Friday, April 29, 2016

भारत में पुरस्कार लेने और लौटाने के राजनीतिक मंच पर कम्युनिस्टों का माँस भोज-- डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

नयनतारा सहगल नेहरु परिवार से ताल्लुक़ रखतीं हैं । अपने ज़माने में अंग्रेज़ी भाषा में पढ़ती लिखती रही हैं । उनके लिखे पर कभी साहित्य अकादमी ने उन्हें पुरस्कार दिया था । पिछले दिनों उन्होंने वह पुरस्कार साहित्य अकादमी को वापिस कर दिया । वैसे तो उम्र के जिस पड़ाव  पर नयनतारा सहगल हैं , वहाँ उनके संग्रहालय में कोई पुरस्कार पत्र होने या न होने से बहुत अन्तर नहीं पड़ता । उनका कहना है कि देश में हालात ठीक नहीं हैं । साम्प्रदायिकता बढ़ रही है और कोई कुछ नहीं कर रहा । इसलिये वे अपना पुरस्कार लौटा रही हैं ।  नयनतारा सहगल को इस बात की दाद देनी पड़ेगी कि 1947 से लेकर 2015 तक उन्हें पहली बार देश में बढ़ रही साम्प्रदायिकता दिखाई दी और उन्होंने  घर के सामान की तलाशी लेकर देश को लौटाने के लिये साहित्य अकादमी द्वारा दिया गया प्रशस्ति पत्र ढंूढ निकाला । लिखती लिखातीं तो वे काफ़ी अरसे से हैं और साम्प्रदायिकता भी तब से ही है जब से वे लिखती लिखाती रही हैं , लेकिन कभी साम्प्रदायिकता उन्हें दिखाई नहीं दी और न ही उनकी आत्मा उस समय पुरस्कार वापिस करने  के लिये वजिद हुई । अब नरेन्द्र मोदी की सरकार आते ही उनकी आत्मा अतिरिक्त सक्रिय हो गई । अरसा पहले साहित्य अकादमी द्वारा दिये गये पुरस्कार को राजनैतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की चेष्टा, भारत के अंग्रेज़ी भाषा साहित्य के इतिहास की दुखद घटना ही कही जायेगी । लेकिन इस पर आश्चर्य इसलिये नहीं होता कि देश में अंग्रेज़ों के और अंग्रेज़ी साहित्य के इतिहास में ऐसी दुखद घटनाओं के अम्बार दिखाई दे जाते हैं । भारत में अंग्रेज़ी भाषा के साहित्य के पुरोधा नीरद चौधरी तो अंग्रेज़ों के चले जाने से ही इतना दुखी हुये थे कि हिन्दुस्तान छोड़ कर ही इंग्लैंड में जा बसे थे । नयनतारा का धन्यवाद करना होगा कि वे इतनी साम्प्रदायिकता के बाबजूद कम से कम देश में तो रह रहीं हैं । देश पर इतना अहसान क्या कम है ?
                    लेकिन नयनतारा सहगल के तुरन्त बाद ,कभी आई ए एस अधिकारी रहे अशोक वाजपेयी ने भी अपना पुरस्कार साहित्य अकादमी को लौटा दिया । अशोक वाजपेयी प्रशासन चलाने के साथ साथ हिन्दी में कविता कहानी भी लिखते रहते थे । प्रशासनिक क्षेत्र के लोग उन्हें हिन्दी साहित्य में निपुण बताते हैं लेकिन हिन्दी साहित्य के लोग उनको प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर ज़्यादा पहचानते है । प्रशासनिक अधिकारी रहते हुये कोई व्यक्ति साहित्य के क्षेत्र में जितना ऊँचा क़द कर सकता है , उतना अशोक जी ने कर लिया था ।  उनकी उन कविता कहानियों पर उन्हें भी कभी साहित्य अकादमी ने इनाम इकराम दिया था । ये सब बातें मध्य प्रदेश के क़द्दावर नेता अर्जुन सिंह के ज़माने की हैं । अर्जुन सिंह थे तो खाँटी राजनैतिक क़िस्म के प्राणी ही , लेकिन कविता कहानी और क़िस्से सुनने का उन्हें भी काफ़ी शौक़ था । वैसे उनको लेकर कई क़िस्से भी प्रचलित हो गये थे । इस कारण से मध्य प्रदेश में अर्जुन सिंह व अशोक वाजपेयी की जोड़ी ख़ूब जम गई थी । एक को क़िस्से कहानी सुनने का शौक़ था और दूसरे को लिखने और सुनाने का । इसलिये जोड़ी जमनी ही थी । कई लोग तो यह भी कहते हैं कि इस जोड़ी ने मध्य प्रदेश  में आतंक जमा रखा था । उन जिनों अशोक वाजपेयी की कविताई ख़ूब फली फूली और जगह जगह से इनाम इकराम भी मिले । दरबार में रहने का यह लाभ होता ही है । यह परम्परा आज की नहीं प्राचीन काल की है । जिन दिनों भोपाल में गैस कांड हुआ था ,लोग कुत्ते बिल्ली की तरह मर रहे थे लेकिन अर्जुन सिंह इसके लिये ज़िम्मेदार कम्पनी के मालिक को जेल भेजने की बजाए , जहाज़ देकर देश से बाहर सुरक्षित पहुँचाने के राष्ट्रीय कार्य में लगे हुए थे , उन दिनों भी चर्चा हुई थी कि शायद अशोक वाजपेयी विरोध स्वरुप सरकार द्वारा दिया गया कोई मोटा न सही , छोटा पुरस्कार ही वापिस कर देंगे । लेकिन ऐसा नहीं हुआ था । आत्मा को भी समय स्थान देख कर ही जागना होता है । शायद अशोक वाजपेयी को लगा होगा कि आत्मा के जगने का वह राजनैतिक लिहाज़ से उचित समय नहीं था । सब साहित्यकार जानते हैं कि पुरस्कार लेने और लौटाने की भी पूरी राजनीति होती है । अचानक अब अशोक वाजपेयी ने फ़ैसला ले लिया कि जब नयनतारा सहगल ने घर की सफ़ाई शुरु कर दी है और इनाम वापिस करने शुरु कर दिये हैं तो उन्हें भी पीछे नहीं रहना चाहिये । उन्होंने भी अपना साहित्य अकादमी वाला पुरस्कार वापिस लौटाने की घोषणा कर दी है । कारण उनका भी वही है कि देश की हालत बिगड़ती जा रही है । प्रधानमंत्री चुप क्यों हैं ? वैसे कई साहित्यकार इस बात को लेकर भी हैरान हैं कि उन्होंने केवल साहित्य अकादमी वाला पुरस्कार ही क्यों लौटाया ? पुरस्कार तो उन्हें अर्जुन सिंह के ज़माने में और भी बहुत मिले थे । लेकिन क्या लौटाना है और क्या संभाल कर रखना है , इसे अशोक वाजपेयी से बेहतर कौन जान सकता है । ऐसे साहित्यकार साहित्य को थाली बना कर प्रयोग करते हैं । जीवन भर यजमान से उस थाली में भर भर कर दान दक्षिणा प्राप्त करते रहते हैं । उसके बलबूते साहित्य की रणभूमि में चिंघाड़ते रहते हैं । समय निकाल कर भारत भवन में घुस कर साहित्यिक खर्राटे मारते हैं । शिष्य मंडली उन खर्राटों की भी व्यंजनामूलक व्याख्या करती है । जब सूर्य अस्त होने का समय आता है , यजमान के घर से 'अब कुछ नहीं मिलेगा' का आभास होने लगता है तो ग़ुस्से में आकर,  अब तक का माल असबाब समेट कर ख़ाली थाली नये यजमान की ओर फेंक देते हैं । अशोक वाजपेयी से बडा प्रयोगधर्मी साहित्यिक जगत में कौन है ? जिसे वे पुरस्कार लौटाने की संज्ञा दे रहे हैं , वह मात्र ग़ुस्से में आकर नये यजमान की ओर फेंकी गई ख़ाली थाली की झनझनाहट है । इसे मध्यप्रदेश में वाजपेयी के सब मित्र अच्छी तरह जानते हैं । इस समय सचमुच अर्जुन सिंह की बहुत याद आ रही है । वे आज होते तो शिष्यों को यह दिन देखने पड़ते ?

