Monday, February 26, 2018

जनजाति आस्था, परंपरा एवं संस्कृति

जनजाति आस्था, परंपरा एवं संस्कृति 
भारतीय सनातन संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति है। अध्यात्मिक सौंदर्य, श्रेष्ठ मानवीय गुणों की श्रेष्ठता तथा शाश्वत नैतिक मूल्य के कारण भारतीय सनातन संस्कृति में  प्रकृति के भांति समन्वय की अद्भुत क्षमता है। भारत माता के देश में अनेक विदेशी आक्रमणकारी आये तथा देश में अपना राजनैतिक प्रभुत्व भी स्थापित कर लिया, यहां तक की भारतीयों को बलात अन्य धर्मों को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया गया ऐसे संकट काल में भी भारतीय संस्कृति में आत्म दीपों भवः की भावना जनतातियों में बनी रही।  भारतीय जनजाति सनातन संस्कृति विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति है। देव संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि इसमें ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः‘‘ की भावना निहित है। जो मनुष्य तक ही सीमित न होकर समस्त प्राणी जगत के लिए स्वीकार की है। इसी कारण भारत माता देश में प्रकृति पुजारियों ने नदी, नाले, तालाबों, झरनों, पर्वतों, शिखरों, गुफा, कंदराओं, लता, बेल, वृक्ष, पशु-पक्षी में भी देवशक्तियों को अवतरित कर उनके प्रति आदर भाव प्रदर्शित किया है। ऐसे उदार भाव संसार के अन्य किसी संस्कृति में नहीं पायी जाती। प्रकृति पूजा की परम्परा आदि काल से ही संचालित परिचालित है प्रकृति एवं मानव का सहजात संबंध रहा है। मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक तथा मानवीय सामाजिक व्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए प्रकृति सदा से ही सहयोगी रही है। भारतीय आदि संस्कृति इसी भावना से अनुप्रेरित रही है। यही कारण है प्रकृति पुजारी देव कबीलों में प्रकृति सबके लिए है, बिना भेदभाव के है, प्रकृति के नियम लुप्त गुप्त है, उसी पर आधारित इनका जन्म से लेकर मृत्योपरांत तक जीवन है। इसलिए सर्व धर्म सम्मान के अनुकूल है। जीवन चक्र स्वार्थी नहीं परमार्थी और परिश्रमी है प्रकृति ही उनका गुरू है और ग्रंथ है। इसी कारण भारत देश को विश्व गुरू कहा गया है। अतः किसी केा भी लूट-पाट, छीना छपटी, छल-कपट, करने की कभी आवश्यकता ही नहीं पड़ी। समस्त छोटे छोट मानव समूहों के अपने समूह, समुदायों के कठोर नियमों से बंधे सब कुछ व्यवस्थित, शांतिपूर्ण जीवन जीते हुए, देश को संपन्नता की उंचाइयों तक ले जा सके और देश को सोने की चिडि़या कहलवा सके। पशुपालन से देश में दूघ की नदियां बहा दीं, और सृष्टि प्रकृति के गूढ़तम रहस्यों को आत्मज्ञान में जागृत कर अघ्यात्म गुरू का स्थान भारत को दिलाया तब यहां मानव-मानव में कोई उंच नीच, अमीर गरीव, का भेद नहीं था। कबीलों के सरदार ही अपने अधिकृत भूभाग के राजा थे। प्रजा के अंदर नाम मात्र का राज्य भार होता था। स्वतंत्रता पूर्वक अपने कार्यों को संपन्न कराने में दक्ष थे। पूरा अखण्ड भारत देश के एक सूत्र में संगठित था। उसने कभी भी कल्पना भी नहीं कि थी कि हमारी सम्पन्नता व सुख शांति, अमन चैन की जीवन शैली में बाहरी आक्रमणकारियांे का इस तरह हस्तक्षेप होगो कि तिनका तिनका बिखर जावेगा। वर्तमान में भारत की आबादी 1 अरब, 21 करोड़, 5 लाख, 69 हजार 5 सौ 73 है जिसमंे 4693 समुदाय, 4500 सजातीय समुह, 325 बोलियंा व 25 लिपिया हैं। तथा मानव प्रजातियां 4 तरह की हैं- 1. भारतीय यूरोपीय 2. द्रविड़ 3. तिब्बती वर्मी 4. आस्ट्रो एसियाई है। वैज्ञानिकों की यह रिपोर्ट है कि आधुनिक मानव आज से करीब 1,50,000 वर्ष पहले पूर्वी आफ्रिका में हुए और वहां से प्रथम फैलाव भारत में हुआ। दुनियां की सभी प्रारंभिक ज्ञात मानव अनवांशिक शाखाएं भारत में पाइ जाती है। भारत , आफ्रिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा जीन भंडार वाला देश है और यहीं से अनुवांशिक बीज पूरी दुनिया में फैला। ऋगवेद प्रथम साहित्य स्रोत है जिसमें हमे उन लोगों के बारे में पता चलता है कि जो ई.पू. 1500 के लगभग भारत आकर बसे थे यह ीवह समय था जब भारत देश पर विदेशी आक्रमणकारी पार्शिया के लोग आक्रमण किये। लगभग 8वीं शताब्दीं में अरब मुसलमानों द्वारा भारत पर आक्रमण किया गया और पर्शिया आक्रमण से  टूटे बिखरे भारतियों को मुटठी भर सैनिको के सहारे पूरे भारत को अपने आधिपत्य मेें कर लिया। इन्होने बलात धर्म परिवर्तन कर मुसलमानों की संख्या बढ़ाई तथा प्राचीन भारत के देवी देवताओं को खंडित किया, स्थानों के नाम मुस्लिम धर्म अनुसार कर डाला। हिंदु मुस्लिम और जनजातियांे के फूट का लाभ लेते हुए 17वीं शताब्दी में अंग्रेजों ने तीसरे विदेशी आक्रमणकारियों के रूप् में भारत पर आक्रमण कर अपना आधिपत्य जमा लिया। और भारत का अधिक मात्रा में धर्म परिवर्तन कर देश का नाम इंडिया रख डाला। पार्शिया के आक्रमण के बाद विरोध स्वरूप् दो धर्मांे का उदय हुआ। प्रथम बौद्व धर्म दूसरा जैन धर्म तथा हिंदू, मुस्लिम इसाई तीनों धर्मों के विरोध स्वरूप् सिक्ख धर्म का उदय हुआ।
धर्म क्या है .....................
धर्म वह धारक तत्व है जो समस्त विश्व का प्राण व परिचालित करने बाली शक्ति है। जो संपूर्ण विश्व को धारण कर रही है। और वस्तुओं का मूल आधार है, एवं समाज की एकता को मूर्तिमान करने वाली है। नियम पालन, आज्ञापालन व कर्म कर्तव्य पालन धर्म है। 
ऑक्सफोर्ड डिक्सनरी के अनुसार-  व्यक्ति एक एैसी उच्चतर अदृश्य शक्ति पर विश्वास करती है जो उसके कर्तव्य पर नियंत्रण करती है और जा उसकी आज्ञाकारिता , शील सम्मान तथा अराधना का विशय है।
अंग्रेजी में धर्म को रिलीजन कहा जाता है, जो कि लेटिन भाषा के शबद त्मसपंहमत  से बना है, जिसका अर्थ होता है बांधना या जोड़ना, यदि इस व्युत्पत्ति के आधार पर रिलीजन को समझाा जाये तो वह एक ऐसी वस्तु है जो अराध्य तथा अराधक, उपास्य तथा उपासक व्यक्ति तथा समाज को बांधती है। मूलरूप् से धर्म का यही स्वरूप रहा है। भारतीय दृष्टि से भी धर्म का यही स्वरूप् माना गया है। उदाहरणपार्थ-- महाभारत में  धर्म की व्युत्पत्ति धृ धारण करना नामक धातु से संबद्व है। अतः धर्म का अर्थ हुआ वह वस्तु जो समस्त विश्व को धारण कर रही है। अर्थात जो समस्त वस्तुओं का मूल आधार है और समाज की एकता को मूर्तिमान करती है। 
शक्ति विधान के अनुसार समूचे सृष्टि ब्रम्हाण्ड में चौबिसों धण्डे दो प्राकार की शक्ति धाराओ का निरंतर प्रवाह बना रहाता है। ऋणात्मक और धनात्मक या रक्ष और भक्ष या सल्ला -गागरा जैसे नामों से लोग पुकारते हैं। इन शक्ति धाराओं को क्षेत्र भाषा, बोली, अनुसार जो भी नाम से पुकारे जीव से निर्जीव तक सूक्ष्म से स्थूल तक, देव से दानव तक, समूचे ब्रम्हाण्ड में इनहीं के कारण गति और हलचल बनी रहती है। जन्म मृत्यु, उत्पत्ति, पुर्नउतपत्ति, सुख-दुख, भूख-तृप्ति जैसी परस्पर विरोधाभाषी इसी कारण बनते हैं। सुख शांति समृद्वि बनाने वाली, रक्षा सुरक्षा करने वाली, उत्पत्ति, पुर्नउत्पत्ति जनम पुर्नज्न्म देने वाली संसार को बनाये रखने वाली पावन पवित्र शकितयों को पूजयनीय माना गया अैर इन्ही शक्तियों की पूजा को शक्ति पूजा के नाम से जाना गया। इन शक्तियों को जिन्होने जैसा समझा जाना वैसा माना और उसे अपनाया। आदिकाल से मानव की अबतक शक्ति स्थल की पहचान बनी हुई है जिसमें- 1. घर देवालय या कुल देवालय 2. गौशाला देवालय 3. खेत देवालय 4. खलिहान देवालय 5. ग्रामदेवी देवालय 6. गढ़ गढ़ी देवालय 6. मंदिर, मस्जित, गिरजाघर, गुरूद्वारे , मठ-मढि़या 7. सिद्ध पीठ, सिद्ध स्थल, तीर्थ स्थल आदि पवित्र कहे गये हैं।    
        जनजातियां विश्व के लगभग सभी भागों में पायी जाती है, भारत में जनजातियों की संख्या आफ्रीका के बाद दूसरे स्थान पर है। प्राचीन महाकाव्य साहित्य में भारत में निवासरत विभिन्न जनजातियों जैसे भारत, भील, कोल, किरात, किननर, कीरी, मत्स्य व निषाद आदि का वर्णन मिलता है। प्रत्येक जनताति की अपनी स्वयं की प्रशासन प्रणाली थी, व उनके मध्य सत्ता का विकेन्द्रीकरण था। परंपरागत जनजाति संस्थाएं वैधानिक, न्यायिक तथा कार्यपालिक शक्तियों से निहित थी। बिहार के सिंहभूम में मानिकी व मुण्डा तथा संथाल परगना में मांझी व परगनैत की प्रणालियां पारंपरिक संस्थाओं के कुछ उदाहरण है जिनका संचालन जनजातीय मुखियाओं के द्वारा किया जाता था। जो कि अपने-अपने जनजातीयों की सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक मामलों पर विशिष्ट प्रभाव रखते हैं।
जनजातीय के उद्भव के संदर्भ में भारत में जनजाति कई जिलों से मिलकर बनी एक उच्चतम राजनैतिक इकाई थी जो कि कबीलों के रूप में संयोजित थी। जिसके अधिकार क्षेत्र में एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र था और अपने लोगों के उपर प्रभावी नियंत्रण रखता था। किसी विशेष जनजाति का निश्चित भू-अधिकार क्षेत्र का नामकरण उस जनजाति के उपर हुआ करता था। एैसा विश्वास किया जाता है कि भारत देश का नाम शक्तिशाली भारत जनजाति के नाम से हुआ है। इसी प्रकार मत्स्य गणराज्य जो कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी में अस्तित्व में था उसका उद्भव मत्स्य जनजाति से हुआ माना जाता है। राजस्थान और मध्यप्रदेश में निवासरत मीणा जनजाति मत्स्य जनजाति के ही वंसज है। मीणाओं का विश्वास है कि इस संसार का मूल मत्स्य यानि मीन अर्थात मछली से जुड़ा हुआ है। मीणा लोग मत्स्यावतार को भगवान के अवतार के रूप् में पूजते हैं। राजस्थान के दौस जिले में मत्स्यावतार का बहुत बड़ा मंदिर भी है। भारत में आज भी कई एैसे क्षेत्र हैं जिसका नाम वहां के जनजाति के नाम पर है जैसे. मिजोरम - मिजो, नागालैण्ड- नागा, त्रिपुरा-त्रिपुरी, संथाल परगना- संथाल, हिमाचल प्रदेश का लाहोल, स्वाग्ला व किन्नौर वहां के लाहोला, स्वांगला व किन्नौरा जनजाति के नाम के आधार पर पड़ा।
परंतु आठवीं शताब्दी में मुगलों के आक्रमण के कारण छोटा नागपुर व अन्य क्षेत्रों के उराव, मुण्डा व हो जनजातियों तथा पश्चिम भारत के भाील जनजाति बड़ी मात्रा में आतंक के शिकार हुए। मध्यभारत के जबलपुर के पास गड़हा नामक गोंडवाना राज्य में लगभग 200 बर्षो तक शाासन करने वाले गोंड राजा दलपत शाह, रधुनाथ शाह का मुगलों के साथ लंबे संमय तक संधंर्ष हुआ आैंार अंतत्ः अठारवीं शताब्दी में गांेड राज्य का अंत हो गया।  मुगलों ने जब दक्षिण भारत की ओर आक्रमण किया तब उन्होंने उत्तर पश्चिम भारत के उद्यमी जनजाति बंजारों के पशुओं को अपने रसद के परिवहन के लिए उपयोग में लाने के लिए बाध्य किया गया। इस प्रकार जनजातियों की क्षीण होती शक्ति का फायदा उठाकर मुगलों ने बड़ी मात्रा में जनतातियों को इस्लाम धर्म में परिवर्तित किया। व्रिटिश शासनकाल में ब्रिटिशर्स ने बीहड़ जनजातीय क्षेत्रों में आक्रमण न कर पाने के कारण उन क्षेत्रों मंे मिशनरियों के द्वारा सास्कृतिक आक्रमण किया गया और जनजातीय क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में धर्म परिवर्तन किया गया जिसका खामियाजा हमें आज भी चुका रहे हैं।  
सन् 1941 में भारत में जनजातियों की कुल जनसंख्या 2 करोड़ 47 लाख क लगभग थी। आज वर्तमान में 2011 के संेसस के रजिस्टार जनरल ऑफ इंडिया के रिपोर्ट के आधार पर भारत की कुल जनसंख्या 1 अरब, 21 करोड़, 5 लाख, 69 हजार 5 सौ 73 है जिनमे से  जनजातियों की जनसंख्या 10 करोड़ 42 लाख, 81 हजार 34 है जो भारत की कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत है। भारत की जनजातियों के संदर्भ में विशेष बात यह है कि यहां पर भील जनजातियां सर्वाधिक है जिनकी कुल जनसंख्या 1 करोड़ 26 लाख, 89 हजार, 9 सौ 52 है, दूसरे स्थान पर गोंड जनजाति है जिसकी कुल जनसंख्या 1 करोड़ 5 लाख, 89 हजार, 4 सौ 22 है। तीसरे स्थान पर संथाल जनजाति का है जिसकी संख्या 58 लाख, 38 हजार 16 है वही चतुर्थ स्थान पर मीणा जनजाति है जिनकी संख्या 38 लाख 2 है।
भारत में 50 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या जिलों की बात करें तो वे कुल 90 जिले है जिनमें से छत्तीसगढ़ में 7 जनजाति जिले, मध्यप्रदेश में 6 जिले , ओडिसा में 8 जिले, झारखण्ड में 5 जिले तथा गुजरात में 5 जिले है वहीं भारत में 25 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक की जनसंख्या वाले जिले 62 है।  

