झारखंड में निशा भगत की मौत ने तीखी राजनीतिक बहस छेड़ दी है। भाजपा और विपक्षी नेता हेमंत सोरेन सरकार, पुलिस तथा प्रशासन से जवाबदेही मांग रहे हैं, जबकि शासक झामुमो ने जांच के बाद दोषियों पर कार्रवाई का भरोसा दिलाया है।
विपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी ने निशा भगत के फेसबुक लाइव में लिए गए नामों पर कार्रवाई और निष्पक्ष जांच की मांग की। उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, पिठोरिया थाना प्रभारी और अजय तिर्की को जिम्मेदार ठहराते हुए सीएम से इस्तीफे की मांग की।
भाजपा नेता समीर उरांव ने भी सरकार और पुलिस पर सवाल उठाए, निष्पक्ष जांच की मांग की और कहा कि सरकार सुरक्षा देने में असमर्थ है तो मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना चाहिए।
झामुमो नेता मनोज पांडे ने घटना को दुखद बताया और कहा कि सरकार की आलोचना करना अपराध या दुश्मनी नहीं है। उन्होंने जांच में दोषी पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई और किसी को झूठा फंसाने नहीं देने का भरोसा दिलाया।
बाबूलाल मरांडी और पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने मामले की सीबीआई जांच की मांग की है। दोनों ने उन लोगों की तत्काल गिरफ्तारी की मांग भी की, जिनके नाम निशा के अंतिम लाइव वीडियो में सामने आए थे।
पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने निष्पक्ष जांच के साथ परिवार को 1 करोड़ रुपये मुआवजा देने की मांग की और सरकार से जवाबदेही तय करने को कहा।
निशा के माता-पिता ने भी उनकी मौत को साजिश बताते हुए सीबीआई जांच की मांग की है। उनकी मां ने अजय तिर्की और उनके सहयोगियों पर धमकी व दबाव का आरोप लगाया, जबकि पिता ने नामजद प्राथमिकी दर्ज कराने और उच्चस्तरीय जांच की मांग की। ये अभी आरोप हैं; पुलिस ने अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज कर जांच शुरू की है।
भाजपा इसे “व्यवस्था द्वारा हत्या” या सरकारी विफलता बता रही है, जबकि झामुमो-कांग्रेस ने मृत्यु पर राजनीति न करने और जांच पूरी होने तक इंतजार करने की सलाह दी है। जेएमएम के दो विधायकों—भूषण तिर्की और रामसूर्य मुंडा—ने भी सीबीआई या निष्पक्ष जांच की मांग की है और राजनीति न करने की अपील की है।निशा भगत के फेसबुक लाइव वीडियो में उन्होंने जमीन दलालों, हेमंत सोरेन सरकार और पुलिस-प्रशासन पर परेशान करने, बदनाम करने तथा सुरक्षा न देने के आरोप लगाए थे। ये उनके आरोप हैं; अभी तक इनकी स्वतंत्र पुष्टि या जांच में स्थापित होने की पुष्टि नहीं हुई है।
करीब 11 मिनट के वीडियो में वे भावुक और रोते हुए दिखीं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार और जमीन से जुड़े लोगों के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उन्हें धमकी, अपमान और बदनामी का सामना करना पड़ रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि वे बार-बार पुलिस और प्रशासन से सुरक्षा की गुहार लगा चुकी थीं, लेकिन उन्हें जरूरी मदद नहीं मिली। उन्होंने अपने माता-पिता से माफी मांगी और अपनी स्थिति पर निराशा व्यक्त की।
वीडियो में उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, पिठोरिया थाना प्रभारी और अजय तिर्की का नाम लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि जमीन दलालों के दबाव में पुलिस काम कर रही है और उन्हें उनके घर में हुई चोरी के मामले में भी सही कार्रवाई नहीं मिली।