                       केरल के साहित्यकार साराह जोसफ़ और उर्दू साहित्यकार रहमान अब्बास ने भी अपना सम्मान वापिस कर दिया है । इसी प्रकार पंजाब के तीन चार साहित्यकारों गुरबचन भुल्लर, अजमेर सिंह औलख,और आत्मजीत ने साहित्य अकादमी को,कुछ बरस पहले मिले पुरस्कार लौटा दिये । अब तक यह संख्या पचास के पास पहुँच गई है । दर्द सब का एक ही है । देश में साम्प्रदायिक वातावरण पनप रहा है । लोग असहिष्णु हो गये हैं । पर ये साहित्यकार यह खोजने की कोशिश नहीं करते कि इन की किन हरकतों से लोग असगिष्णु हो गये हैं ? लेकिन विरादरी में कुछ ऐसे लोग भी थे जिन के पास लौटाने के लिये कुछ नहीं था । उनके पास साहित्य अकादमी के निकायों की सदस्यता ही थी । दो तीन ने वही छोड़ दी । यह अलग बात है कि उनकी सदस्यता की मियाद वैसे भी कुछ समय में ख़त्म ही होने वाली थी ।

                               लेकिन  ऐसे अवसर पर कम्युनिस्टों की सक्रियता देखते ही बनती है । कम्युनिस्टों के लिये राजनैतिक युद्ध का अपना दर्शन है । उसमें नैतिकता अनैतिकता का प्रश्न सदा गौण रहता है । जब लड़ाई शुरु होती है तो सेना के विशेषज्ञ प्रथम रक्षा पंक्ति के ध्वस्त हो जाने की संभावना को ध्यान में रखते हुये द्वितीय रक्षा पंक्ति और उससे भी आगे तृतीय रक्षा पंक्ति तक की तैयारी करके रखते हैं । उसी की तर्ज़ पर क्म्युनिस्ट पार्टियाँ दुनिया भर में लोकयुद्ध की तैयारी करती हैं । लेकिन वे प्रथम रक्षा पंक्ति कभी तैयार नहीं करतीं । क्योंकि वे जानते हैं कि इस रक्षा पंक्ति में युद्ध आम जन के बीच में जाकर लड़ना होता है और उसका फ़ैसला भी आम जनता ही करती है । लोकतंत्र के इस लोकयुद्ध में उनके जीतने की संभावना लगभग शून्य होती है । चीन में जो कम्युनिस्टों का मक्का माना जाता है , उसमें भी नाम तो आम जनता का ही लिया जाता है लेकिन साम्यवादी तानाशाही के ख़िलाफ़ लोगों को कोई दूसरा समूह बनाने का अधिकार नहीं दिया जाता । कम्युनिस्टों की इस रणनीति की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती यह है कि उनके लोक युद्धों में सामान्य आदमी या 'लोक' सदा ग़ायब रहता है । लेकिन साम्यवादियों का दावा रहता है कि लोक मानस  को सबसे ज़्यादा वही जानते हैं । यह अलग बात है कि लोक मानस को समझ पाने का उनका दावा इतिहास ने सदा झुठलाया है । भारत विभाजन के समय वे मुस्लिम लीग के साथ थे और पाकिस्तान निर्माण के समर्थक थे । 1942 में अंग्रेज़ो भारत छोड़ो के आन्दोलन के समय वे अंग्रेज़ों के साथ थे और भारतीय मानस को समझने का दावा भी कर रहे थे । 1962 में चीन के आक्रमण में वे चीन के साथ थे और फिर भी भारत के लोगों के मन को समझने का दावा कर रहे थे । 1950 से लेकर आज तक कम्युनिस्टों के सभी समूहों को मिला कर वे लगभग साढ़े पाँच सौ की लोक सभा में वे पचास से ज़्यादा सीटें कभी जीत नहीं सके , फिर भी उनका दावा रहता है कि भारतीय जन के असली प्रतिनिधि वही हैं ।