प््रादेश प््रादेश की कुल जनसंख्या प््र.ादेश की कुल जनजातियों की जनसंख्या प््रादेश की जनजातियों का प्रतिशत प््रादेश के जनतातियों का साक्षरता का प्रतिशत देश की जनसंख्या का जनजाति प्रतिशत
छत्तीसगढ़ 2,55,45,199 78,22,902 30.62 प्रतिशत 59.1 प्रतिशत 7.50 प्रतिशत
मघ्यप्रदेश 7,26,26,809 1,53,16,784 21.09 प्रतिशत 50.6 प्रतिशत 14.69 प्रतिशत
महाराष्ट 11,23,74,333 1,05,10,213 10.08 प्रतिशत 65.7 प्रतिशत 9.35 प्रतिशत
आध्रप्रदेश 8,45,80,777 59,18,073 49.2 प्रतिशत
झारखण्ड 3,29,88,134 86,45,042 8.29 प्रतिशत 57.1 प्रतिशत 26.21 प्रतिशत
प्श्चिम बंगाल 9,12,76,115 52,96,953 57.9 प्रतिशत
गुजरात 6,04,39,692 89,17,174 8.55 प्रतिशत 62.5 प्रतिशत 14.75 प्रतिशत

भारत के जनजातियों के लिए शिक्षा एक केन्द्र बिंदु है जिस पर उनका विकास निर्भर करता है शिक्षा से ज्ञान का प्रसार होता है। ज्ञान आंतरिक बल देता है जो कि जनजातियों को शोषण व गरीबी से मुक्ति पाने के लिए बहुत ही आवश्यक है। वर्तमान समय में जनजातियों के शोषण व दयनीय स्थिति के लिए मुख्य रूप् से शिक्षा ही जिम्मेदार है। निरक्षरता से उत्पन्न अज्ञानता के कारण जनजाति लोग नयी आर्थिक सुअवसरों का लाभ नहीं उठा पाये। जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है, जिसके अंतर्गत आर्थिक एवं राजनीतिक क्षेंत्रों में विकास के साथ ही विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में नये प्रवर्तनों के बारे में समुदाय को सूचित करता है। इस कारण शिक्षा जनजातियों के अत्यंत आवश्यक है।
      जनजातियों के लिए शिक्षा की महत्ता को समझते हुए संविधान निर्माताओं ने संविधान के अनुच्छेद 15 (4) एवं 46 में अनुसूचित जनजातियों में शिक्षा के प्रसार के लिए विशेश प्रावधान किये गये है। अनुच्छेद 15( 4 )के अनुसार राज्य सरकार को किसी भी सामाजिक अथवा शैक्षणिक रूप् से पिछड़े वर्ग के नागरिकों के प्रगति के लिए अथवा अनुसूचित जाति जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान बनाने का अधिकार प्रदान करता है। संविधान के अनुच्छेद 46 में सामाज के कमजोर बर्गो विशेषकर अनुसुचित जाति जनजााति को विशेष रूप से ध्यान में रखकर शैक्षणिक एवं आर्थिक लाभ पहुंचान का दिशा निर्देश राज्य सरकार को दिये है। परंतु रजिस्टार जनरल ऑफ इंडिया के द्वारा जारी किया गया है चौकाने वाले हैं कक्षा पहली से 12वीं तक सिर्फ 13.9 प्रतिशत जनजाति ही पहुंच पाता है। वहीं भारत की पहली से 10वीं तक के जनजातीय बालकों का डॉपआउट रेट 70.6 प्रतिशत है तथा बालिकाओं का 71.3 प्रतिशत है। जो कि चिंताजनक है। इसी तरह छत्तीसगढ़ के संदर्भ में महत्वपूर्ण सांख्यिकी निम्नानुसार है-
   शिक्षा राज्य एव ंकेन्द्र दोनो का विशय है तथा शिक्षा के प्रसार का मूल दायित्व राज्य सरकार को सौपा गया है। केन्द्र सरकार उच्च शिक्षा, अनुसंधान, वैज्ञानिक एवं तकनीकि शिक्षा के क्षेत्रे में सुविधाओं के समन्वय तथा मानक निर्धारण के लिए उत्तरदायी है। केन्द्र सरकार का मु,ख्य प्रयास अनुसूचित जनजातियों को मैटिक उपरांत छात्रवृति दिलवाना, बालक, बालिका छात्रवासों की स्थापना करवाना और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोचिंग केन्द्र का प्रबंध करवाना होता है कल्याण मंत्रालय द्वारा इस कार्यक्रम के लिए विषेश केन्द्रीय सहायता प्रदान करती है। शिक्षा मंत्रालय/एच आर डी द्वारा दी गई कुछ प्रमुख सुविधाओं के सभी केन्द्रीय विश्वविद्यालयों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानो, क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेजों, मेडिकल कॉलेजों और केन्द्री विद्यालयों में 71/2 प्रतिशत जनजातियों के लिए तथा 15 प्रतिशत अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था प्रदान करती है। हालाकि पिछले वर्षों में जनजातियों की साक्षरता में वृद्धि हुई है लेकिन फिर भी हर साक्षरता के उस सामान्य स्तर तक नहीं पहुंच पाये है। रजिस्टार जनरल आफ इंडिया द्वारा जारी पिछले कुछ वर्षों के साक्षरता दर पर ध्यान दे तो पायेंगें कि-

वर्ष   सभी सामाजिक समूह का प्रतिशत  अनुसूचित जनजातियों का प्रतिशत
1961 28.3 प्रतिशत                           8.53 प्रतिशत
1971 34.45 प्रतिशत                           11.30 प्रतिशत 
1981 43.57 प्रतिशत                           16.35 प्रतिशत
1991 52.21 प्रतिशत                           29.60 प्रतिशत 
2001 64.84 प्रतिशत                           47.10 प्रतिशत
2011 72.99 प्रतिशत                           58.96 प्रतिशत


पारंपरिक लोककलाओं, लोकनृत्यो व लोकगीतों के विकास तथा संवर्धन हेतु हमारे विभिन्न विष्वविद्यालयों द्वारा संचालित पाठ्यक्रमों में स्थान देने की जरूरत है, तथा विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी गोंडी, हल्बी, भतरी जैसी बोलियों को संरक्षित करने के आदिवासी भाषा व लोककला संस्थान स्थापित करने के प्रयास किये जाने की आवष्यकता है, क्योकि ये आदिवासी बोलियां, ये लोककलाएं, ये नृत्य, ये चित्रकला तथा मूर्तिकला हजारों वर्षों के अनुभवों को अपने में संचित तथा समाहित किये हुये हैं। सरकार द्वारा  आदिवासी लोककला संग्राहलयों, सांस्कृतिक केन्द्रों, लोकसंगीत नाटक अकादमी तथा लोककला वीथिका की स्थापना किये जाने की आवष्यकता है, जिससे लोगों में इन विलुप्त हो रही लोककलाओं के प्रति जागरूकता पैदा हो सके तथा साथ-साथ इसका भी ख्याल रखा जाना आवश्यक है कि बड़ी तेजी से उभरते महानगरीय संस्कृति की चकाचौंध का प्रभाव इन लोककलाओं पर न पडे । लोककलाओं को आज व्यवसाय का माध्यम बनाने हेतु भी आवष्यक कदम उठाने की जरूरत है जिससे इन विधाओं से जुड़े लोककलाकारों को आजीविका के साधन उपलब्ध हो सकेंगे तभी देश का सही मायने में विकास हो पायेगा। 
                                                                                                              