उन्होंने उन लोगों पर भी सवाल उठाए जिनके बारे में उनका कहना था कि वे उनकी छवि खराब कर रहे हैं और उन्हें “दलाल” कह रहे हैं। उनका आरोप था कि इसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।
निशा ने राजनीतिक दलों से भी निराशा जताई और कहा कि भाजपा या कांग्रेस कोई उनका साथ नहीं दे रहा है। उन्होंने अपने पिता की झारखंड आंदोलन में भूमिका का जिक्र करते हुए कहा कि वे लंबे समय से आदिवासी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही थीं।
वीडियो के आरोप राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गए हैं: भाजपा ने सीबीआई जांच और मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग की है, जबकि झामुमो ने जांच के बाद दोषियों पर कार्रवाई का भरोसा दिलाया है। पुलिस ने अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज कर जांच शुरू की है.निशा भगत की मौत से झारखंड के आदिवासी समाज में शोक, आक्रोश और अपने अधिकारों की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता बढ़ी है। घटना ने भूमि संघर्ष, पुलिस-प्रशासन पर भरोसा, सरना पहचान और आदिवासी कार्यकर्ताओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों को फिर केंद्र में ला दिया है।
गुमला में निशा के अंतिम संस्कार से पहले सैकड़ों आदिवासी लोगों ने बैनर-पोस्टर के साथ प्रदर्शन किया और निष्पक्ष जांच तथा जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की। स्थानीय उरांव नेताओं ने प्रतीकात्मक प्रदर्शन का निर्णय लिया, जिससे साफ है कि यह मामला केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि समुदाय की सामूहिक चिंता बन गया है।
निशा भगत जल-जंगल-जमीन, आदिवासी भूमि पर कथित अवैध कब्जे और सरना धर्म कोड जैसे मुद्दों की आवाज थीं। उनकी मौत के बाद समुदाय में यह भावना मजबूत हुई है कि भूमि-दलालों और प्रशासनिक तंत्र के सामने आदिवासियों की आवाज असुरक्षित हो सकती है।
विपक्षी नेताओं ने इसे “आदिवासी समुदाय पर अपनी ही जमीन में उत्पीड़न” के सवाल से जोड़ा है, हालांकि यह राजनीतिक आरोप है और अभी जांच का विषय है।
घटना ने आदिवासी अधिकारों के लिए सक्रिय लोगों की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्टों में कहा गया है कि निशा की मौत से आदिवासी कार्यकर्ताओं की सुरक्षा, धमकी या दबाव की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई, तथा स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही को लेकर चिंता बढ़ी है।
परिवार और कई समुदायिक संगठन निष्पक्ष जांच—कई जगह सीबीआई जांच—की मांग कर रहे हैं। यह मांग दर्शाती है कि समुदाय सिर्फ मौत की परिस्थितियों का पता नहीं चाहता, बल्कि यह भी चाहता है कि भूमि विवादों और शिकायतों में पुलिस-प्रशासन की भूमिका पारदर्शी रूप से जांची जाएl
आदिवासी समाज का दुख और गुस्सा राजनीतिक दबाव में बदल रहा है: भाजपा ने सीएम के इस्तीफे और सीबीआई जांच की मांग की है, जबकि झामुमो ने जांच के बाद दोषियों पर कार्रवाई का वादा किया है। इससे आगामी राजनीतिक बहस में आदिवासी अधिकार, भूमि सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही के मुद्दे और तेज हो सकते हैं।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि घटना की पूरी परिस्थिति अभी जांच में है; इसलिए आरोपों को अंतिम निष्कर्ष नहीं मानना चाहिए।झारखंड में सरना धर्म कोड की मुख्य मांग है कि जनगणना में आदिवासियों को अपनी धार्मिक पहचान “सरना” के रूप में अलग से दर्ज करने का विकल्प मिले। इसका उद्देश्य केवल धर्म का रिकॉर्ड नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान, जनसंख्या आंकड़े और अधिकारों की सुरक्षा है।