                         लेकिन कहीं भी राजनैतिक भोज हो या साहित्यिक भोज हो , कम्युनिस्ट उसकी गंध मीलों दूर से सूंघ लेते हैं । उसके बाद झपटा मार कर वे मंच पर क़ब्ज़ा जमा लेते हैं और अपना नुक्कड़ नाटक चालू कर देते हैं । एक के बाद एक , आकाशमार्ग से पंख फैलाते हुए उनका धरती पर उतरना बहुत ही मनमोहन दृष्य उपस्थित करता है । आकाश मार्ग से उतरने का यह भव्य दृष्य दो बार होता है । पहले पुरस्कार प्राप्त करने के समय और दूसरा , यदि जरुरत पड़ जाये तो , उसे लौटाने के समय । नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी द्वारा साहित्य के धरातल पर शुरु किये गये इस साहित्यिकनुमा राजनैतिक भोज की गंध देखते देखते कम्युनिस्ट खेमे में पहुँच गई । वे बड़ी संख्या में वहाँ इक्कठे हो गये और अब धडाधड ,जिस के पास साहित्य अकादमी का पुरस्कार था वह साहित्य अकादमी का पुरस्कार और जिस के पास कोई प्रदेश या ज़िला स्तर का पुरस्कार था उसने वही पुरस्कार लौटाना प्रारम्भ कर दिया । इन्दिरा गान्धी के ज़माने में कम्युनिस्ट उनके काफ़ी समीप चले गये थे । संकट काल में उनकी मदद कर दिया करते थे । उनके कामों की प्रगतिवादी शब्दावली में व्याख्या करके वैचारिक गरिमा प्रदान करने का वामपंथी कार्य भी करते थे । इसके बदले में उन्हें सरकार से इनाम इकराम मिलते रहते थे । साहित्य के काम धंधे में लगी टोली को साहित्यिक इनाम मिलते थे । जिन्हें पढ़ाने का शौक़ था , उनको इनाम में जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय दिया गया । जिनकी राजनीति में रुचि थी उनको पार्टी में शामिल करके एक आध मंत्री पद भी दिया गया । बीच बीच में रुस सरकार भी इनको मास्को में बुला बुला कर साहित्यिक पुरस्कार नुमा प्रशस्ति पत्र दिया करती थी । सरकारी ख़र्च पर घूमना फिरना तो होता ही था । अब वह युग बीत गया है । लेकिन साम्यवादी खेमा अस्त होने से पहले एक अंतिम लड़ाई लड़ लेना चाहता है । इसलिये अपने ज़माने में प्राप्त इस सारी पुरानी पड़ गई सामग्री को समेट कर , अपनी वाममार्गी साधना से एक ऐसा हथियार बनाना चाहता है जो नरेन्द्र मोदी को चित कर दे । साहित्यिक पुरस्कार लौटाने का यह नुक्कड़ नाटक उसी का हिस्सा है । अलबत्ता इस बात का ध्यान सभी रख रहे हैं कि सम्मान लौटाने की सीमा सम्मान देने वाली संस्था से प्राप्त सूचना पत्र लौटाने तक ही सीमित रहे । यहाँ तक सम्मान से प्राप्त धनराशि का प्रश्न है , उसको इस अभियान से दूर ही रखा जाये ।  बहुत से साहित्यकार पुरस्कार लौटाने में यही बेईमानी कर रहे हैं । अरसा पहले इनाम देने वाली संस्था ने जो इनाम देने की चिट्ठी भेजी थी और उसके साथ प्रमाण पत्र नत्थी किया था , वह तो इनाम देने वाली संस्था को लौटा रहे हैं , लेकिन साथ आया चैक अभी भी गोल कर रहे हैं । सार सार को गहि रहे थोथा देत उड़ाए । थोथा सर्टिफ़िकेट अकादमी की ओर उड़ा दिया और धन रुपी सार अभी भी संभाल कर ही रखा हुआ है । साहित्यिक पुरस्कारों के माँस भोज में सारा माँस चट कर लेने के बाद यह सूखी हड्डियाँ लौटाने का नया साम्यवादी पर्व शुरु हुआ है ।
                           कम्युनिस्ट अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में वे लोकतांत्रिक पद्धति से कभी जीत नहीं सकते , इसलिये तेलंगाना सशस्त्र क्रान्ति से लेकर कश्मीर में शेख़ अब्दुल्ला को आगे करके जम्मू कश्मीर को  अलग स्वतंत्र राज्य बनाने के प्रयास करते रहे । लेकिन जन विरोध के कारण वे वहाँ भी असफल ही रहे । तब उन्होंने अपनी रणनीति बदली और कांग्रेस में घुस कर वैचारिक प्रतिष्ठानों पर क़ब्ज़ा करने में लग गये । उसमें उन्होंने अवश्य किसी सीमा तक सफलता प्राप्त कर ली । कांग्रेस को भी उनकी यह रणनीति अनुकूल लगती थी । इससे कांग्रेस को अपनी तथाकथित प्रगतिशील छवि बनाने में सहायता मिलती रही और कम्युनिस्टों को बौद्धिक जुगाली के लिये सुरक्षित आश्रयस्थली  उपलब्ध होती रही । लेकिन इन आश्रयस्थलियों  में सुरक्षित बैठकर बौद्धिक जुगाली करते इन तथाकथित साहित्यकारों , रंगकर्मियों , फिल्मनिर्माताओं और इतिहासकारों में एक अजीब हरकत देखने में मिलती है । भारतीय इतिहास, संस्कृति , साहित्य इत्यादि को लेकर जो अवधारणाएँ ,अपने साम्राज्यवादी हितों के पोषण के लिये ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने प्रचलित की थीं , ये भलेमानुस भी उन्हीं की जुगाली कर रहे हैं , जबकि रिकार्ड के लिये साम्यवादी जनता में यही प्रचारित करते हैं कि उनके जीवन का अंतिम ध्येय ही साम्राज्यवाद की जड़ खोदना है । भारत में यह विरोधाभास आश्चर्यचकित करता है । ब्रिटिश साम्राज्यवादी भारत को लेकर जो अवधारणाएं स्थापित कर रहे थे , वे भारतीयता के विरोध में थीं । उनका ध्येय भारत में से भारतीयता को समाप्त कर एक नये भारत का निर्माण करना था , जिस प्रकार चर्च ने यूनान में यूनानी राष्ट्रीयता को समाप्त कर एक नये यूनान का निर्माण कर दिया और इस्लाम ने मिश्र में वहाँ की राष्ट्रीयता को समाप्त कर एक नये वर्तमान मिश्र का निर्माण कर दिया । इसी को देख कर डा० इक़बाल ने कभी कहा था--- यूनान मिश्र रोमां मिट गये जहाँ से ।' इस मिटने का अर्थ वहाँ की राष्ट्रीयता एवं विरासत के मिटने से ही था । इसी का अनुसरण करते हुये ब्रिटिश साम्राज्यवादी हिन्दुस्तान को भी बीसवीं शताब्दी का नया यूनान बनाना चाहते थे । उस समय की कांग्रेस में उन्होंने ऐसे अनेक समर्थक पैदा कर लिये थे जो भारतीयता को इस देश की प्रगति में बाधा मानकर , उसे उखाड़ फेंककर , यूनान की तर्ज़ पर एक नये राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे । कांग्रेस में पंडित नेहरु इसके सरगना हुये । कम्युनिस्ट भी इसी अवधारणा से सहमत थे , इसलिये इस मंच पर बैठने वाले वे स्वाभाविक साथी बने । मुस्लिम लीग ने तो भारतीय इतिहास और संस्कृति को नकारने से ही अपनी शुरुआत की थी । वे इस मंच के तीसरे साथी हुये । लेकिन कोढ में खाज कि तरह ये तीनों दल या समूह अपनी राजनैतिक लड़ाइयाँ तो अलग अलग लड़ते थे लेकिन भारत की संस्कृति के विरोध में इक्कठे नज़र आते थे । इस प्रकार ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा तैयार किये गये इस वैचारिक अनुष्ठान में कांग्रेस और कम्युनिस्ट स्वाभाविक साथी बने । ज़ाहिर है भारत में भारतीयता विरोधी यह वैचारिक अनुष्ठान ब्रिटिश-अमेरिकी साम्राज्यवादी शक्तियों ने तैयार किया था , इसलिये इसकी सफलता के लिये वे 1947 के बाद से ही प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रुप से , दूर व नज़दीक़ से इसकी सहायता करते रहे । कहना न होगा , जहाँ तक सांस्कृतिक व इतिहास के फ़्रंट की लड़ाई का प्रश्न है , भारत में कम्युनिस्ट इच्छा से या अनिच्छा से ब्रिटिश -अमेरिकी साम्राज्यवादी शक्तियों का मोहरा बन गये । भारतीय राजनीति का पिछले तीस साल का कालखंड तो इस मोर्चा के लिये अत्यंत लाभकारी रहा और वे भारतीयता के विरोध को ही भारत की राजनीति का केन्द्र बिन्दु बनाने में कामयाब हो गये । इसका कारण केन्द्र में गठबन्धन की राजनीति का वर्चस्व स्थापित हो जाना था । भारतीयता विरोधी विदेशी साम्राज्यवादी शक्तियों के लिये यह समय सबसे अनुकूल रहा ।
                       लेकिन २०१४ में भारतीयों ने तीस साल के बाद लोकतांत्रिक पद्धति से कांग्रेस-कम्युनिस्टों के इस संयुक्त मोर्चा को ध्वस्त कर दिया । पहली बार लोक सभा में किसी एक राजनैतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ । कम्युनिस्टों के लिये सबसे कष्टकारी बात यह थी कि यह बहुमत भारतीय जनता पार्टी को मिला । जिन राष्ट्रवादी शक्तियों के विरोध को कम्युनिस्टों ने अपने अस्तित्व का आधार ही बना रखा था , उन्हीं राष्ट्रवादी शक्तियों के समर्थन में भारत के लोग एकजुट होकर खड़े हो गये । कम्युनिस्टों की आश्रयस्थलियां नष्ट होने के कगार पर आ गईं । इतने साल से जिस स्वप्न लोक में रहते रहे और उसी को धीरे धीरे यथार्थ मानने लगे थे , उसे भारत की जनता ने एक झटके में झटक दिया । भारतीय मानस को समझ लेने का उनका दावा ख़ारिज हो गया । दरबार उजड़ गया । भारत के इतिहास और संस्कृति की साम्राज्यवादी व्याख्या पर ख़ुश होकर राजा सोने की अशर्फ़ी इनाम में देता था , वह राजपाट लद गया । लगता है दरबार के उजड़ जाने पर , उसके आश्रितों की फ़ौज विलाप करती हुई राजमार्ग पर निकल आई हो । कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों की यह फ़ौज अब अंतिम लड़ाई के लिये मैदान में निकली है ।
                      जिस प्रकार आतंकवादी अपनी लड़ाई में बच्चों को , स्त्रियों को चारे के रुप में इस्तेमाल करते हैं , उसी प्रकार कम्युनिस्ट अपनी लड़ाई में कलाकारों , लेखकों , साहित्यकारों , चित्रकारों , इतिहासकारों का प्रयोग हथियार के रुप में करते हैं । लेकिन इस काम के लिये वे सचमुच साहित्यकारों , कलाकारों या इतिहासकारों का प्रयोग करते हों , ऐसा जरुरी नहीं है । क्योंकि कोई भी साहित्यकार या इतिहासकार आख़िर कम्युनिस्टों की इस ग़ैर लोकतांत्रिक लड़ाई में हथियार क्यों बनना चाहेगा ? इसलिये कम्युनिस्ट अत्यन्त परिश्रम से अपने कैडर को ही साहित्यकार, इतिहासकार, और सिनेमाकार के तौर पर प्रोजैक्ट करते रहते हैं , ताकि इस प्रकार के संकटकाल में उनका प्रयोग किया जा सके । भारत में कम्युनिस्टों को इस काम में सत्तारुढ कांग्रेस से बहुत सहायता मिली । अपने लोगों को विभिन्न सरकारी इदारों से समय समय पर पुरस्कार दिलवा कर उनका रुतबा बढ़ाया गया । पिछले साठ साल से कम्युनिस्ट भारत में यही काम कर रहे थे । इसलिये उनके पास विभिन्न क्षेत्रों में पुरस्कार प्राप्त या फिर जिनका रुतबा बढ़ गया हो , ऐसे लोगों की एक छोटी मोटी फ़ौज तैयार  हो गई है ।

                   लेकिन जब से नरेन्द्र मोदी की सरकार बनी है , तब से कम्युनिस्ट खेमे में हाहाकार मचा हुआ है । भाजपा को हराने के लिये कम्युनिस्ट न जाने कितने कितने फ़ार्मूले जनता को समझाते रहे । लेकिन इस देश की जनता कम्युनिस्टों की भाषा नहीं समझती क्योंकि उनकी भाषा इस देश की मिट्टी से निकली हुई नहीं होती । उनकी भाषा कभी मास्कों की भट्टी से तप कर निकलती थी और कभी बीजिंग की भट्टी से । इसलिये देश के लोगों ने कम्युनिस्टों को हाशिए पर पटक दिया । इसलिए कम्युनिस्ट अब दूसरी व तीसरी रक्षा रक्षा पंक्तियों की आरक्षित सेना को इस लोक विरोधी लड़ाई में उतार रहे है । साहित्यकारों को आगे करके अपनी राजनैतिक लड़ाई लड़ना कम्युनिस्टों की पुरानी शैली है । उनके लिये साहित्य की स्वतंत्र इयत्ता नहीं है , वह केवल पार्टी के प्रचार का साधन मात्र है । उनके लिये साहित्यकार की उपयोगिता भी यही है , जिसका उपयोग वे इस समय कर रहे हैं । साहित्य और साहित्यकार की कम्युनिस्टों के खेमे में क्या औक़ात है , इसका ख़ुलासा आधुनिक कम्युनिस्टा अरुन्धति राय ने किया है । उसके अनुसार,हमारी रणनीति केवल साम्राज्य को ललकारने की ही नहीं होनी चाहिये, बल्कि हर तरीक़े से उसकी घेराबन्दी करने की होनी चाहिये । इसकी प्राणवायु समाप्त करने की , इसकी हँसी उड़ाने की , इसको लज्जित करने की होनी चाहिये । यह सब कुछ हमें अपनी कला, अपने संगीत,अपने साहित्य, अपने हठ, अपनी योग्यता, अपने परिश्रम से करना होगा । लोगों को अपनी कहानियाँ सुनाने की योग्यता से करना होगा ।" कम्युनिस्ट लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ,जनता के पास जाकर , उससे उनकी भाषा में संवाद रचना करने में असफल हैं , क्योंकि वे स्वयं आयातित प्राणवायु पर जीते हैं । लेकिन लोकशाही को गिराने के लिये वे साहित्य का दुरुपयोग करने में लज्जा महसूस नहीं करते । उनकी एक मात्र योग्यता , जिसकी ओर राय ने इशारा किया है , हठपूर्वक अपने कहानी को बार बार दोहराते रहना ही है । कम्युनिस्ट , साहित्य को प्रचार सामग्री और साहित्यकार को पार्टी का भोंपू मानते हैं । यही कारण है कि अब लोकशाही के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई में वे, साहित्यकारों को उपहास का पात्र बना रहे हैं ।