वर्ण प्रथा के साथ साथ जीवन में चार आश्रम का भी प्रचलन था। जीवन के वे चार आश्रम थे- ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम। प्रथम आश्रम में लोग 25 वर्ष तक गुरूकुल में रहकर ज्ञान प्राप्त करते थे तथा ब्रम्हचर्य का पालन करते थे। जीवन का दूसरा चरण गृहस्थाश्रम माना जाता था। तृतीय खण्ड वानप्रस्थ आश्रम था जो 50 वर्ष के पश्चात प्रारंभ होता था तथा 75 वर्ष तक वानप्रस्थ आश्रम के पश्चात 75 से 100 वर्ष या जीवन में अंतिम बिंदु तक सन्यास आश्रम का होता था। इस तरह हजारों की संख्या में नागरिक अपने नगर, बस्ती के आसपास के वनों में बने आश्रम में रहने लगते थे। इन वानप्रस्तियों के अलावा मुनि गण भी हजारांे की संख्या में बनों में आश्रम बाना कर रहते थे। नैमिषारण्य में लगभग 80000 ऋषि मुनि आश्रम बनाकर रहते थे। आदिवासी, गिरिवासी, गिरिजन और वनवासी पर्यायवाची शब्द है। राजा महाराजा इनका पूर्ण सम्मान करते थे। क्योंकि महाराजा इनका पूर्व सम्मान करते थे। क्योंकि बनवासी उत्सवों के अवसर पर राजा महाराजाओं तथा आयुर्वेदाचार्य को वनोपज, शहद, जड़ी बूटि तथा कीमती काष्ट भेंट करते थे। व्यापारी एवं कलाकार उनसे बनोपज के अलावा प्शुचर्म, सींग, हड्डी, काष्ट, पत्थर कोड़ी मनके आदि खरीदते थे। इस प्रकार प्राचीनकाल में राजकीय संबंध आदिवासियों के साथ सौहार्द्र पूर्ण एवं व्यापारिक थे। जनजाति समुदाय भगवान शिव एवं माता पार्वती का कई रूपाांें में पूजा करते हैं । शिव को बड़ा देव, बूढ़ादेव महादेव आदि के रूप् में तथा माता पार्वती को दंतेश्वरी के रूप् में अराध्य देव मानकर पूजा करते हें। छत्तीसगढ़ में नैमिषारण्य की भांति विशल सुरक्षित आश्रमों का  एक वलयक्षेंत्र तुरतुरिया वाल्मीकि आश्रम, शिवरीनारायण आश्रम, आरंग, राजिम, सिहावा, नगरी, कांकेर क्षेत्र में स्थापित था। महर्षि अगस्त्य, अंगिरा, मुचकुन्द, लोमश, विभाण्डक, ऋष्यश्रृंग, शरभंग, भृगु, कंक एवं गौतम ऋषियों के आश्रम बने थे जो दण्डकवन या दण्डकारण्य के नाम से प्रसिद्ध था।दक्षिणापथ का यह भी एक मार्ग माना जाता था, जिसके द्वारा भगवान श्रीराम ने अयोध्या से रामेश्वरम तक की निष्कंटक यात्रा की । महाभारत काल में भी आदिवासी-वनवासी-गिरिजनों ने पाण्डवों एवं भगवान कृष्ण को पूर्ण सहयोग दिया। महाभारत के रचयिता व्यास जी वनवासी मत्स्य आखेटक की पुत्री सत्यवती की संतान थे। महाबली भीम ने आदिवासी कन्या हिडिम्बा से विवाह किया जिससे घटोत्कच नामक महाबली पुत्र हुआ तथा घटोत्कच से बर्बरीक हुआ। बर्बरीक अपने पिता से भी बलवान था तथा वह कमजोर वर्ग की सहायता करने के लिए तत्पर रहता था। अर्जुन ने भी नागवंशी जनजाति कन्या उलूपी से विवाह किया। जरातकरू नामक ब्राह्मण ऋषि ने भी नागवंशी कन्या से विवाह किया जिससे आस्तिक नामक परम विद्वान पुत्र पैदा हुआ। 
छत्तीसगढ़ के दक्षिण में विशाल भुभाग में फैले आदिवासी बहुल बस्तर अंचल देवी-देवताओं की ही पुण्यभूमि है । यहां हर गांव के अपने देवी-देवता हैं। हर गांव में देवगुढ़ी है।। ये देवी देवता और देवगुड़ी बस्तर के गांवों में धार्मिक आस्थाओं के केन्द्र माने जाते हैं। बस्तर के ग्राम्य देवी देवताआंे के नाम इस प्रकार हैं---
1. टेकनार ग्राम - परदेसीन माता, हिरमा देवी
2. मटेनार  - ममेेरिया माता
3. वेंगलूर ग्राम - पाटका देवी, शीतला देवी
4. मसेनार - पीलादाई
5. तुमनार - शीतलादेवी
6. गीदम - शीतलादेवी
7. भेलबोड़ा - गंगनादेवी
8. फरसपाल - कलेपालिनमाता
9. चित्तालूर -हिंगलाजिन माता
10. समलूर - कोला कामिनी माता
11. कलेपाल - बूढ़ी माता

इन हजारों ग्राम की हजारों नाम की अलग अलग देवियां है दंतेश्वरी माता की पर्व उत्सव में पूजा-अर्चना में इन देवियों को भी आमंत्रण रहता है। बस्तर के दंतेवाड़ में शांखिनी और डंकिनी नदियों के संगम पर माई दंतेश्वरी का भव्य ऐतिहासिक मंदिर है ये दोनो ंही नदियां बस्तर की जीवनरेखा इंद्रावती की सहायक हैं। लोहे के पहाड़ बैलाडीला नामक पहाड़ी से डंकिनी निकली है। एक पौराणिक कथा के अनुसार दक्ष यज्ञ में भगवान शंकर का अपमान देखकर सती को इतना गहरा आघात लगा कि उन्होने अपनी योगशक्ति से अग्नि उत्पन्न किया और अपना प्राण त्याग दिया। यज्ञ में हुए अपमान और सती के वियोग में शकर जी विक्षिप्त से हो गये और सती के शरीर को लेकर पागलों की तरह पृथ्वी के चक्कर काटने लगे। उनकी एैसी हालत देखकर देवताओं को चिंता हुई ओर इन सबने भगवान विष्णु से कोइ उपाय करने का आग्रह किया। इस पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र चलाकर सती के निर्जीव शरीर के 52 खण्ड कर दिये। ये खण्ड जहां जहां गिरे वहां शक्तिपीठ स्थापित हो गये। शंखिनी ओर डंकिनी के संगम में सती के दांत गिरे थं और वहां माई दंतेश्वरी नामक शक्तिपीठ की स्थापना हुई । शिव और सती के युग सतयुग से माई दंतेश्वरी की सिद्ध पीठ के रूप्  में स्थापना, राम सीता युग के त्रेता युग का दण्डकारण्य, राधाकृष्ण युग द्वापर का वाणासुर का बारसूर जहां 2-2 शिवलिंग, 2-2 विशाल आकृति वाले गणेश मूर्तियांे की स्थापना और वर्तमान युग कलियुग में बस्तर के इतिहास में नल, गंग, नाग और चालुक्य काकतीय राजवंशों का उल्लेख मिलता है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में चारों युगों की दैवी संस्कृति से सरोबार है। 
वनवासी मान्यता के अनुसार व पौराणिक कथा के अनुसार  भगवान परशुराम और श्री गणेश के बीच बस्तर क्षेत्र मं द्वंद युद्ध हुआ था युद्ध में अपने फरसे से गणेश जी के एक दांत को काट दिया था। फलस्वरूप् वे एकदंत कहलाए। इसी कारण पहाड़ी के नीचे के क्षेत्र का नाम ‘फरसपाल‘ पड़ा। इसी फरसपाल के अंर्तगत बस्तर के छिंदक नागवंशी राजाओं द्वारा 10वीं व 11वीं शताब्दी में निर्मित ढोलकल पहाड़ी पर 1000 वर्ष से भी अधिक पुरानी गणेश जी की प्रतिमा जो कि समुद्रतल से 2,994 फुट की उंचाई पर स्थित है जिसे अभी हाल ही में नक्सलियों/ माओवादियों के द्वारा गिराकर खंडित कर दिया गया था। 
ज्नजाति समाज यह विचार पोषित करता है कि मनुष्य की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा नहीं मरती किन्तु नये श्रीर में चली जाती है और अगला जन्म पूर्व जन्म के कृत्यों और आचरणों पर निर्भर करता है। तात्कालीन बस्तर में सबसे अधिक पूजे जाने वाले देवता शिव थे। शिव की पत्नि की उपासना भी जुड़ी जो विविध नामों से पुकारी जाती है। विन्ध्यवासिनी या माणिक्येश्वरी को रक्तमय बलि की अपेक्षा करने वाली विकराल देवी माना जाता था, जहां पार्वती और उमा की कल्पना स्नेहमयी जननी के रूप में की गई थी। बस्तर में विष्णु पुजा ‘‘नारायण‘‘ के रूप में ही प्रचलित थी। 1111 ई. के अभिलेख से ज्ञात होता है कि नाग-महारानी गुण्डमहादेवी ने नारायण देव की पूजा के लिए स्वमेव ‘‘नारायणपुर‘‘ ग्राम को मंदिर को समर्पित किया था। 1324 र्इ्र. के एक अभिलेख के अनुसार विष्णु के अंतिम अवतार ‘‘कालंका नारायण‘‘ की प्राण प्रतिष्ठा टेकरा नामक स्थान में की गई थी। नारायण के इन मंदिरों की पूरे देश में प्रतिष्ठा थी और कोने कोने से तीर्थ यात्री यहां आया करते थे। 
बस्तर 15वीं श्ताब्दी तक भ्रमरकोट या चक्रकोट के रूप में ही प्रचलित था। अन्नदेव के वंशजों ने 16वीं शताब्दी में जब बस्तर ग्राम को राजधानी बनाया उसी के बाद राजधानी के नाम से पूरे अंचल का नामकरण बस्तर हो गया। 14वीं शताब्दी में चक्रकोट राष्ट बन गया तो उसके अंदर अनेक राज्य सम्मिलित हो गयो और वह अनेक राज्यों में बट गया। इस प्रकार नाग युग में कोट या राज्य प्रमुख प्रशासकीय क्षेत्र थे, जो नाडु में विभाजित थे। इनमें से कुछ नाडु आकार में लघु तथा विशाल थे। नाडु के आधाार पर क्षेत्रीय विभाजन की यह परंपरा 1224 ई. तक मिलती है। नाडंु प्रमुख प्रशासकीय संभाग थे जिन्हंे परवर्ती अभिलेखों में ‘‘मंडल‘‘ कहा गया है। कालान्तर में सोमेश्वर देव प्रथम जो कि 1069 ई. में चक्रकोट के राजसिंहोसन में बैठा था उसने  चक्रकोट मंडल तथा भ्रमरकोट मंडल जो कि बस्तर के दो प्रमुख संभाग थे दोनो को मिलाकर एक राष्ट की नीव डाली। ये मंडल जिलों में विभाजित थे जिन्हें अभिलेखों में वाडि कहा गया है। चूंिक चक्रकोट राष्ट नानाजनाकीर्ण थाा इसलिए प्रशासकीय सुविधा के लिए ये जिले जाति वर्णो के आधार पर बनाये गये थे- जैसे- कुम्हारवाड, मोचिवाड, कंसारवाड, कल्लालवाड, तेलीवाड, पारियारवाड, चमारवाड व छिपवाड अतः उपयुक्त नामों से स्पष्ट है कि पूर्व मध्ययुगीन बस्तर आठ व्यावसायिक वर्ग के जिलों में विभाजित थे। वाड या जिलों का विभाजन महानगर पुर तथा ग्राम के रूप में था। संस्कृत शब्द पुर तथा द्रविड़ शब्द उरू समानार्थी है तथा ये ऐसी वस्ती के वाचक है जो अधिक सुरक्षित हों और जहां राजधानी रहीं हो। इस प्रकार की बस्तीयों में बारसुरू, ओरपुरू, राजपुर तथा नारायणपुर प्रसिद्ध थीं। बारसुरू तथा राजपुर नागों की राजधानियां थी और नारायणपुर (नारायणपाल) एक बहुत बड़े धार्मिक केन्द्र के रूप में विकसित हो चुका था। सामान्य बस्ती क्षेत्रों को अभिलेखों में वाड़ा ,ग्राम तथा स्थान कहा गया है। संस्कृत शब्द वाट का शाब्दिक अर्थ है- ऐसा सुनियोजित ग्राम जहां घर पंक्तिबद्ध हों। दंतेवाड़ा एक ऐसा ही सुनियोजित ग्राम 1061 ई. में विकसित हो चुका था। जिसमें घर एक पंक्ति में सुनियोजित ढंग से बनाये गये थे। सामान्य बस्ती की दूसरी कोटि उन गा्रमों की है जिन्हें अभिलेखांे में ग्राम गांव या नाडु नार कहा गया है। जिस प्रकार जिला स्तर का शासक व्यावसायिक वर्गों के अनुसार था उसी प्रकार ग्रामों की बसाहट धार्मिक सम्प्रदायों पर आधारित थी। छिन्दक नागों की राजधानी ‘‘बारसुरू ‘‘ एक मनोरम नगरी थी। शिव इस नगरी के अराध्य देव थे। प्रसिद्ध तेलुगु-चोड़-महामाण्डलिक ने इस नगरी के सौदर्य को बढ़ाने के लिए अथक प्रयास किया था। यहां पर उन्होंने अपने नामकरण के साथ चन्द्रादित्य मंदिर, चंद्रादित्य सरोवर, चंद्रादित्य नंदनवल का निर्माण करवाया था। यह नगरी मंदिरों , सरोवरों तथा अनेक बगीचों से दुल्हन की तरह सजी रहती थी और इसी कारण शतु्र राजवंशों ने इसे कई बार तहस नहस किया और नागों ने इसे बाार बार सजाया।
चक्रकोट शासन के प्रशासकीय क्षेत्रों का उत्तराधारक्रम
राष्ट अथवा देश

