Saturday, February 7, 2015

Saturday, August 16, 2014

नक्सलबाड़ी से घर की बाड़ी तक का सफ़र आखिर कब थमेगा .

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् द्वारा दिनांक 11 व् 12 अगस्त 2014 को भोपाल में दो  दिवसीय  नक्सलवाद विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसमे इससे सम्बंधित सारे विषयों पर दो दिनों तक विषय विशेषज्ञों की उपस्थिति में विचार विमर्श किया गया.
इस कार्यशाला के प्रथम सत्र में छात्तिश्गढ़ के बाल न्यायलय के अध्यक्ष न्यायधीश श्री के.के. अग्रवाल जी के मुख्या आतिथ्य में सम्पन्न हुआ. उन्होंने नक्सलवाद के गढ़ के रूप में देश में स्थापित बस्तर से ही अपनी बात की शुरुआत की, उन्होंने बताया की 50 के दशक में बस्तर में पूरी तरह शांति स्थापित थी जो की 1973- 74 तक रही परन्तु इसके बाद नक्सलवाद पनपना शुरू हुआ इसका सबसे बड़ा कारण गरीबी और अशिक्षा है  और इसी वजह से बस्तर के आदिवासी आज भी ठगे जा रहे हैं. बस्तर में आम, इमली व् अमचूर के बदले नमक लेने का प्रचलन सदियों से बदस्तूर जारी है.

इस सत्र में विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित श्री रविरंजन सेन जो की विद्यर्थी परिषद् से सन 1991 से संपर्करत है. उन्होंने नक्सलवाद के एतिहासिक परिदृश्य पर चर्च में बताया कि भारत में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया का गठन 1925 में हुआ. सन 1966 से 1976 तक चीन में सांस्कृतिक क्रांति हुई जिसमे तक़रीबन 30 लाख लोग मरे गए थे. सन 1967 में ही भारत के ही नक्सलबाड़ी नामक स्थान में पहली घटना घटी. जिसमे प्रमुख रूप से लापा किसन, सांगू किसन तथा 150  कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थक लोग शामिल थे. इस घटना से नक्सलबाड़ी में तकरीबन 52 दिन उथल-पुथल रहा. जो की भारत में नक्सलवाद की पहली दस्तक थी.

भारत में नक्सलवादी आन्दोलन के प्रमुख नेता के रूप में श्री कानू सान्याल, चारू मजुमदार तथा जंगल संथाल पूर्ण रूप से उभर चुके थे, जिसमे से कनु सान्याल का दायित्व संगठन को सम्हालने का था, वहीँ जंगल संथाल ने इस आन्दोलन में ज्यादा-से-ज्यादा आदिवासियों को जोड़ने में महती भूमिका निभाई. नक्सलवाद से जुड़े हुए नेताओं ने भारत में चर्चा-परिचर्चा हेतु युगास्ता क्लब की स्थापना किये. जिसमे महात्मा गाँधी, रजा राममोहन राय तथा जवाहर लाल नेहरु के विचारों पर बाकायदा बहस किया जाता था. इस आन्दोलन के प्रमुख नेता श्री चारू मजुमदार वर्ग संघर्ष में विश्वास करते थे , उनका मानना था कि- “ जिस व्यक्ति में वर्ग शत्रु के खून में अपना हाथ नहीं डुबोया हो वो कम्युनिस्ट नहीं हो सकता है.” इसी कारण वे इस आन्दोलन में आदिम हथियार जैसे – तीर कमान, टंगिया जैसे हथियारों के प्रयोग के पक्षधर थे. All India Coordination Committee of Communist Revolutionaries द्वारा 22 अप्रैल सन 1969 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) नाम के एक दल का गठन हुआ जिसका उद्देश्य भारत को तोडना था. जिसमे “चीन का अध्यक्ष, हमारा अध्यक्ष” तथा “चीन का पथ हमारा पथ” का नारा दिया गया. इसी कड़ी में आंध्रप्रदेश में ग़दर के नेतृत्व में जन नाट्य मण्डली का गठन , 1985 में दिल्ली में जन नाट्य मंचका गठन तथा  9 अगस्त 1990 में AISA का गठन किया गया. सन 2001 में दक्षिण एशिया के माओवादी संगठनो के द्वारा दक्षिण एशिया में माओवादी गतिविधियों के सञ्चालन हेतु  Coordination Committee of Maoist Parties and Organizations of South Asia (CCOMPOSA)   की स्थापना की गई. इसके स्थापना के पश्चात मई 2010 में पश्चिम बंगाल के ज्ञानेश्वरी में एक घटना को अंजाम दिया गया. वर्ष 2011 में पश्चिम बंगाल में किशंजीत की हत्या की गई. इस घटना के तुरंत बाद ही इस आन्दोलन के प्रमुख नेता कनु सान्याल के द्वारा वर्ष 2012 में उत्तरबंग में आत्महत्या की जानकारी मिलती है. इसी कड़ी में मई 2013 छात्तिश्गढ़ के कई बड़े कांग्रेस नेताओं पर हमला किया गया जिसमे विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा तथा नन्द कुमार पटेल शामिल थे. 21 मार्च 2014 को आँध्रप्रदेश में PWG व MCC (माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर) को मिलकर CPI (माओवादी ) का गठन किया गया. अभी हाल ही में नक्सली दम्पति सव्यसाची पंडा की गिरफ़्तारी इसकी एक कड़ी के रूप में शामिल है. इस तरह इसके गठन के बाद से अब तक नक्सलवादी आन्दोलन में  आम आदिवासी, पुलिस कर्मचारी सहित कई लोगों सहीद हो चुके हैं, कई लोग अनाथ हो चुके है, बेघर हो चुके है. पता नहीं इस दंश से आम आदमी कब तक इसे ही मारा जाता रहेगा, अगर समय रहते इस इससें नहीं निपट पाए तो हम आनेवाली पढ़ी को क्या जवाब देंगे.