                      दरअसल साहित्य जगत से जुड़े लोग अच्छी तरह जानते हैं कि पुरस्कार प्राप्त करने की भी अपनी एक स्थापित राजनीति है । जिनकी किताबों को पढ़ने के लिये दस पाठक भी नहीं मिलते और जिनकी किताब का पाँच सौ प्रतियों में छपा पहला संस्करण बिकने में दस साल खा जाता है, कई बार उन्हें ही साहित्य शिरोमणि घोषित किया जाता है । कई बार ऐसे व्यक्ति को पुरस्कार मिलता है जिसके बारे में पुरस्कार मिलने के बाद ही साहित्य जगत को पता चलता है कि पुरस्कार विजेता लिखता भी है । इनमें से कुछ साहित्यकार तो ऐसे हैं जिनके 'अमर साहित्य' की चर्चा केवल 'आई ए एस सर्किल' में ही होती है । अनेक साहित्यकार अपने लिखें को अपने परिवार वालों को सुना कर ही संतोष प्राप्त करते हैं । शेष पार्टी के कैडर में गा गाकर तालियाँ बटोरते हैं । रही बात पुरस्कारों की , तो अन्धा बाँटे रेवड़ियाँ फिर फिर अपनों को ' की कहावत का अर्थ हिन्दी वालों को इनको पुरस्कार मिलते देख कर ही समझ में आया ।

                           यह साहित्य जगत का अपना काला बाज़ार है । जिस प्रकार पुरस्कार लेने की राजनीति है , उसी प्रकार पुरस्कार लौटाने की भी अपनी एक राजनीति है । जो उसी राजनीति के चलते पुरस्कार लेगा तो वह उसी राजनीति के आधार पर पुरस्कार लौटायेगा भी । नहीं लौटायेगा तो तंजीम से बाहर कर दिया जायेगा । जो अपने बलबूते पुरस्कार प्राप्त करता है , वह उसकी अपनी कमाई है । उसके लौटाने का सवाल कहाँ पैदा होता है ? लेकिन जिनको दरबार में रहने के कारण पुरस्कार मिला होता है , उनको संकट काल में दरबार के कहने पर पुरस्कार लौटाना ही होता है । दरबारी परम्परा में इसमें नया कुछ नहीं है । साम्यवादियों से बेहतर इसे कौन समझ सकता है ?  पंजाबी में कहा भी गया है- धर्म से धड़ा प्यारा । पंजाब के औलख,भुल्लर और मेघराज मित्तर से ज़्यादा अच्छी तरह इसे कौन समझ सकता है ? पंजाबी की एक दूसरी साहित्यकार प्रो० दिलीप कौर टिवाणा ने पद्म श्री वापिस कर दी । अस्सी साल की उम्र में वैसे भी इन पुरस्कारों और तगमों की कोई औक़ात नहीं रह जाती । उम्र का एक हिस्सा होता है जिस में ये पुरस्कार और तगमे किसी भी व्यक्ति को प्रोजैक्ट करने में सहायता करते हैं । उतना लाभ इन तगमों से लिया जा चुका है । उम्र के चौथे मोड़ पर ये तगमे और पुरस्कार उस बाँझ पशु के समान हो जाते हैं , जिनसे जितना दूध लिया जा सकता था , लिया जा चुका है । अब आगे इसके बयाने और दूध देते रहने की कोई संभावना नहीं है । लोग उस बाँझ पशु को घर से निकाल देते हैं । अनेक साहित्यकारों के लिये इन तगमों और पुरस्कारों की भी यही स्थिति हो गई है । लेकिन उनकी रणनीति की दाद देनी पड़ेगी । उन्हेंने पुरस्कार लेने का भी लाभ उठाया और अब पुरस्कार लौटाने का भी लाभ उठा रहे हैं । भैंस जीती है तो दूध पाओ और उसके मरने के बाद चमड़े से भी पैसा कमाओ । पुरस्कार लौटाकर चमड़े से भी पैसा कमाने की साहित्यिक व्यवसायिकता का प्रमाण ही कुछ साहित्यकार दे रहे हैं । नरेन्द्र मोदी को घेरने के लिये कम्युनिस्ट टोला कितने ही हथकंडे अपना चुका है । लेकिन देश की जनता कम्युनिस्टों का साथ नहीं दे रही । अब उन्होंने साहित्यकारों को आगे करके यह नई लड़ाई छेड़ी है । लेकिन उन्हें शायद यह अहसास नहीं है कि रणभूमि में यह बहुत कमज़ोर बटालियन उतार दी गई है । यह कुछ देर के लिये मनोरंजन तो कर सकती है लेकिन देश की जनता को मुख्य मार्ग से हटा नहीं सकती । ऐसा नहीं कि पुरस्कार लौटाने वाले सभी साहित्यकार कम्युनिस्ट विचार धारा के खूँटे से बँधे लोग ही हैं । कुछ ऐसे भी हैं जिनका किसी भी विचार धारा से कोई रिश्ता नहीं है । वे भी पुरस्कार लौटाने वालों की जमात में शामिल हो गये हैं । ये लोग चलती भीड़ में शामिल होने वालों की श्रेणी के हैं । हर समाज में ऐसे लोग मिलते हैं ।
    वैसे पुरस्कार लौटाने के इस नुक्कड़ नाटक में भाग लेने वाले साहित्यकारों को एक प्रश्न का उत्तर तो इस पूरे नाटक में देना ही होगा । हो सकता है कि वह प्रश्न स्क्रिप्ट में न हो । लेकिन मंच के नीचे बैठे दर्शकों को भी आधुनिक नुक्कड़ नाटकों में प्रश्न पूछने का अधिकार तो है ही । दर्शकों का वह प्रश्न है कि देश में इससे पहले भी अनेक दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ हो चुकी हैं । दादरी की घटना ऐसी पहली घटना नहीं है । आपात काल को पुरानी घटना भी मान लिया जाये तो १९८४ में कांग्रेस की नाक के नीचे जो नरसंहार हुआ , उसे देख कर किसी की आत्मा क्यों नहीं जागी ? अब तो यह सिद्ध हो चुका है कि उस नरसंहार में उस समय के सत्ताधीशों का प्रत्यक्ष हाथ था । वैसे कार्ल मार्क्स आत्मा की सत्ता को नकारते हैं , लेकिन फिर भी कार्ल मार्क्स को ही साक्षी मान कर बता सकते हैं कि वे अब तक चुप क्यों थे ? वे अब तक चुप क्यों रहे , यह प्रश्न बंगला भाषा की जानी पहचानी लेखिका तसलीमा नसरीन  ने भी उठाया है । अरसा पहले नसरीन की पुस्तक पर सरकार ने पाबंदी आयद कर दी थी । पश्चिमी बंगाल की उस समय की साम्यवादी सरकार ने तो तसलीमा का कोलकाता रहना मुश्किल कर दिया था । उनको देश से निकालने की ही तैयारियाँ होने लगी थीं । कारण मुसलमानों की नाराज़गी ही कहा जा रहा था । तसलीमा के अनुसार कुछ भारतीय लेखकों ने उनकी पुस्तक पर पाबंदी लगाने और उन्हें पश्चिम बंगाल से बाहर किए जाने का भी समर्थन किया था। तसलीमा को इस बात पर आश्चर्य हो रहा है कि जब उनके ख़िलाफ़ फ़तवा जारी हो रहे थे । दिल्ली में वे लगभग एक नज़रबन्दी की हालत में रह रही थीं और उनकी किताब पर आधारित एक टीवी धारावाहिक का प्रसारण रोक दिया गया, तब तो लेखक चुप ही रहे । इस साहित्यिक प्रश्न पर तो उनकी आत्मा जाग सकती थी ।  तसलीमा नसरीन का ग़ुस्सा जायज़ ही है । जिस समय लेखकों को लेखक समुदाय के ही दूसरे लेखक की बोलने की आज़ादी के लिए ,विरोध ही दर्ज करवाना नहीं, बल्कि उसके लिए सक्रिय संघर्ष भी करना चाहिए था , तब तो वे सामूहिक रुप से भी और व्यक्तिगत रुप में भी चुप ही रहे । अब जब मुद्दा आपराधिक है और दंड संहिता से ताल्लुक़ रखता है , तो तीन दर्जन से भी ज़्यादा लेखक पारितोषिक वापिस देने के लिए तैयार हो गये । तसलीमा नसरीन का प्रश्न बिल्कुल जायज़ है लेकिन इसका उत्तर देने के लिए किसी भी लेखक ने स्वयं को बाध्य नहीं माना । यह पुरस्कार लौटाने वालों की जमात का दोहरा चरित्र ही स्पष्ट करता  है ।
            23 अक्तूबर 2015 को साहित्य अकादमी की बैठक के समय जनवादी लेखक मंच के नाम से कुछ साहित्यकारों ने अकादमी भवन के बाहर प्रदर्शन किया और अकादमी के अध्यक्ष को ज्ञापन सौंपा । इन लेखकों का कहना था कि अकादमी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति के अधिकार की रक्षा के लिये आगे आना चाहिये । लेखकों का यह जत्था यह नहीं बता रहा था कि अकादमी ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विरोध कब किया ? अकादमी विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित साहित्यिक कृतियों का मूल्याँकन करवाती है । उसके आधार पर उनमें से कुछ को पुरस्कार दिया जाता है । कर्नाटक में एक जाने माने प्रतिष्ठित साहित्यकार कालबुर्गी की हत्या कर दी गई है तो वहाँ अपराधियों को दंडित करने के लिये साहित्यकारों को अवश्य लड़ना चाहिये । लेकिन साहित्यकार ऐसा न करके दिल्ली में साहित्य अकादमी के आगे क्या कर रहे हैं ? ज़ाहिर है उनका दुख कालबुर्गी की नृशंस हत्या को लेकर नहीं है , बल्कि वे उसकी ढाल बना कर नरेन्द्र मोदी की सरकार पर निशाना साधना चाहते हैं । यह वर्षों पुराना घटिया साम्यवादी तरीक़ा है , जिस पर से रंग रोगन पहले ही उतर चुका है । कालबुर्गी की आत्मा भी साम्यवादियों की इस हरकत पर आँसू बहा रही होगी । मरे हुये आदमी की लाश पर भी राजनैतिक रोटियाँ सेंकने की यह निंदनीय हरकत है । लेकिन साम्यवादियों के लिये तो वैसे भी साहित्य रचना कला साधना नहीं है बल्कि पार्टी एप्रेटस का मात्र एक हिस्सा है । साहित्य अकादमी ने साहित्यकारों से अपील की है कि वे पुरस्कार को राजनैतिक लड़ाई का साधन न बनायें ।
                 वैसे तो साहित्य अकादमी की अपनी महिमा भी पूर्व काल में न्यारी ही रही है । एक बार जम्मू कश्मीर के एक सज्जन मोहम्मद यूसुफ़ टेंग ने , वहाँ के उस समय के मुख्यमंत्री शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला की जीवनी आतिशे चिनार लिखी थी । वह जीवनी शेख़ के सुपुर्दे ख़ाक हो जाने के बाद छपी । लेकिन किताब पर शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला का नाम लेखक के नाते ही छाप दिया गया । जबकि टेंग ने किताब के शुरु में ही साफ़ कर दिया था कि मेरी शेख़ की जीवनी लिखने की इच्छा थी । इसलिये मैं उनके पास उनकी जीवन यात्रा की घटनाएँ और क़िस्से जानने के लिये जाता था और शेख़ मूड में आकर बताते भी थे । शेख़ से बातचीत करने के बाद घर आकर टेंग साहिब उनकी जीवनी लिखने का काम शुरु कर देते । इसके बाबजूद कोई घटना गल्त न लिखी जाये , इसके लिये वे लिखने के कुछ दिन बाद शेख़ को जाकर वह दिखा भी आते थे । कोई भी जीवनी लेखक प्रामाणिक सामग्री जुटाने के लिये यह सब करेगा ही । लेकिन बाद में उस किताब का लेखक ही शेख़ अब्दुल्ला को बता दिया गया । किताब के छपते ही साहित्य जगत में हंगामा हो गया कि इस किताब का लेखक किसको माना जाये ? शेख़ को या टेंग को ? शेख़ परिवार की राजनैतिक हैसियत देखते हुये टेंग तो भला क्या साहस दिखाते । वैसे भी उन्होंने इस बात का ख़ुलासा उस किताब में कर ही रखा था । लेकिन साहित्य अकादमी ने आनन फ़ानन में उर्दू भाषा के साहित्य का उस साल का पुरस्कार ही शेख़ मोहम्मद के नाम कर डाला । टेंग चुप रह गये । अब देखना होगा कि जब नयनतारा सहगल व अशोक वाजपेयी ने साहित्य अकादमी के दिये पुरस्कार लौटाने की शुरुआत कर दी है तो क्या अब्दुल्ला परिवार के लोग भी यह पुरस्कार लौटायेंगे ? आख़िर टेंग के साथ न्याय हो जाये , इसी को ध्यान में रखते हुये यह पुरस्कार लौटाया जा सकता है ।
         कम्युनिस्टों को भ्रम था कि पुरस्कार लौटाने वाले नुक्कड़ नाटक से देश में कोहराम मच जायेगा । लेकिन ऐसा न होना था और न ही हुआ । कोहराम उनसे मचता है जिनका देश की जनता पर कोई प्रभाव हो । कुछ दिन अख़बारों में हाय तौबा तो मचती रही , इलैक्ट्रोंनिक चैनलों पर बहस भी चलती रही । लेकिन कम्युनिस्ट भी समझ गये थे कि यह पटाखा आवाज़ चाहे जितनी कर ले  , ज़मीन पर इस का प्रभाव नगण्य ही होगा । सोनिया कांग्रेस , कम्युनिस्टों और साम्राज्यवादियों द्वारा लड़ी जा रही इस जन विरोधी लड़ाई में साहित्यकारों द्वारा पुरस्कार लौटाने का नुक्कड़ नाटक बिना कोई प्रभाव छोड़े समाप्त हो जाने से बौखला कर कुछ दिन पहले मैदान में दूसरी बटालियन उतारी गई । यह बटालियन उन लोगों की थी जो फ़िल्में बगैरह बनाते हैं । कई लोगों की फ़िल्में तो जनता देखती भी हैं , लेकिन इनमें से कई  निर्माता ऐसे भी हैं जिनको अपनी फ़िल्मों के लिये दर्शक भी स्वयं ही तलाशने पड़ते हैं । पर क्योंकि ऐसे निर्माता विदेशों से कुछ इनाम आदि बटोर ही लेते हैं इसलिये सजायाफ्ता की तरह इनामयाफ्ता तो कहला ही सकते हैं । वैसे कम्युनिस्टों की रणनीति में अच्छा फ़िल्म निर्माता वही होता है जिसकी फ़िल्म से आम जनता दूर रहती है । रामानन्द सागर कम्युनिस्टों की दृष्टि में अच्छे और प्रतिनिधि निर्माता नहीं थे क्योंकि उनके धारावाहिक रामायण को देखने के लिये इस देश की जनता अपना सारा काम काज छोड़ देती थी । साहित्यकारों के मोर्चे पर फ़ेल हो जाने के बाद इन फ़िल्म निर्माताओं ने रणभूमि में शक्तिमान  की तरह मुट्ठियाँ तानते हुये प्रवेश किया । उनको लगता होगा कि उनको देखते ही देश की जनता उनके साथ ही मुट्ठियाँ भींचते हुये सड़कों पर निकल आयेगी लेकिन हँसी ठिठोली के अलावा इस अभियान में से कुछ नहीं निकला । कुछ दिन उन्होंने भी अपने इनाम बारह वापिस करने में लगाये । उसका हश्र भी वही हुआ जो मेहनत से पाले पोसे तथाकथित साहित्यकारों का हुआ था ।