कोट अथवा महामण्डल अथवा राज्य

नाडु अथवा मंडल आधुनिक संभाग

वाडि अथवा विषय आधुनिक जिला

महानगर पुर ग्राम
वाड़ नाडुया ग्राम, गाव, नार

राजा के अधीन प्रशासकीय क्षेत्रों के विविध अधिकारियों का उत्तराधिकार क्रम-
महाराजा राष्ट का अधिपति

महामाण्डलिक अथवा महामण्डलेश्वर महामण्डलों का शासक

माण्डलिक मण्डल का स्वामी

विषयपति विषय का शासक

ग्राम नायक ग्राम का शासक

पूर्व मध्ययुगीन बस्तर का प्रमुख धर्म शैव था तथा शैवदर्शन की यहां प्रमुख शाखाएं या मत-मतांतर विकसित हो चुके थे, जिनमें कापालिक, कौल,तथा शाक्य प्रमुख थे। इनमें प्रत्येक मत तो यह स्वीकार करता है कि शिव विश्व के परमेश्वर हैं तथा मोक्ष का प्रमुख मार्ग भक्ति है, किन्तु भक्ति के स्वरूप, अर्चना के माध्यम, आचारसंहिता की विधि एवं सांस्काकि विधियों में इन मतों में विभेदकता मिलती है। 
सरगुजा में स्थित माहामाया मंदिर कलचुरीकालीन कला परंपरा का श्रेष्ट नमूना है। कलचूरीयों ने जहां जहां शासन किया वहां उनके द्वारा महामाया मंदिर का निर्माण कराया।
छत्तीसगढ़ में जनजातीय समाज बड़ी संख्या में निवासरत है, वहीं छत्तीसगढ़ राज्य का गठन ही जनजातीय हितों को ध्यान में रखते हुए किया गया है । जैसा कि हम सभी जानते हैं कि जनजातीय क्षेत्रों की सबसे मूलभूत समस्या शिक्षा और स्वास्थ्य रहा है और यह अकेले छत्तीसगढ़ या मध्यप्रदेश की ही नहीं बल्कि पूरे देश में इन क्षेत्रों की स्थिति यही है। परंतु मुझे लगता है कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी समस्या का निदान भी इन्हीं क्षेत्रों में विद्यमान है। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश तथा अन्य जनतातीय क्षेत्रों में शिक्षा जैसे विषय पर पिछले कई कई वर्षों से काम है। जिसे पुर्नस्थापित करने की जरूरत है। यहां छत्तीसगढ़ के मुरिया समाज की घोटुल परंपरा पिछले कई वर्षों से रही है या एैसे ही युवा शिक्षा गृह जिसे देश के भिन्न-भिन्न जनजातीय समाज जैसे- बैगा, भील, उरांव व मंुडा समूहों में व उससे संबंधित जनजातीय क्षेत्रों में अलग-अलग नाम से भी जाना जाता है। घोटुल जैसे युवा शिक्षा गृह जहां पर जनजातीय संस्कृति, जनजातीय बोली, भाषा व लिपि, जनजातीय कला जैसे- डोकरा शिल्प कला, बेलमेटल कला जनजातीय नृत्य कला- रेला, हुल्की, दंडामी व मांदरी नृत्य, जनजातीय रीति रिवाज व प्रकृति आधारित आस्था का प्रमुख केन्द्र रहा है जो कि अपने आप में किसी विश्वविद्यालय जैसी कल्पना से कम नहीं थी। परंतु तथाकथित विदेशी आक्रांताओं के द्वारा इस प्रकार के घोटुल जैसी पवित्र संस्था का गलत चित्रण पूरे विश्व पटल पर किया गया। 
वैसे ही जनजातीय समाज में प्राकृतिक शिक्षा पर भी कई वर्षो से काम रहा है क्योंकि प्राकृतिक ज्ञान ही प्राकृतिक चिकित्सा, एलोपैथिक चिकित्सा व होम्योपैथिक चिकित्सा का आधारभूत तत्व है। महर्षि चरक के साहित्य ‘‘चरक संहिता‘‘ में प्राकृतिक चिकित्सा संबंधी ज्ञान व आयुर्वेद संबंधी ज्ञान का संकलन तथा शल्य चिकित्सा पर आधारित आचार्य शुश्रुत का साहित्य शुश्रुत संहिता का कार्य समाज, देश ही नहीं संपूर्ण विश्व के लिए एक महत्वपूर्ण योगदान साबित हुआ है जो कि हजारों साल पहले से ही लिखा जा चुका है। एैसे ही भारत के महर्षि पतांजली द्वारा द्वितीय शताब्दी में प्रतिपादित योग विज्ञान को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सर्वसम्मती से स्वीकार कर अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्यता प्रदान करना एक तरीके से भारतीय विश्व गुरूत्व की भावना का सम्मान है। एैसे में अब हमारी सतत् कई वर्षो से चली आ रही सनातनी जीवन मूल्य, परंपरा, आस्था व संस्कृति को आज पुर्नस्थापित करने की जरूरत है तभी सहीं मायने में हम सर्वांगीण विकास की दिशा में आगे बढ़ पायेंगे।




युनान मिश्र रोमा सब मिट गये इस जहां से, 
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।।



















समाज के विकास में शिक्षा एक महत्वपूर्ण साधन है .

किसी भी राष्ट्र व समाज के विकास में शिक्षा एक महत्वपूर्ण साधन है और इसके संवर्धन व संरक्षण का दायित्व सरकार व समाज दोनो को होना चाहिए। शिक्षा के द्वारा ही छात्र के अंदर के सभी गुणों का विकास संभव है। भारत के बारे अक्सर यह कहा जाता है कि यह युवाओं का देश है। यहां के युवाओं की अभिरूचि, योग्यता व क्षमता के अनुसर उसे उचित शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराकार देश के आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक व तकनीकी विकास में सहभागी बनाना हम सभी का प्रमुख दायित्व है। वर्तमान समय में सरकार व समाज से लोगों की अपेक्षाएं बढ़ी हैं। सभी अभिभावक अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं । आज शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों की संख्या मंे उल्लेखनीय वृद्धि हुई है वहीं उन सभी के लिए सस्ती व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाना दुर्लभ होता जा रहा है। विगत वर्षों में हम सभी ने यह महसूस किया है कि पर्याप्त शिक्षा नीति के अभाव में गरीब छात्र गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित हो रहा है। जिसके परिणामस्वरूप समाज में बढ़ती आर्थिक विषमता समूचे राष्ट्र के लिए चिंता का विषय हो गया है।छत्तीसगढ़ राज्य एक जनजातीय बाहुल राज्य हैं, यहॉ 66.16 लाख जनजाति निवासरत है, जिनका छत्तीसगढ़ की कुल जनसंख्या का 31.76 प्रतिशत है। छत्तीसगढ़ राज्य का गठन ही जनजातीय हितों को ध्यान में रखते हुए किया गया है । जैसा कि हम सभी जानते हैं कि जनजातीय क्षेत्रों की सबसे मूलभूत समस्या शिक्षा और स्वास्थ्य रहा है और यह अकेले छत्तीसगढ़ या मध्यप्रदेश की ही नहीं बल्कि पूरे देश में इन क्षेत्रों की स्थिति यही है। वर्तमान दौर सूचना क्रांति का दौर है और इस दौर में मीडिया ने विस्तृत रूप और आकार ग्रहण कर लिया है। संचार के सशक्त माध्यम समाचार-पत्र, पत्रिकाएं, सिनेमा, रेडियो, टेलीविजन, मोबाइल फोन और इंटरनेट के महत्व से हम सभी परिचित है। हमारे दैनिक क्रियाकलापों में इनकी भूमिका और महत्व में निरंतर वृद्धि होती जा रही है। वहीं हमारा समाज भी परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। हमारे जनजातीय समाज में जन्म से लेकर मृत्यू तक अपनी परंपराएं हैं, रीति रिवाज है जो आधुनिक समाज को कई बार सीख देते दिखाई देते हैं। इन  खास चीजों को आज प्रमुखता से रेखांकित किये जाने की जरूरत है।
आज हमारे समाज के सामने विचार के कई मुद्दे उभर कर सामने आये हैं, जिनमें शिक्षा का मुद्दा एवं संस्कृति का मुद्दा अहम् है। हमारे युवा बेहतर से बेहतर शिक्षा की ओर अग्रसर हो तथा किसी प्रकार के मुद्दे से दिग्भ्रमित न हो यह आज के समय की आवश्यकता है। बेहतर शिक्षा से बेहतर समाज का निर्माण किया जा सकता है। इसी प्रकार वर्तमान समय में आस्था और अस्मिता का भी प्रश्न महत्वपूर्ण बना हुआ है। हमारे समाज में कुछ तत्व ऐसे भी है, जो आस्था और अस्मिता के नाम पर हमारे जनजातीय समाज को उसकी परंपराओं और संस्कृति से दूर करने का प्रयास कर रहे है। हमें ऐसे तत्वों को चिन्हित कर उन्हें ऐसे काम करने से रोकना होगा।आज हमारे जनजातीय समाज पर कुछ अराष्ट्रीय गतिविधियों का भी खतरा मंडरा रहा है। नक्सलवाद की आड़ में चल रहे आतंकवाद की गिरफ्त से हमारे वनवासी बांधवों को बचाना संरक्षित करना हमारा सामाजिक उत्तरदायित्व है।
 यह प्रसन्नता का विषय है कि हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी स्मृति-मंजूशा का प्रकाशन किया जा रहा है जिसके अंतर्गत विद्वानों से युवाओं पर केन्द्रित ‘‘बढ़ते युवा-बदलता भारत‘‘ विषय पर लेख आमंत्रित किये गये हैं जो कि हमारे प्रदेश के युवाओं के लिए मार्गदर्शक साबित होगा। जय हिंद !