जनगणना के धर्म कॉलम में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन की तरह “सरना” के लिए अलग कोड या कॉलम हो।
सरना धर्म मानने वाले आदिवासी अपनी पहचान को “अन्य धर्म” या किसी व्यापक श्रेणी में दर्ज होने से बचा सकें।
झारखंड सरकार ने यह मांग जनगणना 2027 में शामिल करने के लिए राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और राज्यपाल को पत्र लिखकर दोहराई है।
सरना धर्म को प्रकृति-पूजा, सरना स्थल, ग्राम देवता, कुल देवता और आदिवासी परंपराओं से जोड़ा जाता है। समर्थकों का कहना है कि अलग पहचान मिलने से समुदाय की आबादी, संस्कृति और धार्मिक विशेषताएं सही तरीके से दर्ज होंगी, जिससे नीतियों और योजनाओं में उनकी जरूरतों का ध्यान रखा जा सकेगा।
2011 की जनगणना में अलग कोड न होने के बावजूद करीब 50 लाख लोगों ने खुद को सरना से जोड़ा था; झारखंड सरकार इसे मांग की गंभीरता का सबूत बताती है।
झारखंड विधानसभा ने 11 नवंबर 2020 को सरना/आदिवासी धर्म कोड के लिए सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था। लेकिन जनगणना में अलग धार्मिक कोड जोड़ने का अंतिम निर्णय केंद्र सरकार और जनगणना प्रक्रिया से जुड़ा है, इसलिए राज्य इसे अकेले लागू नहीं कर सकता।
राजनीतिक विवाद
झामुमो और कई आदिवासी संगठन इसे आदिवासी अस्मिता, संवैधानिक अधिकारों और सांस्कृतिक संरक्षण का सवाल मानते हैं। दूसरी ओर, कुछ लोग सरना को सनातन/हिंदू धर्म का हिस्सा मानते हैं; इस विचार का आदिवासी संगठनों से विरोध हुआ है, क्योंकि वे सरना को अलग धार्मिक पहचान मानते हैं।
संक्षेप में, मांग सिर्फ जनगणना फॉर्म में एक नाम जोड़ने की नहीं है—यह आदिवासी समाज की पहचान, भूमि-संस्कृति से जुड़े अधिकारों और राज्य नीतियों में प्रतिनिधित्व की मांग है।केंद्र सरकार ने अब तक जनगणना में सरना के लिए अलग धार्मिक कोड देने की मांग को स्वीकृति नहीं दी है। इसका मुख्य तर्क रहा है कि जनगणना में सभी धार्मिक-पंथ समूहों को अलग कोड देना व्यावहारिक नहीं है; सरना जैसे अन्य धर्म आमतौर पर “अन्य” श्रेणी में दर्ज होते रहे हैं।
गृह मंत्रालय का पहले दिया जवाब था कि धर्म कोड केवल गिनती की सुविधा के लिए होते हैं और कोड मिलने से किसी धर्म या पंथ को विशेषाधिकार नहीं मिलता। मंत्रालय ने कहा था कि 2001 की जनगणना में आदिवासियों ने 100 से अधिक धार्मिक-मान्यता श्रेणियों में खुद को दर्ज कराया था, इसलिए हर श्रेणी के लिए अलग कॉलम देना संभव नहीं था।
केंद्र ने जनगणना 2027 को 16 जून 2025 को अधिसूचित किया है और इसमें पहली बार डिजिटल गणना तथा स्व-गणना का विकल्प शामिल है। लेकिन अब तक सार्वजनिक रूप से यह संकेत नहीं मिला है कि जनगणना फॉर्म में “सरना” के लिए अलग कोड जोड़ा जाएगा।
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मई 2026 में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और राज्यपाल को पत्र लिखकर जनगणना में सरना कोड की मांग दोहराई थी। उनका तर्क था कि 2011 में अलग कोड न होने के बावजूद 21 राज्यों में करीब 50 लाख लोगों ने खुद को सरना लिखवाया था, इसलिए अलग पहचान देना आवश्यक है।