             अब उतरी है ढोल नगाड़े बजाते हुये अंतिम वाहिनी । यह वाहिनी स्कूलों , कालिजों व विश्वविद्यालयों से रिटायर हो चुके उन अध्यापकों की है जो वहाँ कभी इतिहास पढ़ाते रहे हैं । अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ा चुके इरफ़ान हबीब इस सेना के आगे आगे झंडा लहराते हुये चल रहे हैं । उनके साथ रोमिला थापर तो है हीं ।  के एम पणिक्कर और मृदुला मुखर्जी दायें बायें चल रहे हैं । इस वाहिनी के मार्च पोस्ट से पहले केवल रोमांच पैदा करने के लिये प्रकाश भार्गव नामक वैज्ञानिक से पद्म श्री वापिस करने का बयान दिलवाया गया । लेकिन देश की वैज्ञानिक बिरादरी ने डा० प्रकाश के इस अवैज्ञानिक कार्य की सराहना नहीं की । मार्च पास्ट करती जा रही इतिहास विभाग के अध्यापकों की इस टुकड़ी का भी कहना है कि देश में साम्प्रदायिक तनाव बढ़ रहा है । मत भिन्नता को लेकर असहिष्णुता का प्रदर्शन किया जा रहा है । लेकिन नरेन्द्र मोदी चुप हैं , बोलते नहीं । उनको बोलना चाहिये । इरफ़ान हबीब यह नहीं बताते कि यह साम्प्रदायिकता कौन फैला रहे हैं । असहिष्णु कौन है ? इरफ़ान भाई अच्छी तरह जानते हैं कि यह साम्प्रदायिकता उन्हीं की सेना के लोग फैला रहे हैं । ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की सहायता से खड़ी की गई अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से इसकी शुरुआत हुई थी । इरफ़ान भाई अलीगढ़ विश्वविद्यालय का इतिहास तो जानते ही होंगे ?  देश को बाँटने , विभिन्न फ़िरक़ों को आपस में लड़ाने , एक दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ा करने का कार्य इरफ़ान भाई की यही सेना कर रही है । रहा सवाल असहिष्णु होने का , सामी चिन्तन से ज़्यादा असहिष्णु भला कौन हो सकता है ? इरफ़ान भाई क्या ख़ुलासा करेंगे कि सामी चिन्तन को इस देश में कौन पाल पोस रहा है ? लेकिन आज हिमाचल प्रदेश के इतिहासकार कहे जाने वाले विपन चन्द्र सूद की बहुत याद आ रही है । कुछ साल पहले अल्लाह को प्यारे हो गये । नहीं तो इरफ़ान हबीब और रोमिला थापर के साथ मिल कर वही त्रिमूर्ति का निर्माण करते थे । आज होते तो इनके साथ चलते हुये कितने अच्छे लगते । नाचते गाते हुये साम्यवादी खेमे में इतिहासकार कहे जाने वाले ये लोग भी निकल जायेंगे । कुछ देर तक जनता का मनोरंजन होता रहेगा । लेकिन इससे भारत की राष्ट्रवादी शक्तियाँ और भी मज़बूत होकर निकलेंगी क्योंकि उनके पीछे देश की जनता है ।