Saturday, February 17, 2018

जनजाति समाज की आस्था, परंपरा एवं संस्कृति

जनजाति समाज की आस्था, परंपरा एवं संस्कृति

ज्नजाति समाज यह विचार पोषित करता है कि मनुष्य की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा नहीं मरती किन्तु नये श्रीर में चली जाती है और अगला जन्म पूर्व जन्म के कृत्यों और आचरणों पर निर्भर करता है। तात्कालीन बस्तर में सबसे अधिक पूजे जाने वाले देवता शिव थे। शिव की पत्नि की उपासना भी जुड़ी जो विविध नामों से पुकारी जाती है। विन्ध्यवासिनी या माणिक्येश्वरी को रक्तमय बलि की अपेक्षा करने वाली विकराल देवी माना जाता था, जहां पार्वती और उमा की कल्पना स्नेहमयी जननी के रूप में की गई थी। बस्तर में विष्णु पुजा ‘‘नारायण‘‘ के रूप् में ही प्रचलित थी। 1111 ई. के अभिलेख से ज्ञात होता है कि नाग-महारानी गुण्डमहादेवी ने नारायण देव की पूजा के लिए स्वमेव ‘‘नारायणपुर‘‘ ग्राम को मंदिर को समर्पित किया था। 1324 र्इ्र. के एक अभिलेख के अनुसार विष्णु के अंतिम अवतार ‘‘कलंका नारायण‘‘ की प्राण प्रतिष्ठा टेकरा नामक स्थान में की गई थी। नारायण के इन मंदिरों की पूरे देश में प्रतिष्ठा थी और कोने कोने से तीर्थ यात्री यहां आया करते थे। 
बस्तर 15वीं श्ताब्दी तक भ्रमरकोट या चक्रकोट के रूप् में ही प्रचलित था। अन्नदेव के वंशजों ने 16वीं शताब्दी में जब बस्तर ग्राम को राजधानी बनाया उसी के बाद राजधानी के नाम से पूरे अंचल का नामकरण बस्तर हो गया। 14वीं शताब्दी में चक्रकोट राष्ट बन गया तो उसके अंदर अनेक राज्य सम्मिलित हो गयो और वह अनेक राज्यों में बट गया। इस प्रकार नाग युग में कोट या राज्य प्रमुख प्रशासकीय क्षेत्र थे, जो नाडु में विभाजित थे। इनमें से कुछ नाडु आकार में लघु तथा विशाल थे। नाडु के आधाार पर क्षेत्रीय विभाजन की यह परंपरा 1224 ई. तक मिलती है। नाडंु प्रमुख प्रशासकीय संभाग थे जिन्हंे परवर्ती अभिलेखों में ‘‘मंडल‘‘ कहा गया है। कालान्तर में सोमेश्वर देव प्रथम जो कि 1069 ई. में चक्रकोट के राजसिंहोसन में बैठा था उसने  चक्रकोट मंडल तथा भ्रमरकोट मंडल जो कि बस्तर के दो प्रमुख संभाग थे दोनो को मिलाकर एक राष्ट की नीव डाली। ये मंडल जिलों में विभाजित थे जिन्हें अभिलेखों में वाडि कहा गया है। चूंिक चक्रकोट राष्ट नानाजनाकीर्ण थाा इसलिए प्रशासकीय सुविधा के लिए ये जिले जाति वर्णो के आधार पर बनाये गये थे- जैसे- कुम्हारवाड, मोचिवाड, कंसारवाड, कल्लालवाड, तेलीवाड, पारियारवाड, चमारवाड व छिपवाड अतः उपयुक्त नामों से स्पष्ट है कि पूर्व मध्ययुगीन बस्तर आठ व्यावसायिक वर्ग के जिलों में विभाजित थे। वाड या जिलों का विभाजन महानगर पुर तथा ग्राम के रूप में था। संस्कृत शब्द पुर तथा द्रविड़ शब्द उरू समानार्थी है तथा ये ऐसी वस्ती के वाचक है जो अधिक सुरक्षित हों और जहां राजधानी रहीं हो। इस प्रकार की बस्तीयों में बारसुरू, ओरपुरू, राजपुर तथा नारायणपुर प्रसिद्ध थीं। बारसुरू तथा राजपुर नागों की राजधानियां थी और नारायणपुर (नारायणपाल) एक बहुत बड़े धार्मिक केन्द्र के रूप् में विकसित हो चुका था। सामान्य बस्ती क्षेत्रों को अभिलेखों में वाड़ा ,ग्राम तथा स्थान कहा गया है। संस्कृत शब्द वाट का शाब्दिक अर्थ है- ऐसा सुनियोजित ग्राम जहां घर पंक्तिबद्ध हों। दंतेवाड़ा एक ऐसा ही सुनियोजित ग्राम 1061 ई. में विकसित हो चुका था। जिसमें घर एक पंक्ति में सुनियोजित ढंग से बनाये गये थे। सामान्य बस्ती की दूसरी कोटि उन गा्रमों की है जिन्हें अभिलेखांे में ग्राम गांव या नाडु नार कहा गया है। जिस प्रकार जिला स्तर का शासक व्यावसायिक वर्गों के अनुसार था उसी प्रकार ग्रामों की बसाहट धार्मिक सम्प्रदायों पर आधारित थी। छिन्दक नागों की राजधानी ‘‘बारसुरू ‘‘ एक मनोरम नगरी थी। शिव इस नगरी के अराध्य देव थे। प्रसिद्ध तेलुगु-चोड़-महामाण्डलिक ने इस नगरी के सौदर्य को बढ़ाने के लिए अथक प्रयास किया था। यहां पर उन्होंने अपने नामकरण के साथ चन्द्रादित्य मंदिर, चंद्रादित्य सरोवर, चंद्रादित्य नंदनवल का निर्माण करवाया था। यह नगरी मंदिरों , सरोवरों तथा अनेक बगीचों से दुल्हन की तरह सजी रहती थी और इसी कारण शतु्र राजवंशों ने इसे कई बार तहस नहस किया और नागों ने इसे बाार बार सजाया।
चक्रकोट शासन के प्रशासकीय क्षेत्रों का उत्तराधारक्रम
राष्ट अथवा देश

कोट अथवा महामण्डल अथवा राज्य


नाडु अथवा मंडल आधुनिक संभाग


वाडि अथवा विषय आधुनिक जिला


महानगर पुर ग्राम
वाड़ नाडुया ग्राम, गाव, नार




राजा के अधीन प्रशासकीय क्षेत्रों के विविध अधिकारियों का उत्तराधिकार क्रम-

महाराजा राष्ट का अधिपति


महामाण्डलिक अथवा महामण्डलेश्वर महामण्डलों का शासक


माण्डलिक मण्डल का स्वामी


विषयपति विषय का शासक


ग्राम नायक ग्राम का शासक

पूर्व मध्ययुगीन बस्तर का प्रमुख धर्म शैव था तथा शैवदर्शन की यहां प्रमुख शाखाएं या मत-मतांतर विकसित हो चुके थे, जिनमें कापालिक, कौल,तथा शाक्य प्रमुख थे। इनमें प्रत्येक मत तो यह स्वीकार करता है कि शिव विश्व के परमेश्वर हैं तथा मोक्ष का प्रमुख मार्ग भक्ति है, किन्तु भक्ति के स्वरूप, अर्चना के माध्यम, आचारसंहिता की विधि एवं सांस्काकि विधियों में इन मतों में विभेदकता मिलती है। 