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् नेपाल के राष्ट्रीय संगठन सचिव श्री दीपल अधिकारी जी नक्सलवाद के दर्शन पर प्रकाश डालते हुए बताया की पुरे विश्व में दो प्रकार के दर्शन हैं – 1. सर्वहारा दर्शन तथा 2. पूंजीपति दर्शन . उनके अनुसार कम्युनिस्ट विचारधारा एक विस्तारवादी विचारधारा के रूप में स्थापित है जो कि तकरीबन 62 बार विखंडित हो चूका है तथा 28 बार स्थापित हुआ है. उन्होंने बताया की कोई भी विचारधारा साहित्य, मीडिया व साहित्य से ही संपन्न होता है, और इस कम्युनिस्ट पार्टी के विस्तार का आधार ही यही है अतः हमें इसके विस्तार को ख़त्म करने की रणनीति पर काम करना होगा तभी हम इसे समूल नष्ट कर पाएंगे.इस कार्यशाला में विशेष रूप से उपस्थित छात्तिश्गढ़ के आई. जी. श्री दीपांशु काबरा ने नक्सलवाद संगठन के संगठनात्मक ढांचे पर विस्तृत जानकरी दिए. उनके अनुसार इस संगठन में सेंट्रल कमेटी के अंतर्गत पोलित ब्यूरो व् सेंट्रल मिलिट्री कमीशन कार्य करी है जिसमे से पोलित ब्यूरो  के अधीन ररीजनल ब्यूरो, स्पेसल जोनल कमिटी, सब जोनल कमिटी, डिवीज़न कमिटी, एरिया कमिटी या टाउन कमिटी, LOS, रेवोल्यूशनरी पीपुल काउंसिल जिसमे मास ओर्गानिज़ेसन, पार्टी सेल, तथा ग्राम रक्षा दल जैसे संगठन ARD/GRD/Raksha शामिल हैं.