देश में नई जनसंख्या नीति की जरूरत है।

देश में नई जनसंख्या नीति की जरूरत है। यह नीति सब पर समान रूप से लागू किया जाये। केंद्र सरकार सीमा पार से हो रही अवैध घुसपैठ पर पूर्ण रूप से अंकुश लगाए। देश में एक राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की जरूरत है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय राष्ट्रीय कार्यमंडल की दूसरे दिन की बैठक में सर्वसम्मति से जनसंख्या वृद्धि दर में असंतुलन की चुनौती विषय पर सांगोपांग चर्चा के बाद यह प्रस्ताव पारित किया गया।  संघ की बैठक रांची के निकट सरला बिरला पब्लिक स्कूल में चल रही है।

प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान संघ ने चिंता जतायी है कि देश में जनसंख्या नियंत्रण के लिए किए गए विविध उपायों से पिछले दशक में जनसंख्या वृद्धि दर में पर्याप्त कमी आयी है। संघ के सह सरकार्यवाह डॉ कृष्ण गोपालजी ने पारित प्रस्ताव का हवाला देते हुए प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि 2011 की जनगणना के धार्मिक आधार पर किए गए विश्लेषण से  विविध संप्रदायों की जनसंख्या के अनुपात में जो परिवर्तन आया है, उसे देखते हुए संघ का मानना है कि जनसंख्या नीति पर पुनर्विचार की जरूरत है।

संघ के सह सरकार्यवाह ने कहा कि विविध संप्रदायों की जनसंख्या वृद्धि दर में भारी अंतर, अनवरत विदेशी घुसपैठ व धमांर्तरण के कारण देश की संपूर्ण जनसंख्या विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों की जनसंख्या के अनुपात में बढ़ असंतुलन देश की एकता, अखंडता और सांस्कृतिक पहचान के लिए गंभीर संकट बन सकता है।

उन्होंने बताया कि वर्ष 1951 से 2011 के बीच जनसंख्या वृद्धि दर में भारी अंतर के कारण देश की जनसंख्या में जहां हिन्दू धर्मावलंबियों का अनुपात 88 प्रतिशत से घटकर 83.8 प्रतिशत रह गया है। यानी पांच फीसदी आबादी घटी है।

वहीं मुस्लिम जनसंख्या का अनुपात 9.8 प्रतिशत से बढ़कर 14.23 प्रतिशत हो गया है अर्थात आबादी  में पांच फीसदी बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा देश के सीमावर्ती रायों असम, पश्चिम बंगाल और बिहार के सीमावर्ती जिलों में तो मुस्लिम जनसंख्या की वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। यह स्पष्ट रूप से बांगला देश के अनवरत घुसपैठ का संकेत देता है।

बाबासाहेब की अंतर्दृष्टि के अनुरूप हैं संघप्रमुख के विचार

सरसंघचालक जी अर्थात राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, प्रमुख मोहन रावजी भागवत के आरक्षण व्यवस्था पर पुनर्विचार की आवश्यकता व्यक्त करनें से वैचारिक तूफ़ान खड़ा हो गया है. संघप्रमुख ने आरक्षण के औचित्य पर प्रश्न कतई नहीं किया है, यह स्पष्ट है. मीडिया ने जानबूझकर उनसे बीते वर्षों में समय समय पर सार्वजनिक तौर पर उलझानें वाले आरक्षण आधारित प्रश्न सदैव किये हैं. बीते वर्षों में संघप्रमुख ने आरक्षण पर जिस प्रकार के व्यक्तव्य दिए हैं उनसे संघ का आरक्षण के प्रति तार्किक समर्थन भी प्रकट होता रहा है. हमारा समाज और नव उपजे संचार माध्यम यदि नवाचारों व प्रयोगधर्मिता पर बवाल खड़ा करनें के स्थान पर आत्मपरीक्षण व आत्मसमीक्षा का अभ्यस्त होता तो आज परिस्थितियां कुछ और होती. संविधान शिल्पी बोधिसत्व बाबासाहेब अम्बेडकर  ने भारतीय समाज की इस प्रयोगधर्मिता पर विश्वास करके ही आरक्षण का तर्क तथा समय सम्मत ढांचा खड़ा किया था. हाल के अपनें साक्षात्कार में सरसंघचालक जी नें आगे कहा कि आरक्षण का राजनैतिक उपयोग हो रहा है और अब समय आ गया है कि एक अराजनैतिक समिति का गठन किया जाए जो यह परिक्षण करे कि किसे और कितनें समय के आरक्षण की आवश्यकता है. आरक्षण नीति पर पुनर्विचार मात्र का विचार व्यक्त करनें से समाज में इतना वितंडा हो तथा इतना भय निर्मित किया जाए ऐसा हमारा भारतीय समाज कभी नहीं रहा! हमारा समाज तो सदा से प्रयोगधर्मी व नवाचारों के विकास वाला समाज रहा है. सरसंघचालक मोहन रावजी भागवत के व्यक्त विचारों का यदि किसी प्रयोगशाला में परीक्षण हो सकता है तो वह केवल बाबासाहेब की वैचारिक प्रयोगशाला ही हो सकती है. आज के समय में संघ प्रमुख द्वारा व्यक्त विचार वस्तुतः बाबा साहेब की अंतर्दृष्टि तथा उनकें मानस में चल रहे भविष्य बोध का प्रकटीकरण मात्र ही है.
       भारत की चारो दिशाओं में जन्में और आदरपूर्वक स्वीकार किये गए समाज विज्ञानी इस बात का ज्वलंत प्रतिनिधित्व करते हैं; इनमें ज्योतिबा फुले, बोधिसत्व बाबासाहेब, छत्रपति साहू जी महाराज, सावित्रीबाई फुले, श्रीनिवास पेरियार, अयोथिदास पंडितर, नारायण स्वामी आदि प्रमुख हैं. इस राष्ट्र का मुख्य हिन्दू समाज मूलतः उन्नयनोमुखी, बहिर्मुखी, प्रयोगधर्मी व समय समय पर नव-विशिष्ट विचारों का जन्मदाता समाज रहा है. तनिक कल्पना कीजिये की जब इन उपरोक्त लिखित महान संतों ने अपनें समय में अपने विचारों को समाज के सम्मुख रखा होगा तो उन्हें कितना साहस व शक्ति लगी होगी?! स्पष्टतः स्वीकार किया जाना चाहिए कि इन महान संतों व प्रयोगधर्मियों की बातों को सुननें, समझनें व परीक्षण करनें की प्रवृत्ति सदैव हमारें समाज में उपस्थित रही है. यदि हमारा भारतीय हिन्दू समाज सदा से चैतन्य, जागृत व संवेदनशील व अर्पण भाव का धनी न रहा होता तो ये संत समाज में कभी भी आदरपूर्ण स्वीकार नहीं किये गए होते. यद्दपि इनकी स्वीकार्यता के पीछे सदैव संघर्ष रहा है तथापि स्वीकार्य हो जाना हमारे तत्कालीन व वर्तमान समाज के परिपक्व, परिवर्तन व प्रयोगधर्मी रहनें का अकाट्य प्रमाण है. वस्तुतः इस देश में कांग्रेस और वामपंथियों ने स्वतंत्रता पूर्व और प्रारम्भिक स्वातंत्र्योत्तर दौर में बाबा साहेब के सामाजिक न्याय की अवधारणा को वर्ग संघर्ष का नाम देनें का जो साशय प्रयास किया वह दुष्प्रयास बाद के दशकों में देश की नसों में विष की भांति प्रवाहित हुआ. इस विष ने ही बाद के वर्षों में आरक्षण जैसे पुण्य शब्द को एक ततैया शब्द बना डाला. महाड़ आन्दोलन जैसे संघर्षों के उन दिनों में जब महात्मा गांधी देश में सर्वाधिक स्वीकार्य थे और बाबा साहेब से उनकें मतभेद सार्वजनिक थे तब डा. भीमराव आंबेडकर देश में हिंदुत्व और जातिवाद के नाम पर पनप गई सामाजिक विषमता और सामाजिक असुरक्षा के विरुद्ध संघर्ष को आगे बढाते हुए स्पष्टता से कह रहे थे कि उनका सामाजिक न्याय से आशय सामाजिक सुरक्षा, सामाजिक समानता और सामाजिक स्वतंत्रता से है और सामाजिक सुरक्षा से आशय प्राण, परिजन, आजीविका और संपत्ति की सुरक्षा से है और संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों के निष्कंटक प्रवाह से है. बाबा साहेब की बड़ी ही स्पष्ट भाषा और अभिव्यक्ति के बाद भी संकीर्ण राजनैतिक मानसिकता के चलते कांग्रेस के कई नेताओं ने उनकी भूमिका को संदिग्ध बनानें और इतर दलित समाज में उनकी स्वीकार्यता कम करनें के लिए बदनाम किया. बाबासाहेब के विरुद्ध कांग्रेस का यह जन्मजात पूर्वाग्रह व बाद के वर्षों का सत्तामोह भारत में जातिगत समीकरणों को इस कदर उलझा गया कि भारतीय समाज की राजनैतिक प्रयोगधर्मिता व आत्मपरीक्षण की प्रवृत्ति ही समाप्त होती चली गई. स्मरण रहे कि एक समय में हम हमारें इस प्रगतिशील व प्रयोगधर्मी आचरण से ही हम एक ओर सोनें की चिड़िया बनें तो दूसरी ओर विश्वगुरु भी कहलाये! इसके आगे चले तो हमारे राष्ट्र-समाज ने यह भी देखा कि जब हम नवविचार, नवआचार, नवचरित्र से तनिक दूरी बना कर परिवर्तनों को नकारनें लगे तब हम न तो सोनें की चिड़िया रहे और न ही विश्वगुरु!! अपितु हम तो पिछले कुछ दशकों में आत्मग्लानि, आत्मसंकोच, तथा आत्मविश्वास विहीन समाज के रूप में भी दिखे थे!!! निस्संदेह यह कहना होगा कि इस स्थिति की जवाबदारी केवल परिवर्तन हीनता से भरे हुए एक दौर पर ही आती है. साथ ही यह भी कहना होगा कि विश्व के साथ अपनें संवाद-संचार का मिलान गलत दृष्टियों से करनें का व पश्चिमोंन्मुखी समाज निर्माण का जो निकृष्ट कार्य पिछले दशकों के कांग्रेस काल में हुआ; वह भी इन परिस्थियों हेतु मुख्यतः जवाबदेह है.    