भारत में जनजातीय क्षेत्रों में षिक्षा की स्थिति पर विष्लेषणात्मक अध्ययन

“भारत में जनजातीय क्षेत्रों में षिक्षा की स्थिति पर विष्लेषणात्मक अध्ययन “

जनजातियां विश्व के लगभग सभी भागों में पायी जाती है, भारत में जनजातियों की संख्या आफ्रीका के बाद दूसरे स्थान पर है। प्राचीन महाकाव्य साहित्य में भारत में निवासरत विभिन्न जनजातियों जैसे भारत, भील, कोल, किरात, किननर, कीरी, मत्स्य व निषाद आदि का वर्णन मिलता है। प्रत्येक जनताति की अपनी स्वयं की प्रशासन प्रणाली थी, व उनके मध्य सत्ता का विकेन्द्रीकरण था। परंपरागत जनजाति संस्थाएं वैधानिक, न्यायिक तथा कार्यपालिक शक्तियों से निहित थी। बिहार के सिंहभूम में मानिकी व मुण्डा तथा संथाल परगना में मांझी व परगनैत की प्रणालियां पारंपरिक संस्थाओं के कुछ उदाहरण है जिनका संचालन जनजातीय मुखियाओं के द्वारा किया जाता था। जो कि अपने-अपने जनजातीयों की सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक मामलों पर विशिष्ट प्रभाव रखते हैं।
जनजातीय के उद्भव के संदर्भ में भारत में जनजाति कई जिलों से मिलकर बनी एक उच्चतम राजनैतिक इकाई थी जो कि कबीलों के रूप् में संयोजित थी। जिसके अधिकार क्षेत्र में एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र था और अपने लोगों के उपर प्रभावी नियंत्रण रखता था। किसी विशेष जनजाति का निश्चित भू-अधिकार क्षेत्र का नामकरण उस जनजाति के उपर हुआ करता था। एैसा विश्वास किया जाता है कि भारत देश का नाम शक्तिशाली भारत जनजाति के नाम से हुआ है। इसी प्रकार मत्स्य गणराज्य जो कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी में अस्तित्व में था उसका उद्भव मत्स्य जनजाति से हुआ माना जाता है। राजस्थान और मध्यप्रदेश में निवासरत मीणा जनजाति मत्स्य जनजाति के ही वंसज है। मीणाओं का विश्वास है कि इस संसार का मूल मत्स्य यानि मीन अर्थात मछली से जुड़ा हुआ है। मीणा लोग मत्स्यावतार को भगवान के अवतार के रूप् में पूजते हैं। राजस्थान के दौस जिले में मत्स्यावतार का बहुत बड़ा मंदिर भी है। भारत में आज भी कई एैसे क्षेत्र हैं जिसका नाम वहां के जनजाति के नाम पर है जैसे. मिजोरम - मिजो, नागालैण्ड- नागा, त्रिपुरा-त्रिपुरी, संथाल परगना- संथाल, हिमाचल प्रदेश का लाहोल, स्वाग्ला व किन्नौर वहां के लाहोला, स्वांगला व किन्नौरा जनजाति के नाम के आधार पर पड़ा।
परंतु आठवीं शताब्दी में मुगलों के आक्रमण के कारण छोटा नागपुर व अन्य क्षेत्रों के उराव, मुण्डा व हो जनजातियों तथा पश्चिम भारत के भाील जनजाति बड़ी मात्रा में आतंक के शिकार हुए। मध्यभारत के जबलपुर के पास गड़हा नामक गोंडवाना राज्य में लगभग 200 बर्षो तक शाासन करने वाले गोंड राजा दलपत शाह, रधुनाथ शाह का मुगलों के साथ लंबे संमय तक संधंर्ष हुआ आैंार अंतत्ः अठारवीं शताब्दी में गांेड राज्य का अंत हो गया।  मुगलों ने जब दक्षिण भारत की ओर आक्रमण किया तब उन्होंने उत्तर पश्चिम भारत के उद्यमी जनजाति बंजारों के पशुओं को अपने रसद के परिवहन के लिए उपयोग में लाने के लिए बाध्य किया गया। इस प्रकार जनजातियों की क्षीण होती शक्ति का फायदा उठाकर मुगलों ने बड़ी मात्रा में जनतातियों को इस्लाम धर्म में परिवर्तित किया। व्रिटिश शासनकाल में ब्रिटिशर्स ने बीहड़ जनजातीय क्षेत्रों में आक्रमण न कर पाने के कारण उन क्षेत्रों मंे मिशनरियों के द्वारा सास्कृतिक आक्रमण किया गया और जनजातीय क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में धर्म परिवर्तन किया गया जिसका खामियाजा हमें आज भी चुका रहे हैं।  
सन् 1941 में भारत में जनजातियों की कुल जनसंख्या 2 करोड़ 47 लाख क लगभग थी। आज वर्तमान में 2011 के संेसस के रजिस्टार जनरल ऑफ इंडिया के रिपोर्ट के आधार पर भारत की कुल जनसंख्या 1 अरब, 21 करोड़, 5 लाख, 69 हजार 5 सौ 73 है जिनमे से  जनजातियों की जनसंख्या 10 करोड़ 42 लाख, 81 हजार 34 है जो भारत की कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत है। भारत की जनजातियों के संदर्भ में विशेष बात यह है कि यहां पर भील जनजातियां सर्वाधिक है जिनकी कुल जनसंख्या 1 करोड़ 26 लाख, 89 हजार, 9 सौ 52 है, दूसरे स्थान पर गोंड जनजाति है जिसकी कुल जनसंख्या 1 करोड़ 5 लाख, 89 हजार, 4 सौ 22 है। तीसरे स्थान पर संथाल जनजाति का है जिसकी संख्या 58 लाख, 38 हजार 16 है वही चतुर्थ स्थान पर मीणा जनजाति है जिनकी संख्या 38 लाख 2 है।
भारत में 50 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या जिलों की बात करें तो वे कुल 90 जिले है जिनमें से छत्तीसगढ़ में 7 जनजाति जिले, मध्यप्रदेश में 6 जिले , ओडिसा में 8 जिले, झारखण्ड में 5 जिले तथा गुजरात में 5 जिले है वहीं भारत में 25 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक की जनसंख्या वाले जिले 62 है।  

प््रादेश प््रादेश की कुल जनसंख्या प््र.ादेश की कुल जनजातियों की जनसंख्या प््रादेश की जनजातियों का प्रतिशत प््रादेश के जनतातियों का साक्षरता का प्रतिशत देश की जनसंख्या का जनजाति प्रतिशत
छत्तीसगढ़ 2,55,45,199 78,22,902 30.62 प्रतिशत 59.1 प्रतिशत 7.50 प्रतिशत
मघ्यप्रदेश 7,26,26,809 1,53,16,784 21.09 प्रतिशत 50.6 प्रतिशत 14.69 प्रतिशत
महाराष्ट 11,23,74,333 1,05,10,213 10.08 प्रतिशत 65.7 प्रतिशत 9.35 प्रतिशत
आध्रप्रदेश 8,45,80,777 59,18,073 49.2 प्रतिशत
झारखण्ड 3,29,88,134 86,45,042 8.29 प्रतिशत 57.1 प्रतिशत 26.21 प्रतिशत
प्श्चिम बंगाल 9,12,76,115 52,96,953 57.9 प्रतिशत
गुजरात 6,04,39,692 89,17,174 8.55 प्रतिशत 62.5 प्रतिशत 14.75 प्रतिशत


भारत के जनजातियों के लिए शिक्षा एक केन्द्र बिंदु है जिस पर उनका विकास निर्भर करता है शिक्षा से ज्ञान का प्रसार होता है। ज्ञान आंतरिक बल देता है जो कि जनजातियों को शोषण व गरीबी से मुक्ति पाने के लिए बहुत ही आवश्यक है। वर्तमान समय में जनजातियों के शोषण व दयनीय स्थिति के लिए मुख्य रूप् से शिक्षा ही जिम्मेदार है। निरक्षरता से उत्पन्न अज्ञानता के कारण जनजाति लोग नयी आर्थिक सुअवसरों का लाभ नहीं उठा पाये। जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है, जिसके अंतर्गत आर्थिक एवं राजनीतिक क्षेंत्रों में विकास के साथ ही विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में नये प्रवर्तनों के बारे में समुदाय को सूचित करता है। इस कारण शिक्षा जनजातियों के अत्यंत आवश्यक है।
ज्नजातियों के लिए शिक्षा की महत्ता को समझते हुए संविधान निर्माताओं ने संविधान के अनुच्छेद 15 (4) एवं 46 में अनुसूचित जनजातियों में शिक्षा के प्रसार के लिए विशेश प्रावधान किये गये है। अनुच्छेद 15( 4 )के अनुसार राज्य सरकार को किसी भी सामाजिक अथवा शैक्षणिक रूप् से पिछड़े वर्ग के नागरिकों के प्रगति के लिए अथवा अनुसूचित जाति जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान बनाने का अधिकार प्रदान करता है। संविधान के अनुच्छेद 46 में सामाज के कमजोर बर्गो विशेषकर अनुसुचित जाति जनजााति को विशेष रूप् से ध्यान में रखकर शैक्षणिक एवं आर्थिक लाभ पहुंचान का दिशा निर्देश राज्य सरकार को दिये है। परंतु रजिस्टार जनरल ऑफ इंडिया के द्वारा जारी किया गया है चौकाने वाले हैं कक्षा पहली से 12वीं तक सिर्फ 13.9 प्रतिशत जनजाति ही पहुंच पाता है। वहीं भारत की पहली से 10वीं तक के जनजातीय बालकों का डॉपआउट रेट 70.6 प्रतिशत है तथा बालिकाओं का 71.3 प्रतिशत है। जो कि चिंताजनक है। इसी तरह छत्तीसगढ़ के संदर्भ में महत्वपूर्ण सांख्यिकी निम्नानुसार है-
क्रमांक छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण संस्थान स्ंाख्या
1. प्राथमिक शाला 16941
2. मध्यमिक शाला 6202
3. हाई स्कूल 416
4. उच्चतर माध्यमिक विद्यालय 625
5. आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय 05
6. कन्या शिक्षा परिसर 05
7. ग्ुारूकुल परिसर 01
8. कन्या क्रीड़ा परिसर 13
9. एकलव्य आवासीय परिसर 08
10. प््राी मेटिक छात्रावास 1219
11. पोस्ट मेटिक छात्रावास 187
12. आश्रम शालाएं- प्राथमिक स्तर 1031
13. आश्रम शालाएं- माध्यमिक स्तर 79
शिक्षा राज्य एव ंकेन्द्र दोनो का विशय है तथा शिक्षा के प्रसार का मूल दायित्व राज्य सरकार को सौपा गया है। केन्द्र सरकार उच्च शिक्षा, अनुसंधान, वैज्ञानिक एवं तकनीकि शिक्षा के क्षेत्रे में सुविधाओं के समन्वय तथा मानक निर्धारण के लिए उत्तरदायी है। केन्द्र सरकार का मु,ख्य प्रयास अनुसूचित जनजातियों को मैटिक उपरांत छात्रवृति दिलवाना, बालक, बालिका छात्रवासों की स्थापना करवाना और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोचिंग केन्द्र का प्रबंध करवाना होता है कल्याण मंत्रालय द्वारा इस कार्यक्रम के लिए विषेश केन्द्रीय सहायता प्रदान करती है। शिक्षा मंत्रालय/एच आर डी द्वारा दी गई कुछ प्रमुख सुविधाओं के सभी केन्द्रीय विश्वविद्यालयों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानो, क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेजों, मेडिकल कॉलेजों और केन्द्री विद्यालयों में 71/2 प्रतिशत जनजातियों के लिए तथा 15 प्रतिशत अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था प्रदान करती है। हालाकि पिछले वर्षों में जनजातियों की साक्षरता में वृद्धि हुई है लेकिन फिर भी हर साक्षरता के उस सामान्य स्तर तक नहीं पहुंच पाये है। रजिस्टार जनरल आफ इंडिया द्वारा जारी पिछले कुछ वर्षों के साक्षरता दर पर ध्यान दे तो पायेंगें कि-

वर्ष सभी सामाजिक समूहांे का प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों का प्रतिशत
1961 28.3 प्रतिशत 8.53 प्रतिशत
1971 34.45 प्रतिशत 11.30 प्रतिशत 
1981 43.57 प्रतिशत 16.35 प्रतिशत
1991 52.21 प्रतिशत 29.60 प्रतिशत 
2001 64.84 प्रतिशत 47.10 प्रतिशत
2011 72.99 प्रतिशत 58.96 प्रतिशत