इसी तरह सेंट्रल मिलिट्री काउंसिल CMC के अंतर्गत सेंट्रल टेक्निकल कमिटी, रीजिनल मिलिट्री कमिटी, स्टेट मिलिट्री कमीशन- जिसके अंतर्गत नार्थ यूनिफाइड कमांड, साऊथ यूनिफाईड कमांड व वेस्ट यूनिफाईड कमांड, बटालियन, डिविज़नल कमांड, कम्पनी, प्लाटून, जन मिलिसिया शामिल हैं. इस तरह नक्सल संगठन इस समय कार्यरत हैं. अगर बस्तर की बात करें तो इस समय 2 बटालियन व 14 कम्पनी दंडकारन्य क्षेत्र में कार्यरत है. इसी तरह इस क्षेत्र में ग्राम पार्टी कमिटी व रेवोलुश्नरी पीपल कौसिल के रूप में जनताना सरकार कार्यरत है जिसके तीन रूप पार्टी सेल, रक्षा सेल व अग्र संगठन है. दंडकारन्य स्पेशल जोनल कमिटी तीन क्षेत्रों में कार्यरत है जिसमे से दक्षिण यूनिफायड कमांड देवजी के नियंत्रण में है, उत्तर यूनिफाइड कमांड का नेतृत्व कोसा के हाथ में है. हिडमा इस कमिटी के प्रमुख साथी हैं. जो सम्मिलित रूप से इस क्षेत्र को अपने नियंत्रण में रखे हुए हैं. और इस क्षेत्र में प्रमुख कार्यवाहियों को अंजाम देते हैं.
नक्सलवाद के शहरी परिदृश्य पर बात करने के लिए विषय विशेषज्ञ के रूप में वरिष्ठ पत्रकार श्री रमेश नैय्यर जी उपस्थित थे. उन्होंने पत्रकारिता के अपने अब तक के अनुभवों को साझा करते हुए बताया की वर्ष 1949 में दक्षिण बस्तर में बहुत से लोग आकर बसे थे जो शायद वहां की जनजातीय संस्कृति के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हुई. उस समय बस्तर में शक्ति के तीन प्रमुख केंद्र थे – प्रथम माई दंतेश्वरी, दूसरे बस्तर के महाराजा प्रवीर चन्द्र भंजदेव तथा तीसरी वहां जनजातियों के मध्य प्रचलित घोटुल प्रथा थी. ये तीनो केंद्र जनजातीय समाज को आपस में जोड़े रखा था जो इनके आस्था के सर्वोच्च प्रतीक थे. 25 मार्च 1966 में इन प्रतीकों में से एक प्रतीक महाराजा प्रवीर चन्द्र भंजदेव की षड़यंत्र पूर्वक गोलीबारी में हत्या की गई. श्री गनपत लाल साव जो कि महाराजा के सचिव थे उनके अनुसार ब्रिटिशर्स के द्वारा सन 1910 में बस्तर में अपनी शिक्षा व्यवस्था कायम करने कोशिश किये जिसका बस्तर में पुरजोर विरोध हुआ. उसी समय बस्तर की क्रांति के रूप में विख्यात भूमकाल आन्दोलन का भी जिक्र आता है, जो कहीं न कहीं इस विद्रोह की कड़ी से जुड़ता है. इसी बीच कम्युनिस्ट नेता कोंडापल्ली सीतारामैय्या के द्वारा बस्तर में मलेरिया से पीड़ित आदिवासियों को मलेरिया की गोली बाँटने का जिक्र आता है, जो सरकार की पहुँच से दूर बस्तर क्षेत्र के विकास के लिए तालाब का निर्माण करवाकर वहां के आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने का पहला प्रयास के रूप में देखा जा सकता है.
बस्तर क्षेत्र के तमाम समस्याओं पर अगर गौर करें तो हम यह पाते है कि शिक्षा व् स्वास्थ्य की पहुँच से दूर बस्तर के पिचादने के तीन बड़े कारण – पुलिस, व्यापारी व् प्रशासन है. क्योंकि पुलिस व् प्रशासन के बारे में यह प्रचलन है की वे जनजातीय समाज के लोगों के घरों से डरा धमकाकर मुर्गा और दारु की मांग की जाती थी नहीं देने का खामियाज़ा भी भुगतना पड़ता था, वहीँ व्यापारी नमक के बदले वहां के आदिवासियों का जल जंगल जमीन तक हड़प लेते थे. शायद यही कारण था कि बस्तर जैसे मनोरम, शांति के टापू पर नक्सलवाद दस्तक देता नज़र आ रहा था. अगर बस्तर आज थोडा बहुत बचा है तो सरदार वल्लभ भाई पटेल की वजह से ही बचा है जो कि बस्तर स्टेट को भारत के 537 रियासत में शामिल करने में सफल रहे, अन्यथा बस्तर की बैलाडीला पहाड़ी को हैदराबाद के निज़ाम ने खरीद लिया था जिसे कोरिया के राजा के हस्तक्षेप पर ही भंजदेव ने बस्तर को बचाया था जिसका प्रमाण हिंदी ग्रन्थ अकादमी में मौजूद हैं.
आज बस्तर खून की होली खेल रहा ही कल तक शांति के टापू के रूप में स्थापित बस्तर में आज गोली की आवाजें गूंजने लगी है. भारत में नक्सलवाद का खत्म बस्तर के नक्सलवाद के खात्मे पर ही टिका है. नक्सलवाद विषय पर बोलते हुए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के जनजातीय छात्र कार्य प्रमुख श्री प्रफुल्ल आकांत ने कहा कि इस समय नक्सलवाद की कहर से देश के 16 प्रान्तों के लगभग 20 जिलों के 1400 गाव जूझ रहे हैं. उड़ीसा के कंधमाल में स्वामी लक्ष्मानंद के सामाजिक अन्दिलन की वजह से तथा राजनंदगांव के मोहला-मानपुर क्षेत्र में सामाजिक अलख जगाने में भूमिका निभाने वाले लाल श्याम शाह की वजह से इस क्षेत्र में नक्सलवाद नहीं पनप पाया जिन्होंने इन क्षेत्रों में व्यसन मुक्ति के आन्दोलन चलाये तथा शिक्षा के कई केंद्र स्थापित किये. इसी तरह जशपुर के कैलास गुफा व बागीचा के क्षेत्रों में गहिरा गुरु का योगदान महत्वपूर्ण है जिन्होंने इस क्षेत्र में शिक्षा का अलख जगाया. वर्ष 1952 में जशपुर में वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा व सामाजिक उत्थान हेतु कार्य करने के उद्देश्य से की गई थी जो की निरंतर अभी भी जारी है. वर्ष 1966 में बस्तर के महाराजा प्रवीर चन्द्रभंजदेव की हत्या के लगभग 12 वर्ष बाद 1980 तक नक्सलवाद का कोई नामोनिशान नहीं था. उसके बाद नारायणपुर व ओरछा वर्ष 1991-92 में पहली बार ग्राम जागरण अभियान चलाया गया. 2003 में गीदम का थाना लुटा गया, युम्नर का बाजार लुटा गया जिसमे पुलिस ने 13 ग्रामीणों को जेल में दाल दिया और उन्हें उनके पास पाए गए सामान की पावती दिखाने को कहा गया और ऐसा प्रचारित किया गया की यह बाज़ार जनजाति समाज ने लुटा है. इस घटना से जनजाति समाज आहात हुआ और सामाजिक कार्यकर्ता सुखदेव तांती के नेतृत्व में लगभग 500 लोगों के साथ इन्द्रावती नदी के उस पार नक्सलियों से उनके केम्पों में मिलने पहुंचे और नक्सलियों को उसके दूसरे दिन यह बताना पड़ा कि इस घटना में जनजाति समाज का कोई हाथ नहीं है. इसके बाद लगभग 100 गांवों में ग्राम सुरक्षा समिति बनाई गई जिसने नक्सलियों को गोवों से बहार का रास्ता दिखाया गया. 19 मई 2005 में बस्तर के ग्रामीणों के द्वारा इस समस्या से निपटने के लिए चल रही बैठक में नक्सलियों के द्वारा 19 लोगों की हत्या की गई इसी तरह 22 मई 2005 को 5000 ग्रामीणों की बैठक के दौरान भी हत्या के प्रयास नक्सलियों के द्वारा किया गया जिसमे ग्रामीणों के द्वारा संयुक्त रूप से तय किया गया की नक्सलवाद का मुकाबला हम “सलवा जुडूम” से करेंगे, जो की देश में इस तरह का पहला प्रयास था.


