग-महारानी गुण्डमहादेवी ने नारायण देव की पूजा के लिए स्वमेव ‘‘नारायणपुर‘‘ ग्राम को मंदिर को समर्पित किया था। 1324 र्इ्र. के एक अभिलेख के अनुसार विष्णु के अंतिम अवतार ‘‘कालंका नारायण‘‘ की प्राण प्रतिष्ठा टेकरा नामक स्थान में की गई थी। नारायण के इन मंदिरों की पूरे देश में प्रतिष्ठा थी और कोने कोने से तीर्थ यात्री यहां आया करते थे। 
बस्तर 15वीं श्ताब्दी तक भ्रमरकोट या चक्रकोट के रूप में ही प्रचलित था। अन्नदेव के वंशजों ने 16वीं शताब्दी में जब बस्तर ग्राम को राजधानी बनाया उसी के बाद राजधानी के नाम से पूरे अंचल का नामकरण बस्तर हो गया। 14वीं शताब्दी में चक्रकोट राष्ट बन गया तो उसके अंदर अनेक राज्य सम्मिलित हो गयो और वह अनेक राज्यों में बट गया। इस प्रकार नाग युग में कोट या राज्य प्रमुख प्रशासकीय क्षेत्र थे, जो नाडु में विभाजित थे। इनमें से कुछ नाडु आकार में लघु तथा विशाल थे। नाडु के आधाार पर क्षेत्रीय विभाजन की यह परंपरा 1224 ई. तक मिलती है। नाडंु प्रमुख प्रशासकीय संभाग थे जिन्हंे परवर्ती अभिलेखों में ‘‘मंडल‘‘ कहा गया है। कालान्तर में सोमेश्वर देव प्रथम जो कि 1069 ई. में चक्रकोट के राजसिंहोसन में बैठा था उसने  चक्रकोट मंडल तथा भ्रमरकोट मंडल जो कि बस्तर के दो प्रमुख संभाग थे दोनो को मिलाकर एक राष्ट की नीव डाली। ये मंडल जिलों में विभाजित थे जिन्हें अभिलेखों में वाडि कहा गया है। चूंिक चक्रकोट राष्ट नानाजनाकीर्ण थाा इसलिए प्रशासकीय सुविधा के लिए ये जिले जाति वर्णो के आधार पर बनाये गये थे- जैसे- कुम्हारवाड, मोचिवाड, कंसारवाड, कल्लालवाड, तेलीवाड, पारियारवाड, चमारवाड व छिपवाड अतः उपयुक्त नामों से स्पष्ट है कि पूर्व मध्ययुगीन बस्तर आठ व्यावसायिक वर्ग के जिलों में विभाजित थे। वाड या जिलों का विभाजन महानगर पुर तथा ग्राम के रूप में था। संस्कृत शब्द पुर तथा द्रविड़ शब्द उरू समानार्थी है तथा ये ऐसी वस्ती के वाचक है जो अधिक सुरक्षित हों और जहां राजधानी रहीं हो। इस प्रकार की बस्तीयों में बारसुरू, ओरपुरू, राजपुर तथा नारायणपुर प्रसिद्ध थीं। बारसुरू तथा राजपुर नागों की राजधानियां थी और नारायणपुर (नारायणपाल) एक बहुत बड़े धार्मिक केन्द्र के रूप में विकसित हो चुका था। सामान्य बस्ती क्षेत्रों को अभिलेखों में वाड़ा ,ग्राम तथा स्थान कहा गया है। संस्कृत शब्द वाट का शाब्दिक अर्थ है- ऐसा सुनियोजित ग्राम जहां घर पंक्तिबद्ध हों। दंतेवाड़ा एक ऐसा ही सुनियोजित ग्राम 1061 ई. में विकसित हो चुका था। जिसमें घर एक पंक्ति में सुनियोजित ढंग से बनाये गये थे। सामान्य बस्ती की दूसरी कोटि उन गा्रमों की है जिन्हें अभिलेखांे में ग्राम गांव या नाडु नार कहा गया है। जिस प्रकार जिला स्तर का शासक व्यावसायिक वर्गों के अनुसार था उसी प्रकार ग्रामों की बसाहट धार्मिक सम्प्रदायों पर आधारित थी। छिन्दक नागों की राजधानी ‘‘बारसुरू ‘‘ एक मनोरम नगरी थी। शिव इस नगरी के अराध्य देव थे। प्रसिद्ध तेलुगु-चोड़-महामाण्डलिक ने इस नगरी के सौदर्य को बढ़ाने के लिए अथक प्रयास किया था। यहां पर उन्होंने अपने नामकरण के साथ चन्द्रादित्य मंदिर, चंद्रादित्य सरोवर, चंद्रादित्य नंदनवल का निर्माण करवाया था। यह नगरी मंदिरों , सरोवरों तथा अनेक बगीचों से दुल्हन की तरह सजी रहती थी और इसी कारण शतु्र राजवंशों ने इसे कई बार तहस नहस किया और नागों ने इसे बाार बार सजाया।
चक्रकोट शासन के प्रशासकीय क्षेत्रों का उत्तराधारक्रम
राष्ट अथवा देश

