Saturday, March 6, 2010
आदिवासी महारैली...२७ फ़रवरी २०१०
शहीद गुन्दाधुर के नेतृत्व में 1910 में संचालित भूमकाल आन्दोलन को आज 100 वरसे पूरे हो चूके है भूमकाल की याद में द्न्दकरान्य शेत्र में हर जगह भूमकाल का शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है ……आज भूमकाल आन्दोलन के ठीक 100 वरसे बाद भी सामाजिक आर्थिक व राजनैतिक स्तिथि में कोई परिवा रतन nahi दिखाई पड़ता है । कई सत्ता परिवर्तन हुए …पर आज भी आदिवासियों की स्तिथि वहीँ की वहीँ है । आज छात्तिश्गढ़ में आदिवासी अस्मिता का मुद्दा एक बार फिर गर्माने लगा है ….27 फ़रवरी की विशाल महारैली इस बात को इंगित करती है की आदिवासी अस्मिता से जुड़े मुद्दों को किस प्रकार दूर जा रहा है .
Saturday, November 15, 2008
Thursday, November 13, 2008
गोंडी धर्मं के जन्मदाता पारी कुपार लिंगो.
गोंडी धर्मं की स्थापना पारी कुपार लिंगो ने शम्भूशेक के युग में की थी। गोंडी धर्मं कथाकारों के अनुसार शम्भूशेक अर्थात महादेवजी का युग देश में आर्यों के आगमन से पहले हुआ था। इस काल से ही कोया पुनेम धर्मं का प्रचार हुआ था। गोंडी बोली में कोया का अर्थ ''मानव'' तथा पुनेम का अर्थ ''धर्मं'' अर्थात ''मानव धर्मं''। आज से हजारों वर्ष पूर्व से गोंड जनजातियों द्वारा ''मानव धर्मं '' का पालन किया जा रहा है। अर्थात गोंडी संस्कृति में '' वसुधैव कुटुम्बकम'' की भावना समायी हुई है।
गोंडी मान्याताएँ विज्ञानं पर आधारित.
भारतीय समाज के निर्माण में गोंड संस्कृति का बहुत बड़ा योगदान रहा है। गोंडी संस्कृति की नींव पर भारतीय संस्कृति खड़ी है। गोंडवाना भूभाग में निवासरत गोंड जनजाति की अदभुत चेतना उनकी सामाजिक प्रथाओं , मनोवृत्तियों, भावनाओं आचरणों तथा भौतिक पदार्थों को आत्मसात करने की कला का परिचायक है, जो विज्ञानं पर आधारित है। समस्त गोंड समुदाय को पहांदी कुपार लिंगो ने कोया पुनेम के मध्यम से एक सूत्र में बंधने का काम किया। धनिकसर (धन्वन्तरी ) नामक गोंड विद्वान् ने रसायन विज्ञान अवं वनस्पति विज्ञान का तथा हीरा सुका ने सात सुरों का परिचय कराया था।
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