सलवा जुडूम इस प्रयास से काफी संख्या में लोग जुड़ने लगे कुटरू, ताडमेटला व भैरमगढ़ से हजारों की संख्या में जनजाति समाज जुड़ने लगे. सलवा जुडूम के इस प्रयास से नक्सली बेचैन हो उठे और सलवा जुडूम के कार्यकर्ताओं पर हमले करना शुरू किये. सरकार ने जनजातियों की सुरक्षा के लिए इन क्षेत्रों में 24 केम्पों का निर्माण कराया  जिसमे 80-100 गांवों से लगभग 52000 लोग रहने आने लगे PSO व कोया कमांडो की दहसत भी लोगों में बढने लगी, नक्सलियों का नेटवर्क ध्वस्त हो गया  इससे समर्थित संगठन हैरान हुए और इसके खिलाफ सडयन्त्र कर सुप्रीम कोर्ट में 19 याचिकाएं लगाई गई.  वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने बगैर तहकीकात के सलवा जुडून के विरोध में एक फैसला दिया यह फैसला PUCL से प्रशिक्षित सुदर्शन रेड्डी के द्वारा PSO को निरस्त करने का का आदेश था. इस निर्णय से नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विपरीत माहौल बना जो की निरासजनक था. ऐसे माहौल के बाद आज भी सुखदेव तांती जैसे लोग भटके लोगों को समाज को जोड़ने का प्रयास कर रहे है.
झारखण्ड के परिदृश्य में देखें तो यहाँ का सेन्द्रा आन्दोलन जिसके अंतर्गत गुमला क्षेत्र में यह प्रचलन था की शादी के बाद पति पत्नी को जंगल में पशु का शिकार करने का प्रशिक्षण दिया जाता था यह प्रचलित हुआ जिसमे 13 प्रमुख नेताओं को मारा गया जिसे सरकार ने संरक्षण नहीं दिया, ये शहीद हुए पर बन्दुक नहीं उठाई. उड़ीसा के मलकानगिरी, कोरापुट में 12000 लोग मारे गये जिसमे 8000 लोग जनजातीय समाज से थे. इस तरह नक्सलवाद के कारण वहां  के ग्रामीणों का वहां रहना दूभर हो गया है, ऐसे में छात्तिश्गढ़ सरकार द्वारा नक्सली प्रभावित बच्चों के लिए 9वीं से 12वी तक के बच्चों के लिए शिक्षा की गई जिसमे से 7 बच्चे IIT के लिए पास होते है वहीँ अबूझमाड़ क्षेत्र में सुखराम बोरसा( MBBS) जनजातीय क्षेत्रो में विकास के लक्ष्य को ध्यान में रखकर मेडिकल केम्प लगाने के लिए संघर्ष करता है जिससे उस क्षेत्र में विकास कायम हो सके. और जनजातीय क्षेत्रों में शांति की स्थापना हो सके.