कांग्रेस ने जनगणना फॉर्म में सरना कॉलम न होने को केंद्र सरकार की उदासीनता बताया है, जबकि आदिवासी संगठनों ने इसे धार्मिक पहचान और अस्मिता का मुद्दा बताया है। दूसरी ओर, कुछ विचारधाराएं सरना को सनातन/हिंदू धर्म के भीतर मानती हैं; इससे मांग को लेकर राजनीतिक और सामाजिक विवाद बढ़ा है।
केंद्र का रुख तकनीकी और राजनीतिक दोनों कारणों से सतर्क है: जनगणना में अलग कोड देने से अन्य स्थानीय धार्मिक पहचानों के लिए भी समान मांगें उठ सकती हैं, जबकि आदिवासी संगठन इसे सरना समुदाय की अलग पहचान और सांस्कृतिक अधिकारों की मान्यता मानते हैं।अन्य राज्यों में भी सरना कोड की मांग मौजूद है, लेकिन झारखंड की तुलना में राज्य सरकारों का समर्थन और औपचारिक प्रस्तावों की स्थिति असमान है। सबसे मजबूत मांग झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में है; मध्य प्रदेश में कुछ आदिवासी समूह “सरना” की जगह “कोया पुनेम/कोइतुर” जैसी अलग धार्मिक पहचान मांग रहे हैं।
2011 की जनगणना में अलग कोड न होने के बावजूद 21 राज्यों में लगभग 50 लाख लोगों ने खुद को “सरना” दर्ज कराया था। इनमें सबसे बड़ा हिस्सा झारखंड (लगभग 83.33%) का था; उसके बाद ओडिशा और पश्चिम बंगाल का हिस्सा लगभग 8.14% और 8.13% रहा।
झारखंड और पश्चिम बंगाल ने विधानसभा स्तर पर प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा है। ओडिशा और छत्तीसगढ़ में संगठनों की मांग और सरकारी तैयारी की खबरें आईं, लेकिन झारखंड जैसा सर्वसम्मत विधानसभा प्रस्ताव या स्पष्ट राज्य-स्तरीय अभियान अन्य राज्यों में उतना स्थापित नहीं दिखता।
क्यों अलग मांगें
सरना आंदोलन केवल झारखंड तक सीमित नहीं है, पर नाम और मांग का स्वरूप अलग है: झारखंड-पश्चिम बंगाल में “सरना”, छत्तीसगढ़ में “आदिवासी धर्म”, और मध्य प्रदेश में “कोया पुनेम/कोइतुर”। सभी का मूल सवाल एक ही है—जनगणना में आदिवासी परंपराओं को अलग धार्मिक पहचान देना।अलग आदिवासी पहचान की मांग इसलिए तेज हुई है कि समुदाय को लगता है कि उनकी धार्मिक परंपराएं, भाषा-संस्कृति, भूमि-संबंध और जनसंख्या-आधारित अधिकार बड़ी धार्मिक श्रेणियों में घुलकर अदृश्य हो रहे हैं। सरना कोड की मांग इसी चिंता का संस्थागत रूप है।
आदिवासी समूह अपनी आस्था को प्रकृति-पूजा, सरना स्थल, ग्राम देवता, पूर्वज-पूजा और स्थानीय परंपराओं से जोड़ते हैं। उनका तर्क है कि इसे “अन्य” या किसी व्यापक धर्म में दर्ज होना पड़ना उनकी अस्मिता और गरिमा के लिए असमानता है। 2011 की जनगणना में कोई सरना कॉलम न होने के बावजूद 21 राज्यों में लगभग 50 लाख लोगों ने खुद को सरना लिखवाया था। यह दिखाता है कि यह केवल राजनीतिक मांग नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से व्यापक पहचान की इच्छा भी है।
जनगणना के आंकड़े नीति, योजनाओं और संसाधन आवंटन के आधार बनते हैं। सरना समर्थकों का कहना है कि सटीक गिनती न होने से शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और क्षेत्रीय विकास के लिए लक्षित योजनाएं कमजोर हो सकती हैं।
उनकी चिंता यह भी है कि आबादी के आंकड़ों में कमी दिखे तो अनुसूचित क्षेत्र, अनुसूचित जनजाति से जुड़े संरक्षण और सामाजिक-राजनीतिक सुरक्षा कवच को चुनौती मिल सकती है.