शिक्षा नीति में बदलाव के तहत अनु. जनजातियों के विद्यार्थियों की शिक्षा के लिए नवोदय विद्यालय जैसी शिक्षण संस्थान स्थापित किये गये लेकिन 12वीं के प्ष्चात की व्यवस्था के लिए किसी प्रकार की व्यवस्था नहीं किया गया जिससे प्रतिभा वहंी नष्ट होती जा रही है। 
शिक्षा की धीमी प्रगति के प्रमुख कारण निम्नानुसार है-
1. माता पिता के द्वारा अनदेखी-  गरीबी से त्रस्त माता पिता के लिए उनके बच्चों की शिक्षा एक विलासिता है, जिसका वहन वे बड़ी मुस्किल से कर पाते हैं। बच्चे जीवन यापन के लिये अपने माता पिता की सहायता करते है। जब माता पिता कृषि अथवा श्रमिक कार्य के लिए बाहर जाते हैं तो व्यस्क बच्चे अपने छोटे बच्चों की देखभाल करते है। गरीब माता पिता के बच्चों की शिक्षा की सुविधाआंे से बंचित किये जाने के लिए शिशु संरक्षण केन्द्र, शिशु सदन, बालवाडि़यों का जनजातीय क्षेत्रों में न होना एक बहुत बड़ा कारण है। 
2. शिक्षा की विषय वस्तु व पाठ्यक्रम - जनजातियेां की शिक्षा के पाठ्यक्रम को सावधानीपूर्वक तैयार करने की जरूरत है। अनुसूचित जनजातियों की सामाजिक सांस्कृतिक परिवेष पर ध्यान देना आवश्यक है। वर्तमान में शिक्षा की समस्या विषय वस्तु को जनजाति क्षेता्रें के लिए लागू किया गया है जो कि कई मामलों में विशेषकर आरंभिक स्तर पर तर्कसंगत नहीं है। इसलिए शिक्षा को सार्थक बनाने हेतु इस विषय पर पुनर्विचार करना आवश्यक है।
3. अपर्याप्त शैक्षणिक संस्थाएं व सहायक सेवाएं- जनजाति क्षेत्रों में शैक्षणिक संस्थानों, भोजन व आवास सुविधाओं की अपर्याप्तता से ग्रसित है। जहां संस्थान व स्कूल खोले भी गये हैं, वहां लगभग 40 प्रतिशत केन्द्र भवनहीन हैं। छात्रवृतियों, पुस्तक वैंकों आदि के रूप् में प्रोत्साहन जैसी सहायक सेवाएं व सामग्रियां बहुत ही नगण्य व अपर्याप्त है तथा सामान्यतः यह बच्चों को आकर्षित नहीं करते।
4. शिक्षकों की अनुपस्थिति- जनजाति क्षेत्रों में शिक्षकों की अनुपस्थिति शिक्षा को विपरीत रूप् से प्रभावित करने वाली एक प्रमुख समस्या है। शिक्षण संस्थाएं जनजाति क्षेत्रों में दूरस्त क्षेतो में स्थित होती है। शिक्षकों की उपस्थिति पर प्रभावी नियंत्रण रखना एक गंभाीर समस्या है। शिक्षक अपने उपर किसी पर्यवेक्षण केे न होने और जनजातियों की शिक्षा के लिए समर्पण की भावना की कमीं के कारण व सामान्यतः कई दिनों तक अनुपस्थित रहते हैं। बच्चे व माता पिता अपना समय व्यर्थ गंवाना सहन नहीं कर पाते और इसलिए निराष होकर सामान्यतः स्कूल शिक्षा से बंचित होकर बच्चे स्कूल छोड़ने पर बाध्य होते हैं।
5. शिक्षण का माध्यम- जनजातियों के लिए स्कूलों में शिक्षण का माध्यम एक कठिन समस्या है। स्वतंत्रता के 68 वर्षो के बाद भी हम जनजातियों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा नहीं दे पाये । जनजाति बच्चे स्कूल में उनके लिए पूणर््ातः अजनबी भाषाओं में दिये गये पाठों को सामान्यतः समझ नहीं पाते । संविधान के अनुच्छेद 350(क) के अनुसार प्राथमिक स्तर तक शिक्षण उनकी मातृभाषा में दिये जाने का प्रावधान है। राष्टपति को भी इस उद्वेष्य हेतु किसी भी राज्य को दिशा निर्देश जारी करने की शक्ति प्रदत्त है परंतु इस दिशा में अपेक्षित कदम नहीं उठाये गये।
6. शिक्षा नीति - जनजाति क्षेता्रं के अभी तक को स्पष्ट शिक्षा नीति नहीं बन पायी है विभिन्न समितियों व आयोगों के सिफारिशे और सुझाओं के बावजूद जनजाति क्षेता्रें के लिए कोई नीति लागू नही ं की गई है। कुछ राज्यों में जनजाति क्षेतों के शिक्षा विभाग के नियंत्रण में हैं तों कुछ राज्यों मे जनजाति कल्याण विभाग के अधीन जजाति क्षेत्रों के शैक्षणिक संस्थानों के संबंध में प्रशासनिक नीति के अभाव से जनजातियों के शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
7. शिक्षा की विषय वस्तु में जनजातियों की आवश्यकताओं व अभिलाषाओं को ध्यान रखा जाना चाहिए। 
8. प्राथमिक स्तर पर विषयों का चयन बडी सावधानी पूर्वक करना चाहिए, शिक्षा कार्योन्मुखी होना चाहिए। 
9. जनजाति शिक्षा के पाठ्यक्रमों में पारंपरिक स्थानीय कौशल, हस्तकलाओं का समावेश होना चाहिए।
10. जनजातियों को उन्हें अपने अधिकारों व कर्तव्यों को समझने के लिए प्राथमिक नागरिक शास्त्र भी पढ़ाया जाना चाहिए।
11. जनजाति क्षेत्रों में शैक्षणिक संस्थाओं को खोलने के लिए प्राथमिकता दी जानी चाहिए तथा इन क्षेत्रांे में स्कूल जाने के लिए 4 किलोमिटर से अधिक पैदल चलने वाले विद्यार्थियों के लिए छात्रावास जैसी सुविधाएं उपलब्ध करायी जानी चाहिए।
12. पाठ्यक्रम में जनजातियों के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश को सम्मिलित किया जाना चाहिए। कम से कम प्राथमिक स्तर तक शिक्षा का माध्यम जनजाति भाषाओं में होना चाहिए माध्यमिक स्तर के बच्चों के लिए शिक्षण का माध्यम क्षेत्रीय अथव राज्य की भाषा होनी चाहिए।
13. शिक्षकों का चयन जनजातियों में से ही किया जाना चाहिए और समुचित संख्या मंे योग्य शिक्षक न मिलने की स्थिति में शैक्षणिक योग्यता में आवश्यक छूट भी दी जानी चाहिए। जनजातीय भाषा जानने वाले सामान्य शिक्षक का भी चयन किया जा सकता है।
14. जनजातीय क्षेत्रों में अधिकाधिक संख्या में बालवाड़ी, शिशु सदन, शिशु संरक्षण केन्द्र की स्थापना की जानी चाहिए। इन केन्द्रो पर उचित पौष्टिक आहार कार्यक्रमेां को भी क्रियान्वित किया जाना चाहिए जिससे न केवल जनजातीय बच्चों को पौष्टिक भोजन प्राप्त होगा अपितु उनमें स्वास्थ्य व संतुलित भोजन के बारे में जागरूकता पैदा होगी।
15. प्राथमिक स्तर के अघ्यापकों के लिए एक प्रभावी पर्यवेक्षण पद्धति का होना आवष्यक है। जहां आवष्यक हो वहां उन्हंे स्थानीय पंचायतेां के नियंत्रण में रखा जा सकता है।
16. छाता्रवासों की व्यवस्था में जनजातियों व स्वैच्छिक एजंेसियों की भी प्रभावी सहभागिता होनी चाहिए। 
17. जनजातिय क्षेता्रें में स्थापित विविध औद्योगिक व अन्य परियोजनाओं की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए शैक्षणि शिक्षा व व्यवसायिक प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए उन्हंे सक्षम होना चाहिए। जनजातियों की आवश्यकताओं पर औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थाओं को भी ध्यान देना चाहिए प्रशिक्षण उपरांत सहायता भी प्रशिक्षण कार्यक्रम का एक अंग होना चाहिए।
18. जनजातियों में खेलकूद के प्रति वंशागत प्रतिभावान होते हैं इस क्षेत्र में उनकी प्रतिभा को प्रोत्साहन किया जाना चाहिए।

पारंपरिक लोककलाओं, लोकनृत्यो व लोकगीतों के विकास तथा संवर्धन हेतु हमारे विभिन्न विष्वविद्यालयों द्वारा संचालित पाठ्यक्रमों में स्थान देने की जरूरत है, तथा विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी गोंडी, हल्बी, भतरी जैसी बोलियों को संरक्षित करने के आदिवासी भाषा व लोककला संस्थान स्थापित करने के प्रयास किये जाने की आवष्यकता है, क्योकि ये आदिवासी बोलियां, ये लोककलाएं, ये नृत्य, ये चित्रकला तथा मूर्तिकला हजारों वर्षों के अनुभवों को अपने में संचित तथा समाहित किये हुये हैं। सरकार द्वारा  आदिवासी लोककला संग्राहलयों, सांस्कृतिक केन्द्रों, लोकसंगीत नाटक अकादमी तथा लोककला वीथिका की स्थापना किये जाने की आवष्यकता है, जिससे लोगों में इन विलुप्त हो रही लोककलाओं के प्रति जागरूकता पैदा हो सके तथा साथ-साथ इसका भी ख्याल रखा जाना आवश्यक है कि बड़ी तेजी से उभरते महानगरीय संस्कृति की चकाचौंध का प्रभाव इन लोककलाओं पर न पडे । लोककलाओं को आज व्यवसाय का माध्यम बनाने हेतु भी आवष्यक कदम उठाने की जरूरत है जिससे इन विधाओं से जुड़े लोककलाकारों को आजीविका के साधन उपलब्ध हो सकेंगे तभी देश का सही मायने में विकास हो पायेगा। 
आज अगर हम विकास की बात करते हैं तो उस विकास में सिर्फ सिमित लोगों का विकास ही शामिल हैं, संपन्नता की पहुंच सिर्फ कुछ ही लोगों तक सिमित है देष की आजादी के 68 वर्ष पूर्ण करने के बाद भी साक्षरता का लक्षित दर अभी तक हासिल नही किया जा सका हैं ।

छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक स्थिति पर विष्लेषणात्मक अध्ययन

“ छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक स्थिति पर विष्लेषणात्मक अध्ययन “