इस कार्यशाला में राजनंदगांव जिले मदनवाडा क्षेत्र के निवासी श्री भगत झाडे आमंत्रित थे जो की पूर्व में नक्सली संगठन में डिवीज़नल कमेटी सदस्य रह चुके हैं उन्होंने बताया कि मदनवाडा क्षेत्र में नक्सलियों का दखल 2004 में शुरू हुआ जिस समय वे 10वी कक्षा में पढ़ रहे थे नक्सलियों ने सभी युवाओं को जोड़ने की बात कहते हुए बताया कि आज़ादी के बाद से अब तक इस क्षेत्र में किसी ने ध्यान नहीं दिया इसलिए सभी पड़े लिखे युवा साथियों से नक्सलियों ने आह्वान किया कि अगर क्षेत्र का विकास चाहिए तो हमसे जुड़िये क्योंकि 2010 तक हमारी सरकार बन जाएगी इससे प्रभावित होकर मई 2004 में इस संगठन में शामिल हुआ और 2007  से 2014 तक नक्सली दलम में सदस्य के रूप में काम किया. इसी वर्ष ओटेकसा में 24 गांववालों के सामने 4 लोगों की डंडे से मार-मारकर हत्या कर दी गई. हम लोग भी नक्सली संगठन में नक्सलियों के डर से ही शामिल हुए थे क्योंकि उस समय वहां तक प्रशासन नहीं पहुंचा था. गावों में शासन की पहुँच ना होने के कारन नक्सली गांवों में जनअदालत लगते थे जिसमे लड़की व् लड़के को ही बुलाते थे और वे बुजुर्गों व् ठाकुरों के खिलाफ भड़काते थे. हमारे क्षेत्र में वर्ष 2007-08 में बड़ी भरी संख्या में लगभग 100 लोग नक्सली संगठन में भर्ती हुए, जिसमे से छात्तिश्गढ़ के लोगों को छोटे-मोटे कामों में ही उपयोग करते थे बाकी आँध्रप्रदेश व् उड़ीसा के लोग ही इसमें प्रमुख पदों पर थे. बाद में शासन के योजनाओं को सुकर व् देखकर हम वापिस आकर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किये. इस तरह हम कह सकते है की नक्सली संगठन में छात्तिश्गढ़ के लोगों को डरा धमकाकर सामिल किया जाता है.तथा साथ ही 5वीं कक्षा में इस संगठन से जुड़ी श्रीमती वनोजा झाडे नेभी अपना अनुभव बताया जो की कि जो कि पूर्व में इसी संगठन के चेतना नाटक मंच में शामिल थी.
भोपाल में अवैध हथियार फैक्ट्री को पकड़वाने में प्रमुक भूमिका निभाने वाली महिला पुलिस अधिकारी  श्रीमती अनुराधा शंकर सिंह (IPS) ने नक्सलवाद विषय पर बोलते हुए कहा कि चुनौती नक्सलवाद की नहीं बल्कि माओवाद की है जिसके इस समय नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी व भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी नाम के दो धड़े कार्यरत है. उन्होंने इस विषय पर बात करते हुए बताया की पार्टी की लिटिल रेड बुक में अंतर्राष्ट्रीयता के नाम से क्रांति करने की अपील की थी. जिसके परिणाम स्वरूप भारत में छात्तिश्गढ़. महाराष्ट्र, उड़ीसा, झारखण्ड व पश्चिम बंगाल में युद्ध हो रही है. माओवाद के अनुसार राज्य उनका शस्त्रागार(QUARTER MASTER) है इसी कारण हम देखते हैं कि, माओवादी अपने शस्त्र की पूर्ति राज्यों के पुलिस थानों को लूटकर Reverse इंजीनिरिंग के माध्यम से ठीक कर उपयोग में लाते है.