आदिवासी धार्मिक पहचान केवल धर्म नहीं, बल्कि जल, जंगल और जमीन से जुड़े जीवन-संबंध से जुड़ी है। सरना कोड की मांग करने वाले इसे वन, नदी, पर्वत और ग्राम स्थलों की पवित्रता को संरक्षित रखने के अधिकार के रूप में देखते हैं।
इसलिए अलग पहचान की मांग अक्सर वनाधिकार कानून, पेसा, भूमि-अधिकार और विकास परियोजनाओं में सहमति के अधिकार जैसे मुद्दों से भी जोड़ी जाती है।
आदिवासी संगठन चाहते हैं कि उनकी भाषाएं, त्योहार, परंपराएं, स्मारक और इतिहास केवल पर्यटकीय या ऐतिहासिक विषय न बनें, बल्कि राज्य नीतियों में संरक्षित रहें। उनकी मांगों में आदिवासी भाषाओं का संरक्षण, स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी योगदान की मान्यता और नीति-निर्माण में भागीदारी शामिल है।
यदि कोई आदिवासी व्यक्ति अपने धर्म में “सरना” लिखवाना चाहता है, लेकिन फॉर्म में वह विकल्प नहीं है, तो उसे अक्सर “अन्य” चुनना पड़ता है। सरना समर्थकों के अनुसार ऐसा करने से समुदाय की वास्तविक धार्मिक जनसंख्या, सांस्कृतिक विशेषताएं और नीतिगत जरूरतें आंकड़ों में सही नहीं दिखतीं।
यह बहस जटिल है: समर्थक इसे स्व-पहचान, सम्मान और संवैधानिक सुरक्षा का सवाल मानते हैं, जबकि आलोचक जनगणना में असंख्य स्थानीय आस्थाओं के लिए अलग कोड देने की व्यावहारिक कठिनाई और धार्मिक वर्गीकरण की राजनीति पर सवाल उठाते हैं।भारतीय संविधान आदिवासियों को मुख्य रूप से “अनुसूचित जनजातियां” (ST) कहता है; इसमें “आदिवासी” शब्द को एक संवैधानिक श्रेणी के रूप में परिभाषित नहीं किया गया है। यानी संविधान आदिवासी समुदायों को विशेष संरक्षण देता है, लेकिन उन्हें धार्मिक रूप से अलग “आदिवासी धर्म” या सरना कोड के रूप में मान्यता देने का सीधा प्रावधान नहीं करता।
अनुच्छेद 366(25) के मुताबिक अनुसूचित जनजातियां वे जनजातियां, जनजातीय समुदाय या उनके भाग/समूह हैं जिन्हें अनुच्छेद 342 के तहत अनुसूचित माना गया है। अनुच्छेद 342(1) के तहत राष्ट्रपति, राज्य के मामले में राज्यपाल से परामर्श के बाद, सार्वजनिक अधिसूचना से किसी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के लिए ST सूची तय करते हैं।
सूची में संशोधन का अधिकार केवल संसद को है; अनुच्छेद 342(2) के तहत संसद कानून द्वारा किसी समुदाय को ST सूची में शामिल या बाहर कर सकती है। इसलिए कोई समुदाय अपनी इच्छा से ST नहीं बन सकता।
ST की सूची राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के अनुसार होती है। इसका मतलब है कि कोई समुदाय एक राज्य में ST हो सकता है, पर दूसरे राज्य में नहीं; इसलिए आदिवासी पहचान और संबंधित संरक्षण का दायरा भी स्थान-विशिष्ट होता है।
संविधान अनुसूचित जनजातियों को शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आरक्षण देता है। लोकसभा और विधानसभाओं में ST सीटें आरक्षित हैं, जबकि पंचायतों में भी अनुपात के आधार पर ST सीटें आरक्षित होती हैं।
अनुच्छेद 46 राज्य को अनुसूचित जनजातियों की आर्थिक और शैक्षिक रुचियों की रक्षा तथा सामाजिक असमानता व शोषण से उनकी रक्षा का निर्देश देता है। इसके अलावा अनुच्छेद 15(4) सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों, जिनमें ST शामिल हैं, के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति देता है।
अनुच्छेद 244 अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिए पांचवीं तथा छठी अनुसूची का प्रावधान करता है। छठी अनुसूची असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा के जनजातीय क्षेत्रों के लिए स्वायत्त जनजातीय क्षेत्र और स्वायत्त जिला परिषदों की व्यवस्था देती है, जिससे स्थानीय स्वशासन और सांस्कृतिक संरक्षण को मजबूती मिलती है।