कोट अथवा महामण्डल अथवा राज्य

नाडु अथवा मंडल आधुनिक संभाग

वाडि अथवा विषय आधुनिक जिला

महानगर पुर ग्राम
वाड़ नाडुया ग्राम, गाव, नार

राजा के अधीन प्रशासकीय क्षेत्रों के विविध अधिकारियों का उत्तराधिकार क्रम-
महाराजा राष्ट का अधिपति

महामाण्डलिक अथवा महामण्डलेश्वर महामण्डलों का शासक

माण्डलिक मण्डल का स्वामी

विषयपति विषय का शासक

ग्राम नायक ग्राम का शासक

पूर्व मध्ययुगीन बस्तर का प्रमुख धर्म शैव था तथा शैवदर्शन की यहां प्रमुख शाखाएं या मत-मतांतर विकसित हो चुके थे, जिनमें कापालिक, कौल,तथा शाक्य प्रमुख थे। इनमें प्रत्येक मत तो यह स्वीकार करता है कि शिव विश्व के परमेश्वर हैं तथा मोक्ष का प्रमुख मार्ग भक्ति है, किन्तु भक्ति के स्वरूप, अर्चना के माध्यम, आचारसंहिता की विधि एवं सांस्काकि विधियों में इन मतों में विभेदकता मिलती है। 
सरगुजा में स्थित माहामाया मंदिर कलचुरीकालीन कला परंपरा का श्रेष्ट नमूना है। कलचूरीयों ने जहां जहां शासन किया वहां उनके द्वारा महामाया मंदिर का निर्माण कराया।
छत्तीसगढ़ में जनजातीय समाज बड़ी संख्या में निवासरत है, वहीं छत्तीसगढ़ राज्य का गठन ही जनजातीय हितों को ध्यान में रखते हुए किया गया है । जैसा कि हम सभी जानते हैं कि जनजातीय क्षेत्रों की सबसे मूलभूत समस्या शिक्षा और स्वास्थ्य रहा है और यह अकेले छत्तीसगढ़ या मध्यप्रदेश की ही नहीं बल्कि पूरे देश में इन क्षेत्रों की स्थिति यही है। परंतु मुझे लगता है कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी समस्या का निदान भी इन्हीं क्षेत्रों में विद्यमान है। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश तथा अन्य जनतातीय क्षेत्रों में शिक्षा जैसे विषय पर पिछले कई कई वर्षों से काम है। जिसे पुर्नस्थापित करने की जरूरत है। यहां छत्तीसगढ़ के मुरिया समाज की घोटुल परंपरा पिछले कई वर्षों से रही है या एैसे ही युवा शिक्षा गृह जिसे देश के भिन्न-भिन्न जनजातीय समाज जैसे- बैगा, भील, उरांव व मंुडा समूहों में व उससे संबंधित जनजातीय क्षेत्रों में अलग-अलग नाम से भी जाना जाता है। घोटुल जैसे युवा शिक्षा गृह जहां पर जनजातीय संस्कृति, जनजातीय बोली, भाषा व लिपि, जनजातीय कला जैसे- डोकरा शिल्प कला, बेलमेटल कला जनजातीय नृत्य कला- रेला, हुल्की, दंडामी व मांदरी नृत्य, जनजातीय रीति रिवाज व प्रकृति आधारित आस्था का प्रमुख केन्द्र रहा है जो कि अपने आप में किसी विश्वविद्यालय जैसी कल्पना से कम नहीं थी। परंतु तथाकथित विदेशी आक्रांताओं के द्वारा इस प्रकार के घोटुल जैसी पवित्र संस्था का गलत चित्रण पूरे विश्व पटल पर किया गया। 
वैसे ही जनजातीय समाज में प्राकृतिक शिक्षा पर भी कई वर्षो से काम रहा है क्योंकि प्राकृतिक ज्ञान ही प्राकृतिक चिकित्सा, एलोपैथिक चिकित्सा व होम्योपैथिक चिकित्सा का आधारभूत तत्व है। महर्षि चरक के साहित्य ‘‘चरक संहिता‘‘ में प्राकृतिक चिकित्सा संबंधी ज्ञान व आयुर्वेद संबंधी ज्ञान का संकलन तथा शल्य चिकित्सा पर आधारित आचार्य शुश्रुत का साहित्य शुश्रुत संहिता का कार्य समाज, देश ही नहीं संपूर्ण विश्व के लिए एक महत्वपूर्ण योगदान साबित हुआ है जो कि हजारों साल पहले से ही लिखा जा चुका है। एैसे ही भारत के महर्षि पतांजली द्वारा द्वितीय शताब्दी में प्रतिपादित योग विज्ञान को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सर्वसम्मती से स्वीकार कर अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्यता प्रदान करना एक तरीके से भारतीय विश्व गुरूत्व की भावना का सम्मान है। एैसे में अब हमारी सतत् कई वर्षो से चली आ रही सनातनी जीवन मूल्य, परंपरा, आस्था व संस्कृति को आज पुर्नस्थापित करने की जरूरत है तभी सहीं मायने में हम सर्वांगीण विकास की दिशा में आगे बढ़ पायेंगे।




युनान मिश्र रोमा सब मिट गये इस जहां से, 
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।।