श्रीमती अनुराधा शंकर ने बताया कि माओ एक ऐसे क्रांतिकारी नेता थे जो कभी किसी से नहीं मिलते थे फिर भी कानु सान्याल व् चारू मजुमदार से मिलकर उन्हें भारत में वामपंथी के दूत निरुपित किया. उन्होंने बताया कि वामपंथी Cultural Revolution के माध्यम से अपने विचारधारा को प्रतिपादित करते हैं जिनका प्रचार तंत्र बहुत सघन फैला हुआ है जिसके लिए वे World to Win नमक पत्रिका भी निकलते हैं तथा इसी कड़ी में भारत में 2001 में कोआर्डिनेशन कमिटी ऑफ़ माविस्ट पार्टी एंड ओर्गनाइज़ेसन ऑफ़ साउथ एशिया(COMPOSA) नमक संगठन स्थापित हुआ. जिसके सहयोग से 2004 में PWG का गठन हुआ जिसमे बांग्लादेश, भूटान, भारत, नेपाल व बर्मा सदस्य देश के रूप में शामिल हैं जो जन संघर्ष में विश्वास करती है फिलीपिंस में तो 1940 से माओवाद का संघर्ष जरी है. वर्ष 2002 में MLM की स्थापना हुई जिसके प्रेरक के रूप में गोंज़ालो प्रतिष्ठित हुए. 2006 में भारतीय माओवादी संगठन का सहयोग करने से नेपाल ने मन कर दिया जिसके कारण का. गणपति, का. किसनजीत ने इस्लामिक आतंकवादियों से सहयोग के लिए संपर्क स्थापित किए व 2007 से 2010 तक इस्लामिक संघर्ष से सम्बंधित संयुक्त बयांन दिए गए. वर्ष 2006 के बाद से बांग्लादेश से भी हथियार आने शुरू हो गए. श्रीमती अनुराधा ने बताया कि अंतराष्ट्रीय माओवाद संगठन का पंचम सम्मेलन 2011 में झारखण्ड के सरंडा के जंगलों में संपन्न हुआ जिसमे बांग्लादेश, भूटान व श्रीलंका के लोग शामिल हुए तथा इन सभी देशों में एक संगठन बनाने की रणनीति बनी. उनके अनुसार भारत में माओवाद को ULFA का अच्छा सहयोग मिल रहा है, इस्लामाबाद में इस्लामिक आतंकवाद पर संघर्ष जारी है. इस तरह उन्होंने नक्सलवाद के अन्तराष्ट्रीय संबंधों पर प्रकाश डाला. इसी सत्र में इस विषय पर बोलते हुए जी. लक्षमण ने इस समस्या को Socio Economic व Low n Order से उत्पन्न समस्या बताया जिसका उद्देश्य गन के माध्यम से सत्ता में आना है जिसके लिए 2004 के बाद से इस समय तक लगभग 40 संगठन कार्य कर रहे है.  जिसमे की 2004 से अब तक विभिन्न मुठभेड़ों में 2,237 सिविलियन तथा 1200 माविस्ट मरे गए हैं. इस तरह नक्सलवादियों का संगठन देश में कार्य करता है उनका उद्देश्य Kill 1 Terror 100 की विचारधारा पर कार्य करती है और लोगों में भय उत्पन्न कर लगभग 12 से 14 प्रतिशत तक की लेवी मध्यप्रदेश व् छात्तिश्गढ़ से वसूलती है, गाँव के किसानो को एक एकड़ में गांजा की खेती उगाने के लिए दबाव डालती है. इस तरह हम कह सकते है की यह विचारधारा लोगों में निरंतर भय उत्पन्न किये हुए हैं जिसे समूल नष्ट किया जाना समय की मांग है.
कार्यक्रम के अंतिम उद्बोधन में विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री सुनील अम्बेकर् जी ने कहा की नक्सलवाद में से नक्सल को सरकार समाप्त करेगी तथा वाद को समाप्त करने ठेका समाज को लेना होगा. उन्होंने इसे आगे बढ़ाते हुए यह कहा की बन्दूक की क्रांति थोड़े समय के लिए होती है क्षणभंगुर होती है अगर क्रांति करनी है तो विचारों की क्रांति होनी चाहिए और येही विचारों की क्रांति ही इस समय बदलाव ला सकती है इसके लिए हमें विद्यर्थियों को हर तरह के वाद के लिए Offence is Best Defence की रणनीति के तहत आगे बदना होगा. उन्होंने कहा की इस समय सारी दुनिया में 600 करोड़ लोग निवास करते हैं तो अकेले भारत में 100 करोड़ लोग निवास करते हैं अतः भारत को अपना विकास Modernity with Eternal Charector के तहत करना चाहिए. तभी भारत का सही मायनों में विकास होगा. 

Thursday, July 31, 2014

सत्ता की बागडोर बहुसंख्‍यक अश्वेतों के हाथों में होना चाहिए- मंडेला

दक्षिण अफ्रीका के नेता नेल्‍सन मंडेला का आज ९६ वां जन्‍मदिन है। मंडेला को बचपन में प्यार से मदिबा पुकारा जाता था और आधुनिक दक्षिण अफ्रीका का पितामह भी कहा जाता है।  मंडेला का पूरा नाम नेल्सन रोहिल्हाला मंडेला है। यह नाम उनके पिता ने उन्हें दिया था रोहिल्हाला का अर्थ होता है पेड़ की डालियों को तोड़ने वाला या प्यारा शैतान बच्चा। नेल्सन के पिता गेडला हेनरी गांव के प्रधान थे। नेल्सन के परिवार का संबंध शाही परिवार से था। नेल्सन की मां एक मेथडिस्ट ईसाई थीं। नेल्सन ने क्लार्क बेरी मिशनरी स्कूल से अपनी आरंभिक पढ़ाई की थी। छात्र जीवन में ही उन्हें रंगभेद नीति का सामना करना पड़ा। स्कूल में उन्हें याद दिलाया जाता कि उनका रंग काला है। अगर वे सीना तानकर चलेंगे तो उन्हें जेल तक जाना पड़ सकता है। इस रंगभेद नीति के चलते उनमें एक क्रांतिकारी का जन्म हो रहा था। नेल्सन ने हेल्डटाउन से अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई की। यह अश्वेतों के लिए बनाया गया एक स्पेशल कॉलेज था। यहीं पर उनकी मुलाकात ऑलिवर टाम्बो से हुई जो उनके जीवनभर दोस्त और सहयोगी रहे। उन्होंने अफ्रीका की यूनिवर्सिटी ऑफ फोर्ट हेयर के अलावा, लंदन की यूनिवर्सिटी एक्सटर्नल सिस्टम, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ अफ्रीका और यूनिवर्सिटी ऑफ विटवाटरर्सरैंड में पढ़ाई की। पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला का जन्म १८  जुलाई १९१८  को केप प्रांत के मवेजो गांव में हुआ। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद नीति की नीति के खिलाफ और अफ्रीका के लोगों के स्वराज्य के लिए लड़ाई लड़ी। इसके लिए उन्हें २७  वर्ष रॉबेन द्वीप की जेल में बिताने पड़े।