संविधान का अनुच्छेद 25 सभी व्यक्तियों को धर्म के पालन, प्रचार और प्रचार की स्वतंत्रता देता है। लेकिन यह स्वतंत्रता सरना जैसी आस्था को जनगणना में अलग धार्मिक कोड देने का सीधा आधार नहीं बनाती—उसके लिए केंद्र सरकार को जनगणना की श्रेणी तय करनी होगी।
इसलिए सरना कोड की मांग रखने वाले संगठनों का तर्क है कि संवैधानिक संरक्षण के बावजूद आदिवासी धार्मिक पहचान जनगणना में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं होती। दूसरी ओर, संविधान ने ST की पहचान जनजातीय समुदाय और अधिसूचित सूची पर आधारित रखी है, धार्मिक स्वतंत्रता पर नहीं।
विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के लिए जनजातीय समुदायों को केवल “ST” के रूप में गिनना पर्याप्त नहीं है; विभिन्न जनजातियों के आंकड़े अलग-अलग रखना बेहतर नीति-निर्माण में मदद कर सकता है। लेकिन इसके साथ गोपनीयता, गलत वर्गीकरण और राजनीतिक दुरुपयोग से बचाव भी जरूरी है।
भारत में आदिवासी समुदाय एक जैसे नहीं हैं: उनकी भाषा, भूगोल, आजीविका, स्वास्थ्य-स्थिति, शिक्षा-पहुंच और भूमि-जल-जंगल से जुड़ी समस्याएं अलग-अलग हैं। उदाहरण के लिए, विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTGs) अक्सर दूरदराज के इलाकों में रहते हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य व आजीविका में अधिक बहिष्कार का सामना करते हैं।
अगर सभी ST को एक बड़ी श्रेणी में गिना जाए, तो एक बड़े और अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति वाले समुदाय के औसत आंकड़े छोटे, अधिक संवेदनशील समुदाय की वास्तविक कमी को छिपा सकते हैं। इसलिए जनजाति-वार डेटा से यह पता चल सकता है कि किस समुदाय को स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, पोषण, कौशल प्रशिक्षण, सड़क, डिजिटल कनेक्टिविटी या आजीविका सहायता सबसे पहले चाहिए।
विकसित भारत 2047 का उद्देश्य ग्रामीण, शहरी और जनजातीय क्षेत्रों का संतुलित विकास तथा समान अवसर है। जनजातीय समुदाय लगभग देश की 10% आबादी हैं और उनका समावेशी विकास राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए आवश्यक माना जाता है।
ICSSR भी कहता है कि विकसित भारत की समय-सीमा में पहुंचने के लिए नागरिकों की क्षमता और जरूरतों का आकलन करने वाली शोध-आधारित नीतियां चाहिए। जनजाति-वार विभाजित डेटा इसी आकलन का एक महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।
जनगणना 2027 में जातिगत गणना शामिल करने का निर्णय लिया गया है और यह पहली डिजिटल जनगणना होगी। जनगणना पहले से ही ST की गणना करती है और गांव, शहर व वार्ड स्तर पर धर्म, भाषा, शिक्षा, आर्थिक गतिविधि, प्रवासन और उर्वरता जैसे विवरण उपलब्ध कराती है।
लेकिन अभी सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं है कि जनगणना फॉर्म में हर जनजाति को अलग-अलग कोड देकर उसका विस्तृत डेटा जारी किया जाएगा। वर्तमान घोषणा जाति गणना पर केंद्रित है; जनजाति-वार सूक्ष्म डेटा की सार्वजनिक उपलब्धता अलग नीतिगत और तकनीकी निर्णय होगी।सबसे उपयोगी मॉडल यह होगा कि जनगणना में जनजाति का नाम/कोड दर्ज किया जाए, लेकिन सार्वजनिक रिपोर्ट में छोटे समुदायों की पहचान योग्य न होने दी जाए। डेटा को जिला, ब्लॉक या ग्राम स्तर पर एकत्र किया जा सकता है, पर सार्वजनिक रूप से केवल पर्याप्त रूप से बड़े समूहों के लिए ही विस्तृत आंकड़े जारी किए जाएं।