               हमारे समाज के समय की धुरी पर चलनें के एक बड़े उदाहरण के रूप में देखें तो उसके एक प्रतिनिधि तौर पर कोल्हापूर के छत्रपति साहूजी महाराज का समय दिखता है जब उन्होंने 1902 दक्षिणी विंध्य के प्रेसीडेंसी रियासतों में पिछड़े वर्गो हेतु आरक्षण का प्रारम्भ किया था. बड़ी ही व्यापक सोच का यह आदेश भारत में प्रथम आरक्षण केन्द्रित अधिसूचना के रूप में जाना जाता है. 1932 के ‘पूना समझौता’ की परिस्थितियों में से कांग्रेस नेतृत्व के कुछ दुराग्रहों, पूर्वाग्रहों को घटा दिया जाए तो इसे भी हम हमारें सामाजिक नवाचार का एक विशिष्ट उदाहरण कह सकतें हैं. स्वतंत्रता पश्चात मध्य का एक दौर रहा जब हमारी राजसत्ता जातिगत असंतोष तथा उनमें विभिन्न स्तर पर आती विसंगतियों को समझ पानें में असफल रही. अपनें समाज को समय के साथ चैतन्य तथा जागृत करनें के स्थान पर उसे बैसाखियों का आदती व लती बना देनें की आत्मघाती व तुष्टिकारक नीतियों का ही परिणाम रहा कि भारत को 1990 का मंडल कमंडल जैसा भयावह दावानल झेलना पड़ा. उस समय वोट केन्द्रित भारतीय सत्ताधीशों का हो न हो किन्तु भारतीय समाज ऐसा अवश्य था कि इस अनियंत्रित मंडल उलझन के बाद हमारे समाज ने जातिगत संवेदनाओं को पहचाना भी और उस अनुरूप स्वयं को ढाला भी!! बाबा साहेब अम्बेडकर ने जिस जातिगत विसंगति और असमानता के शब्द को स्वतंत्र भारत के समक्ष रखा था उस शब्द में भारतीय जनमानस ने संवेदनशीलता के साथ प्राण स्थापना की! बंधुत्व तथा समता आधारित भारतीय समाज ने जातिगत असमानताओं के अंधे कुए में से स्वप्रेरणा से स्वयं को बाहर निकाला. मध्य में एक विचार जाति मुक्त भारत का भी चला जो संभवतः समय पूर्व जन्मा विचार था और जिसके कारण अनावश्यक टकराव उत्पन्न हुए थे. इन टकरावों में हिन्दू समाज ने समय समय पर जातिगत संदर्भों में अपनें चरित्र में अपनें आपद धर्म का तथा प्रायश्चित भाव का मुखर तथा विनम्र प्रदर्शन भी किया है. अपनें संघर्ष मार्ग में बोधिसत्व बाबासाहेब नें अपनें जिस लेखन संसार के माध्यम से अपनी व्यथा, वेदना संत्रास व आशाओं को व्यक्त किया उसमें “द एनिहिलेशन आफ कास्ट” में भी उन्होंने जो विचार व्यक्त किये वे भारतीय समाज की मूल भावना व आत्मा के साथ समय आधारित परिवर्तनों के विचार थे. भारत में जातिगत परिस्थितियां केवल परिवर्तन शील नहीं रहेगी अपितु विकासशील भी रहेगी यह बाबासाहेब को विश्वास था किन्तु नेहरु के दौर में जन्मी राजनैतिक धुंध ने व बाद के दशकों में कांग्रेस के सत्ता मोह ने बाबासाहेब के इस अंतर्तत्व को कभी समझा ही नहीं. यदि समय के साथ साथ बाबासाहेब के विचारों पर नए नए प्रयोग, परीक्षण व उन पर शोध होते रहता तो हमारें देश को आरक्षण के नाम पर इतना भययुक्त वातावरण कभी न मिलता. 

Praveen Gugnani, guni.pra@gmail.com 9425002270    

Thursday, April 28, 2016

2 " रहीमन पानी राखिए बिन पानी सब सून "।


महाराष्ट्र की बात करें तो मराठवाढ़ा के सूखाग्रस्त इलाकों से किसानों एवं खेतीहर मजदूरों का पलायन शुरू हो चुका है।2016 में हर महीने करीब 90 किसानों ने आत्महत्या की।खरीफ के मौसम में पूरे महाराष्ट्र में लगभग 15750 गांव सूखे से बुरी तरह प्रभावित हैाकई तालाबों और नदियों का पानी 4% से भी कम बचा है।महाराष्ट्र लगातार चौथी बार सूखे की चपेट में है सबसे ज्यादा असर औरंगाबाद लातूर और विदर्भ में पड़ा है।लातूर में तो पानी को लेकर धारा 144 लगी है।केंद्र सरकार ने 3049 करोड़ रुपये सूखा राहत के लिए मंजूर किए हैं।

18
घंटों का सफर तय करके दस वैगन पानी से भरी ट्रेन 342 कि मी चलकर राजस्थान के कोटा से चलकर पश्चिमी महाराष्ट्र के मिराज से 2.75 लाख लीटर पानी लेकर लातूर पहुँची "पानी एक्सप्रेस" पानी लाने वाली पहली ट्रेन बनी ।इस पूरे प्रोजेक्ट में 1.84 करोड़ रुपए का खर्च आया ।इसमें कोई संशय नहीं कि लातूर को  केन्द्र सरकार के इस कदम ने बहुत राहत दी है।लेकिन समस्या को जड़ से मिटाकरउसके स्थाई समाधान में वक्त लगेगा। यह सूखा एक साल की अल्पवर्षा की देन नहीं है।लगातार चार पांच सालों के खराब मौनसून से इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न हुई है अगर समय रहते पूर्ववर्ती सरकारें ने इस विषय को गंभीरता से लेकर ठोस कदम उठाए होते तो आज लातूर ही नहीं पूरे देश में  स्थिति बेहतर होती।लातूर की बात करें तो भौगोलिक कारणों से यह इलाका अल्पवर्षा का क्षेत्र हैऔर न ही इसमें कोई नदी प्रवाहित होती है।लगातार दोहन के फलस्वरूप भू जल स्तर गिरता जा रहा है।शहर को पानी की आपूर्ति मन्जारा डैम से होती है जो कि अपनी जलापूर्ति के लिए अच्छे मौनसून पर निर्भर है किन्तु लगातार चार सालों के खराब मौनसून से लातूर का यह जलस्रोत भी सूख चुका है। 
लातूर की यह स्थिति किसी भी सरकार से छिपी नहीं थी इसलिए 1972 में जब इस क्षेत्र ने सूखे का सामना किया था तब यहाँ पर गन्ने की खेती पर रोक लगा दी गई थी।यह सर्वविदित है कि गन्ने की खेती में पानी बहुत लगता है तो तत्कालीन सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि लोगों को पीने का पानी मिलता रहे गन्ने की खेती पर रोक लगाने का कदम उठाया था।जब 2014 से लातूर सूखे की मार झेल रहा है तो इस साल फिर से गन्ना क्यों बोया गया? क्या उससे उत्पादित गुड़ शक्कर और अलकोहोल की उपयोगिता हमारे किसानों के जीवन से अधिक है?इस सब का सबसे दुखद पहलू यह है कि इस बार की गन्ने की फसल भी पानी के अभाव में बरबादी की कगार पर है और अब शायद जानवरों के चारे के काम आए।
यह जानकारी भी आपको आश्चर्य में डाल देगी कि 2005 मे"महाराष्ट्र वाटर रिसोर्स रुगुलेटरी ओथोरिटी "
का निर्माण हुआ था जो कि महाराष्ट्र में भूमिगत जल एवं नदियों के जल एवं तालाबों के जल के प्रबंधन एवं आपूर्ति के लिए बनाया गया था।अगर इस संस्था ने जल प्रबंधन की ओर थोड़ा भी ध्यान दिया होता तो खेती न सही महाराष्ट्र के गाँवों को कम से कम पीने का पानी तो उपलब्ध होता।इससे भी अधिक आश्चर्यजनक यह तथ्य है कि 2005 में बनने के बावजूद इनके बोर्ड की पहली बैठक 2013 में हुई थी वो भी बाहरी दबाव में।क्या यह संस्था 2014 में गन्ने की खेती पर रोक नहीं लगा सकती थी पानी के प्रबन्धन की दिशा में ठोस कदम समय रहते नहीं उठा सकती थी?
 