वर्ष 1940 तक नेल्सन और ऑलिवर अपने राजनीतिक विचारों के कारण कॉलेज में काफी चर्चित हो गए। इस गतिविधि के कारण दोनों को कॉलेज से बाहर कर दिया गया। इसके बाद वे घर लौट आए। घरवाले उनकी शादी की तैयारी करने लगे, लेकिन नेल्सन के मन तो विद्रोह चल रहा था, मंडेला ने अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस यूथ लीग की स्थापना की और अफ्रीका के अश्वेत युवाओं को एक नेतृत्वकर्ता दिया। जब पूरे विश्व पर गांधीजी का प्रभाव था, नेल्सन पर भी उनका प्रभाव पड़ा। अश्वेतों को उनका अधिकार दिलाने के लिए १९९१  में कनवेंशन फॉर ए डेमोक्रेटिक साउथ अफ्रीका (कोडसा) का गठन किया जो देश में शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन करने की अगुवा बनी। श्वेत नेता डी क्लार्क और मंडला ने इस काम में अपनी समान भागीदारी निभाई। १० मई १९९४ को दक्षिण अफ्रीका में रंगभेदरहित चुनाव हुए। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले गोरों को समझाया कि वे देश में अल्पसंख्‍यक हैं इसलिए सत्ता की बागडोर बहुसंख्‍यक अश्वेतों के हाथों में होना चाहिए। उनकी श्वेतों के साथ बातचीत ने सत्ता के हस्तांतरण का मार्ग प्रशस्त किया और इसके लिए अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस को तैयार किया।

दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति का खात्मा करने वाले नेल्सन मंडेला का अपने देश में महत्वपूर्ण  स्थान है। उन्होंने लगभग एक रक्तहीन क्रांति कर अफ्रीकी लोगों को उनका हक दिलाया और इस परिवर्तन के दौरान हिंसा नहीं हुई क्योंकि वे बातचीत से समस्याएं हल करने में विश्वास करते थे। उन्होंने श्वेत राष्ट्रपति एफ. डब्ल्यू डी क्लार्क से सत्ता संभाली थी और देश का राष्ट्रपति बना रहने के बाद इसे अपने साथी थाबो एमबेकी को सौंप दी। एमबेकी के बाद से सत्ता पर जैकब जुमा हैं जोकि वर्तमान में देश के राष्ट्रपति हैं। इस महान नेता को १९९० में भारत रत्‍न और १९९३  में नोबेल शांति पुरस्‍कार से नवाजा गया था। नेल्‍सन मंडेला को मंडेला ने रंगभेद की नीति के खिलाफ डटकर जंग लड़ी और वे देश के पहले ब्‍लैक राष्‍ट्रपति बने। नेल्‍सन मंडेला को दक्षिण अफ्रीकी लोकतंत्र का जनक कहा जाता है। वर्ष १९९३  में नेल्सन मंडेला और डी क्लार्क को संयुक्त रूप से शांति के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया। तथा वर्ष १९९० में भारत सरकार की ओर से उन्हें भारत रत्न पुरस्कार दिया गया। नेल्सन मंडेला का पिछले साल लंबी बीमारी के बाद ६  दिसंबर २०१३  को ९५  साल की उम्र में निधन हो गया था। 

मोहला मानपुर क्षेत्र में चल सम्वेदना शिविर के दौरान जनजातीय संस्कृति से साक्षात्कार

५ मई २०१४ को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् छात्तिश्गढ़ प्रदेश के २५ छात्र कर्यकर्ताओं के द्वारा मोहला मानपुर क्षेत्र के ग्राम कौडिकसा से प्रातः ६.०० बजे  माँ शीतला माता मंदिर (मंदर ) के प्रांगण से माँ के जयकारे के साथ  तीन दिवसीय चल संवेदना शिविर का शुभारम्भ माननीय श्री दीपक विस्पुते, प्रान्त प्रचारक छात्तिश्गढ़ प्रान्त के मार्गदर्शी उद्बोधन से संपन्न हुआ . इस पावं मौके पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के जनजातीय छात्र कार्य प्रमुख श्री प्रफुल्ल आकांत जी, श्री  टेकेश्वर जैन  प्रान्त संगठन मंत्री अभाविप विशेष रूप से उपस्थित थे. इस चल संवेदना शिविर में प्रदेश के अलग अलग हिस्सों से प्रमुख छात्र कार्यकर्ता शामिल हुए थे.