इसके साथ आदिवासी संगठनों, ग्राम सभाओं और जनजातीय अधिकारों के विशेषज्ञों की भागीदारी जरूरी है, ताकि वर्गीकरण समुदाय की आत्म-पहचान का सम्मान करे और नीति निर्माण उनकी वास्तविक जरूरतों पर आधारित हो।जनजातीय संगठनों को अपने स्तर पर समुदाय-आधारित सर्वेक्षण, आवश्यकता मैपिंग और साक्ष्य तैयार करने चाहिए—लेकिन इसे आधिकारिक जनगणना का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक मानना चाहिए। राष्ट्रीय जनगणना कानूनी अधिसूचना, प्रमाणीकरण और नीतिगत उपयोग का आधार है; संगठनों की भूमिका समुदाय की आत्म-पहचान, स्थानीय जरूरतों और डेटा-अधिकारों को मजबूत करने की है।
अपने गांव, बस्ती या समुदाय में शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, पेयजल, सड़क, डिजिटल कनेक्टिविटी, रोजगार और भूमि-वन अधिकारों की कमी का नक्शा बनाएं।
बच्चों के स्कूल छोड़ने, कुपोषण, मातृ-शिशु स्वास्थ्य, प्रवासन, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं की स्थानीय स्थिति दर्ज करें।
सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों, दस्तावेजों और शिकायतों की स्थिति का समुदाय-आधारित लेखा रखें।
इन आंकड़ों को ग्राम सभा, जिला प्रशासन, विधायक, आयोग और नीति-निर्माताओं के सामने प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करें।
यह तरीका विशेष रूप से उपयोगी है क्योंकि सरकारी डेटा अक्सर बहुत सामान्य होता है और स्थानीय सांस्कृतिक संदर्भ, भूमि-संबंध या छोटे समुदायों की विशिष्ट कठिनाइयों को पूरी तरह नहीं पकड़ पाता।
संगठन को डेटा इकट्ठा करने से पहले समुदाय से स्पष्ट, सूचित और स्वैच्छिक सहमति लेनी चाहिए। लोगों को यह बताना चाहिए कि कौन-सी जानकारी मांगी जा रही है, उसका उपयोग किसके लिए होगा, कौन उसे देखेगा और व्यक्तिगत पहचान कैसे सुरक्षित रहेगी।
आदिवासी डेटा-संप्रभुता का सिद्धांत यही है कि समुदाय तय करे कि उसके बारे में क्या डेटा लिया जाए, क्यों लिया जाए, कैसे संग्रहित रहेगा और किसे उपयोग की अनुमति मिलेगी। इसमें स्व-पहचान को प्राथमिक आधार माना जाता है, न कि बाहरी संस्था द्वारा थोपी गई श्रेणी।
व्यक्तिगत पहचान, धर्म, जाति/जनजाति, स्वास्थ्य या आय की संवेदनशील जानकारी बिना सहमति के सार्वजनिक न करें।
छोटे समुदायों के डेटा को इस तरह प्रकाशित न करें कि किसी परिवार या व्यक्ति की पहचान हो जाए; समग्र आंकड़े जारी करें।
डेटा को सिर्फ राजनीतिक दावों या सोशल मीडिया प्रचार के लिए इस्तेमाल न करें; उसका उद्देश्य सुधार और जवाबदेही होना चाहिए।
डिजिटल रिकॉर्ड में पासवर्ड, एन्क्रिप्शन, बैकअप और एक्सेस-नियंत्रण रखें; डिजिटल जनगणना में गोपनीयता और साइबर सुरक्षा की चिंताएं पहले से उठाई गई हैं।
सरकार के साथ साझेदारी
संगठन अपने डेटा को सरकारी सर्वेक्षण से मिलाकर प्रस्तुत कर सकते हैं, पर आधिकारिक जनगणना में जवाब देना कानूनी दायित्व है और व्यक्तिगत विवरण गोपनीय रहते हैं; सार्वजनिक रूप से केवल समग्र आंकड़े जारी होते हैं।😭
सबसे बेहतर मॉडल “सह-निर्माण” का है: संगठन समुदाय की प्राथमिकताएं और स्थानीय साक्ष्य तैयार करे, सरकार मान्य जनगणना व योजना-डेटा उपलब्ध कराए, और दोनों मिलकर लक्षित कार्ययोजना बनाएं। PM-JANMAN में भी PVTG बस्तियों की जनसंख्या और बुनियादी ढांचे के अंतराल के आकलन के लिए बस्ती-स्तरीय डेटा संग्रह किया गया है, जो इस सहयोग का उदाहरण है।
एक जनजातीय संगठन गांव-स्तर पर एक साधारण डैशबोर्ड बना सकता है: कितने बच्चे स्कूल नहीं जा रहे, कितने घरों में पीने का पानी दूर है, कितने लोगों के पास आधार/जॉब कार्ड/राशन कार्ड नहीं है, कितने युवा कौशल प्रशिक्षण चाहते हैं, और किन गांवों में मोबाइल-इंटरनेट की समस्या है। फिर इसे ग्राम सभा से प्रमाणित कराकर जिला प्रशासन और जनजातीय कल्याण विभाग को दें। इससे विकसित भारत 2047 के लक्ष्य में आदिवासी समुदायों की वास्तविक प्राथमिकताएं नीति में जगह पा सकती हैं।
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