इजरायल जैसे देश ने जल संकट को विज्ञान से हरा दिया एक समय था जब इजरायल के नल सूखे थे वहाँ लोग पानी की एक एक बूँद को तरसते थे लेकिन वहाँ की सरकार की जल प्रबंधन नीतियों ने समस्या की जड़ पर प्रहार करके आज अपने देश को सम्पूर्ण विश्व के लिए एक मिसाल के रूप में पेश किया है।भले ही आज हम इजरायल की तर्ज पर समुद्री जल का विलवणीकरण करने की स्थिति में नहीं हैं लेकिन घरेलू अपशिष्ट जल को पुनः चक्रित करके कृषि के उपयोग में लेने जैसी पानी प्रबंधन की नीतियाँ अवश्य बना सकते हैं।

किन्तु हमारी विकास नीति के केंद्र में पानी  प्रबंधन न हो कर मुआवजा प्रबन्धन  है इसीलिए पी सांई नाथ को किताब लिखनी पढ़ी "एवरीबडी लव्स अ गुड डौट"(सभी को सूखे से प्रेम है) उनके अनुसार सूखा राहत भारत का सबसे बड़ा विकास उद्योग है।

क्या इस देश  में आज जो पानी की स्थिति है उसके लिए कहीं न कहीं हम सभी जिम्मेदार नहीं हैं!विकास के नाम पर जो अर्थव्यवस्था की रचना हुई उसमें हमने अपने परम्परागत जलस्रोतों जैसे तालाब बावड़ी कुंओं के विकास की न सिर्फ उपेक्षा की अपितु उन्हें खत्म कर कान्क्रीट के जंगल उगा दिए जो पानी वर्षा के दिनों में यहां इकट्ठा हो कर साल भर ठहर कर उस इलाके के भूजल स्तर को ऊपर उठाने का काम करता था उसे हमने नष्ट कर दिया।भारतीय किसान यूनियन के शिवनारायण परिहार कहते हैं कि बुन्देलखण्ड पाँच नदियों का क्षेत्र रहा है जिसे पंचनद के नाम से जाना जाता था इस क्षेत्र में कई छोटी नदियाँ और काफी संख्या में पोखर हुआ करते थे लेकिन अवैध बालू उत्खनन से छोटी नदियों का गला घोंटा गया और भू माफिया ने पोखरों को मारकर इमारतें खड़ी कर दी।पर्यावरणविदों का कहना है कि दिल्ली जैसे शहर में सैकड़ों तालाब थे जो वहाँ के भू जल स्तर को बनाए रखते थे लेकिन हमने विकास की अन्धी दौड़ में विनाश का रास्ता पकड़ लिया।भले ही हम जल संकट की सारी जिम्मेदारी कृषि क्षेत्र पर डालें लेकिन हकीकत यह है कि जल संकट गहराने में उद्योगों की अहम भूमिका है कई बार फैक्टरियाँ एक ही बार में उतना पानी खींच लेती हैं जितना पूरा गाँव एक महीने में भी नहीं खींचता।
हमारा समाज बहुत रचनात्मक समुदाय है एवं इसमें सामाजिक बदलाव लाने की अद्भुत क्षमता है हम सभी ने मिलकर बड़ी से बड़ी आपदाओं का सफलतापूर्वक सामना किया है।राजस्थान के गाँवों की सफलता की कहानी समाज की सफलता की कहानी है।आसमान से गिरने वाली बूंदों को सहेज कर धरती की गोद भरकर जिस प्रकार राजस्थान जैसे इलाके की नदियों को पुनर्जीवित किया गया वह यह बताता है कि पर्यावरण को सहेज कर, बेहतर बनाकर ही हम पर्यावरण का लुत्फ़ उठा पाएंगे।समाज में बदलाव भाषणों से नहीं जमीनी स्तर पर काम करने से आता है।।पानी से ही धरती का पेट भरता हैं जिस दिन हम उसका पेट भरने के उपाय खोज लेंगे हमारी नदियाँ हमारे खेत सब भर जाँएगे ।हम धरती को जितना देते हैं वह उसे कई गुना कर के लौटाती है इस बात को उस किसान से बेहतर कौन समझ सकता है जो कुछ बीज बोकर कई गुना फसल काटता है।जब हम धरती का ख्याल नहीं रखेंगे तो धरती हमारा ख्याल कैसे रखेगी?

@डॅा नीलम महेंद्र 

" रहीमन पानी राखिए बिन पानी सब सून "।

अगर रहीमदास के इस दोहे को हम समझ लेते जिसे हमें बचपन में पढ़ाया गया था तो आज न हमारी धरती प्यासी होती न हम ।जल हरियाली और खुशहाली दोनों लाता है। लेकिन आज हमारे देश का अधिकांश हिस्सा पिछले चालीस सालों के सबसे भयावह सूखे की चपेट में है।महाराष्ट्र का मराठवाड़ा आन्ध्र का रायलसीमा उत्तरप्रदेश का बुन्दुलखण्ड मध्यप्रदेश का टीकमगढ़ एवं शिवपुरी झारखंड ऐसे अनेकों इलाकों की धरती की सूखी मिट्टी सूखे तालाब खाली कुँए हमारे खोखले विकास की गाथा गा रहे हैं।आजादी के 70 साल बाद भी हमारे गांव ही नहीं देश की राजधानी दिल्ली तक में पेयजल की उपलब्धता एक चुनौती है।गाँवों की स्थिति तो यह है कि पहले खेत सूखे फिर पेट सूखे अब हलक सूखने लगे हैं।टीकमगढ़ में तो पानी की सुरक्षा के लिए बाकायदा बंदूकधारी तैनात किए गए हैं
इस महीने की 12 ता० को जब दस वैगनों से भरी पानी की ट्रेन लातूर पहुँची तो स्थानीय लोगों के चेहरे उनके सूखे गलों की दास्ताँ बयाँ कर रहे थे।गांव के बुजुर्गों का पटरियों पर रात की शांति में  जाग कर पानी के आने का इंतजार उनके खाली बर्तनों का शोर सुना रहा था।पानी से भरे डब्बों को देखकर स्त्रियों की आँखों में आने वाला पानी उनके सूखे हलक की प्यास की कहानी सुना रहा था।अभी इस पानी के इस्तेमाल के लिए उन्हें और इंतजार करना था लेकिन पानी को मात्र देख कर उनके चेहरों की खुशी क्या हमें कुछ समझा नहीं रही? हम ऐसे क्यों सोचते हैं कि आज हमारे नलों में पानी आ रहा है तो कल भी आयेगा?क्या हमने पानी के प्रबंधन की दिशा में कोई कदम उठाया है यदि नहीं तो हमारे नल हमेशा यूँ ही हमें पानी परोसते रहेंगे ऐसा हम कैसे सोच सकते हैं?
वातानुकूलित कमरों में बैठकर मिनरल वाटर से अपनी प्यास बुझाने वाले क्या इस सच्चाई से वाकिफ हैं कि गाँव में लोगों का पूरा दिन पानी की व्यवस्था करने में निकलता है महिलाएं आधी रात से जाग कर पानी भरने में लग जाती हैं ताकि दिन की धूप में नहीं जाना पड़े ! सुधा (परिवर्तित नाम) उम्र 22 वर्ष, दो बार गर्भपात हो चुका है डाक्टर ने भारी वजन उठाने से मना किया है लेकिन पानी भरने लगभग चार किलोमीटर की दूरी तय करती है!

क्रमशः