 चल संवेदना शिविर का उद्देश्य छात्तिश्गढ़ के ग्रामीण व् विभिन्न जनजातीय संस्कृति से साक्षातकार करना था जिससे हम ग्रामीण जनजातीय अर्थव्यवस्था, जनजातीय संस्कृति , जनजातीय रीती रिवाज, जनजातीय जीवन शैली को जनजातीय समाज के बीच में जाकर देख सकें व महसूस कर सकें.

             इस तीन दिवसीय (५, ६ व् ७ मई) शिविर में हम सभी को बड़ा ही अद्भुत अनुभव हुआ . हमारी इस शिविर की शुरुआत ग्राम कौड़ीकसा से शुरू होकर  ग्राम छोटे कलकसा , ग्राम बड़े कलकसा , बोइर् डीह  बांध से होते हुए ग्राम हितकसा  पहुंचे जहाँ वहां के श्री तुमन कोरेती व अन्य  ग्रामीणों ने हल्दी चावल से हम सभी पदयात्रियों का स्वागत किया . हितकसा में भोजन व् ग्रामीणों से थोड़े चर्चा के बाद हमारा दल ग्राम बोडाल माईस के दुर्गम रास्तों से होते हुए तकरीबन शाम ७ बजे  ग्राम कोलाटोला पहुंचे जहाँ पर श्री विनोद मंडावी व उनके ग्रामीण साथियों ने  गोंडी रीती से गोंडी स्वागत गीत गाकर हम सभी का स्वागत सत्कार किया तथा वह रात्रि भोजन के पश्चात् वहां  के ग्रामीण नागरिकों से सार्थक चर्चा  हुई, वहां रात्रि विश्राम के बाद हमारा यह शिविर प्रातः ६ बजे हमारा यह दल पगडंडियों के रास्ते गोंडी हूल्की गीत गाते अगले पड़ाव की ओर निकल पड़ा. घने जंगलों, पर्वत पहाड़ों के बीच से होते हुए हम सभी तपती दोपहरी में बगैर नौतापे के एहसास के एक छोटे से गाँव मदिंग पिडिंग पहुंचे जहाँ हम सभी लोगों ने स्वयं भोजन भोजन बनाया तथा वहां के ग्रामीण साथियों के साथ बैठकर भोजन व वहां के सामाजिक आर्थिक, व् सांस्कृतिक गतिविधियों के बारे में चर्चा किये यहाँ की खास बात महिलावों की उपस्थिति रही. इस तरह हम वहां से तकरीबन ४.०० बजे अपना समान समेटकर ग्रामीणों से मिलते जुलते उनकी समस्याओं के बारे में थोड़े चर्च करते हुए हमारा यह दल शाम ७.३० बजे ग्राम देवरसुर पहुंचा वहां के ग्रामीणों ने भी हमें सम्मान पूर्वक भोजन प्रदान किये तत्पश्चात वहां के ग्रामीणों के साथ वहां ग्राम में शादी ब्याह जैसे कार्यक्रम होने के बावजूद हमारे साथ चर्चा में भाग लिए . रात्रि में सुखद विश्राम का हम सभी ने लाभ लिया सबसे बड़ी बात यह रही की तकरीबन ४७ किलोमीटर पैदल चलने के बाद भी किसी भी तरह का शिकन चेहरे पर दिखाई नहीं दे रहा था.
           इस तरह हमारा पड़ाव आगे की ओर बढ़ता ही जा रहा था , लोगो में उत्साह था , एक जोश था नदी के सामान निरंतर बहते जाने का एक एहसास था जो नदी,घाटी,पर्वत, पहाड़ के रास्ते जाने के  बाद भी  लोगों में उत्साह का संचार कर रहा था. अभी हमारा दल फिर से ग्राम देवर सुर से तला भात का का आनंद लेकर फिर से अगले पडाव कुदुम, भालापुर होते हुए लोगों से संवाद करते हुए ग्राम चापाटोला तकरीबन १२.०० बजे  हम सभी पहुंचे  जहाँ श्री रोहन कुंजम , श्री पंचम सिंह परतेती जी ने हम सभी साथियों का स्वागत किया तथा सभी साथियों  के  स्नान के पश्चात् ग्रामीण लोगों के साथ भोजन कर एक औपचारिक संवाद की शैली में त्क्रीबंम ५०- ६०  ग्रामीण लोगों की उपस्थिति  में हमारे इस चल संवेदना शिविर का समापन हुआ जिसमे आदरणीय श्री मेहतुराम नेताम , श्री प्रफुल्ल आकांत व् श्री टेकेश्वर जैन के उद्बोधन के साथ संपन्न हुआ. इसके पश्चात् हम सभी लोग अपने अपने केंद्र की ओर प्रस्थान किये. इस तरह हमारा यह शिविर ३ दिनों में तकरीबन ६० किलोमीटर की दुरी पैदल १७ -१८ गावों से होते हुए लोगों से तमाम विषयों पर संवाद करते हुए पुरे किये जिसका अनुभव बहुत ही रोचक रहा. हमने इन तीन दिनों में मोहला-मानपुर क्षेत्र को जानने व् समझने का भरपूर प्रयास  किया.