बस्तर के शहीद गुण्डाधुर के नेतृत्व में 1910 में संचालित भूमकाल आंदोलन को आज 100 वर्ष से भी ज्यादा हो चुके हैं भूमकाल की याद में दण्डकारण्य क्षेत्र में हर जगह ं भूमकाल का शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है, आज  भूमकाल आंदोलन के 100 वर्ष के बाद भी आदिवासियों की सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं दिखाई पड़ता है। कई सत्ता परिवर्तन हुए पर आज भी आदिवासियों की स्थिति वहीं की वहीं है। आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने के प्रयास अब भी खोखले दावे ही साबित हो रहे हैं अनुस्ूाचित क्षेत्रों की अगर बात करे तो सरकार का ध्यान आदिवासी मुट्ठों के प्रति कभी गंभीर रहा ही नहीं है । चाहे वह पेसा एक्ट का मामला हो या वन अधिनियम की बात हो तथा खनिज संसाधनों की रायल्टी से संबंधित मुद्दे हो ये एैसे मुद्दे हैं जिन पर सरकार को विषेष रूप से प्रयास करने की आवष्यकता महसूस होनी चाहिए तभी आदिवासी हितों को संरक्षण मिल पायेगा।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (4), 16(4), 46, 47, 48(क),49 243(घ)(ड), 244(1), 275, 335, 338, 339, 342 तथा पांचवी अनुसूचि के अनुसार अनुसूचित जनजातियों के राजनैतिक, आर्थिक, सास्कृतिक तथा शैक्षणिक विकास जैसे कल्याणकारी योजनाओं के विषेष प्रावधान की बात कही गई है परंतु इसे अब तक लागू नही कर पाना वाकई सरकार के लिए चिंता का विषय  है।
भारतीय संविधान के पांचवी अनुसूचि के अनुसार छत्तीसगढ़ के अधिसूचित क्षेत्रों जैसे सरगूजा, जषपुर, कोरिया, रायगढ़, देवभोग, कोरबा, बिलासपुर, कवर्धा, मानपुर, मोहला, गरियाबंद, सिहावा, नगरी डौन्डी लोहारा, कांकेर, बस्तर, दन्तेवाड़ा, नारायणपुर एवं बीजापुर में पंचायतीराज संस्थाओं की भांति नगरीय निकाय चुनाव में भी अघ्यक्ष एवं महापौर के पद आदिवासियों के लिए प्रावधानित होने थे परंतु समय पर इसे लागू नही कर पाने के कारण राज्य के 4 नगर निगम, 9 नगर पालिका एवं 46 नगर पंचायतों में अब तक हुए तीन आम चुनाओं में लगभग 150 से अधिक आदिवासी जनप्रतिनिधियों  को महापौर व पंचायत अध्यक्ष के पदों से हांथ धोना पड़ा है, जो वाकई चिंताजनक है। 
भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा -165 (6-ड) तथा 170 (ख) के तहत यह स्पष्ट रूप से ज्ञात है कि अनुसूचित जनजातियों के अचल संपत्तियों के संरक्षण की बात हो या लघु वनोपज जैसे इमली, अमचूर, महुआ, चिरौजी, तिखुर, आदि के प्रसंस्करण के व्यवसाय की बात हो आदिवसी हमेंषा से ठगे ही गये है। यह सर्वविदित है कि आदिवासी क्षेत्रों में उपलब्ध खनिज संसाघनों से सरकार को अरबाोें रूपये के राजस्व की प्राप्ति होती है या सीधे शब्दों में कहा जाए तो सरकार के आय के स्रोत इन आदिवासी क्षेत्रों में उपलब्ध वन संसाधन तथा खनिज संसाधन  ही हैं, परंतु इस राजस्व का कितना प्रतिषत हिस्सा उन अनुसूचित क्षेत्रों के राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक विकास में खपत किया जाता रहा है ।
 अनुसूचित क्षेत्रों में सरकार द्वारा जो उद्योग-धंधे स्थापित किये जा रहे हैं उनमें प्रभावित ग्रामीणों व विस्थापित परिवारों केा प्रदान की जाने वाली मुआवजा राषि की बात हो या विस्थापित परिवार के सदस्यों को नौकरी का मुद्दा हो या फिर विस्थापित परिवार के सदस्यों के शेयर होल्डिग तय करने की बात हो इस पर सरकार को वाकई गंभीरतापूर्वक विचार करने की जस्रत है क्योकि किसी भी समुदाय के व्यक्ति के लिए आत्मसम्मानपूर्वक जीवन-यापन के लिए रोटी, कपड़ा और मकान के साथ-साथ आत्मसम्मान भी जरूरी है । छत्तीसगढ़ राज्य सांस्कृतिक वैषिष्टयता वाला प्रदेष है जहां की आदिवासी संस्कृति अपने आप में विषिष्टता लिए हुए है छत्तीसगढ़ के  लोकनृत्य जैसे नाचा, पंडवानी, गम्मत नृत्य, दंडामी नृत्य, मांदरी लोकनृत्य, रेला, ददरिया जैस लोकगीत, गोधना कला आदिवासी चित्रकला तथा आदिवासी लोककलाओ जैसे काष्ठ कला, ढोकरा कला ,षिल्पकला, चित्रकला आदि को उनसे जुड़ी तमाम विधाओं के साथ सहेजनेे की सबसे ज्यादा जरूरत है, क्योकि लोककलाओं को बचाना है और उन्हें जीवनोपयोगी रखना है तो उनके साथ जुड़े संस्कारों को भी बचाना होगा, तभी लोककलाओं को उसकी आत्मा के साथ बचाया जा सकता है। तभी छत्तीसगढ़ राज्य की सांस्कृतिक वैशिष्टयता को संरक्षित करने में हम सफल हो पायेंगे।
छत्तीसगढ़ के इन पारंपरिक लोककलाओं, लोकनृत्यो व लोकगीतों के विकास तथा संवर्धन हेतु हमारे विभिन्न विष्वविद्यालयों द्वारा संचालित पाठ्यक्रमों में स्थान देने की जरूरत है, तथा विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी गोंडी, हल्बी, भतरी जैसी बोलियों को संरक्षित करने के आदिवासी भाषा व लोककला संस्थान स्थापित करने के प्रयास किये जाने की आवष्यकता है, क्योकि ये आदिवासी बोलियां, ये लोककलाएं, ये नृत्य, ये चित्रकला तथा मूर्तिकला हजारों वर्षों के अनुभवों को अपने में संचित तथा समाहित किये हुये हैं। सरकार द्वारा  आदिवासी लोककला संग्राहलयों, सांस्कृतिक केन्द्रों, लोकसंगीत नाटक अकादमी तथा लोककला वीथिका की स्थापना किये जाने की आवष्यकता है, जिससे लोगों में इन विलुप्त हो रही लोककलाओं के प्रति जागरूकता पैदा हो सके तथा साथ-साथ इसका भी ख्याल रखा जाना आवश्यक है कि बड़ी तेजी से उभरते महानगरीय संस्कृति की चकाचौंध का प्रभाव इन लोककलाओं पर न पडे । लोककलाओं को आज व्यवसाय का माध्यम बनाने हेतु भी आवष्यक कदम उठाने की जरूरत है जिससे इन विधाओं से जुड़े लोककलाकारों को आजीविका के साधन उपलब्ध हो सकेंगे तभी छत्तीसगढ़ का सही मायने में विकास हो पायेगा। 
आज भारत जैसे विकासषील देष की अगर बात करें तो भारत में लगभग 70 प्रतिषत जनता अभी भी गांवों में निवास करती है और जहां ं साक्षरता का प्रतिषत भी  अमूमन यही दिखलाई पड़ता है। अन्य विकसित देष जैसे अमेरिका, रूस, जापान तथा चीन की अगर बात करें तो वहां भी आधारभूत विकास पर ज्यादा ध्यान दिया गया तथा सामुदायिक सहभागिता के आधार पर ही विकास के नये कीर्तिमान स्थापित किये गये, इसलिए आधारभूत विकास व सामुदायिक सहभागिता के सिद्धांत के बिना कोई भी देष विकास की ओर अग्रसर नहीं हो सकता है।नक्सलवाद आज छत्तीसगढ़ जैसे शांत और सौम्य राज्य के लिए ही नही बल्कि समूचे भारत देष के लिए नासूर बनता जा रहा ह,ै इस नक्सलवाद ने न जाने कितने बेगुनाहों को मौत के मुंह में धकेल चुका है ? न जाने कितनीं महिलाओं को विधवा बना चुका है ? न जाने इस नक्सलवाद से कितने बच्चों को अनाथ कर दिया ? कितनों के घर तबाह हो गये ? और ये मौत का तांडव थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। न जाने ये सिलसिला कब तक एैसे ही चलता रहेगा ? सुंदर और शांत बस्तर आज नक्सली हिंसा के कारण युद्धभूमि में तब्दील हो गया है, आये दिन न जाने कितने आदिवासियों की हत्यायें हो रही है या फिर कितने लोग अगवा कर लिये जा रहे है। स्कूलों की बात तो छोडि़ये बस्तर में अब तक 8 हजार गांवों का नामोनिषान मिट चुका हैं, 60 हजार आदिवासी अस्थाई केम्पों में बदहाल जीवन जीने को मजबूर हैं लाखों लोग बेघर हो गये हैं । पर इसका सकारात्मक हल हम सबको मिलकर ही ढूढना होगा। नही तो आने वाली पीढ़ीयां हमें कभी माफ नहीं कर पायंेगी। नक्सलवादियों और माओवादियों के द्वारा की जाने वाली हत्याओं का सिलसिला अभी भी जारी है। अभी हाल ही में उन्होंने छत्तीसगढ़ में माझीपारा, से सुकमा के कलेक्टर श्री एलेक्स पॉल मेनन को अगुआ किया था तथा उनके दो सुरक्षाकर्मियों की बीच बाजार में हत्या कर दी ।तथा इस घटना से एक महीने पहले उड़ीसा से युवा विधायक को अगुआ किया था जिसे बड़ी मषक्कत के बाद छोड़ा गया। माओवादियों के द्वारा 2005 से अब तक वे 2670 से भी ज्यादा लोगों की हत्या कर चुके हैं जिनमें 1680 से भी ज्यादा ग्रामीण व दूसरे लोग हैं और 1000 से अधिक सुरक्षा बलों के जवान शामिल हैं। 2010 में ही अगस्त तक माओवादी 460 से ज्यादा लोगों की हत्या कर चुके हैं जिनमें से सुरक्षा बलों के 167 जवान हैं और बाकी सामान्य नागरिक जिनमें वे ग्रामीण भी शामिल हैं जिनके बारे में उन्हें शक था  िक वे पुलिस के खबरी हैैं। लाल आतंक से ग्रस्त राज्यों में छत्तीसगढ में माओवादी सबसे ज्यादा सक्रिय हैं। वहां उन्होंने सुरक्षा बलों के सबसे ज्यादा जवानों को मारा है। उसके बाद पष्चिम बंगाल का नंबर आता है । इसके बाद ओड़ीसा है और फिर झारखण्ड और बिहार। 2009 में माओवादियों और नक्सलवादियों की हिंसा में करीब 1000 लोगों की मौत हुई है। इस आंकड़े में 392 नागरिक, 312 सुरक्षाकर्मी और 294 नक्सलवादी शामिल हैं। 2008 में उन्होंने 210 नागरिकों व 214 सुरक्षाकर्मियों को मारा जबकि 214 माओवादी भी मारे गये। टाईम्स ऑफ इंडिया के लिए आई एम आर बी द्वारा तेलांगाना के माओवादी ग्रस्त जिलों में किये गये एक सर्वे से हैरतअंगेज खुलासे हुए है। ये वही जिले हैं जहां कभी नक्सलियांे का बोलबाला हुआ करता था। आंध्रप्रदेष में नक्सल समस्या पर सरकार मानती है कि यहां समस्या पर काबू पाया जा चुका है लेकिन सरकार को अब तक इस बात की खबर नहीं है कि लोगों के दिलों में नक्सली ही राज कर रहे है। इस सर्वे में शामिल 58 प्रतिषत लोगों का मानना है कि नक्सलियों से ज्यादा सरकार उनके लिए बुरी साबित हुई है। करीब 50 प्रतिषत लोगों ने साफ कहा कि नक्सलियों के डर से सरकार पर दबाव बना  िकवह राज्य में विकास कार्य करें । केवल 34 प्रतिशत लोगों ने माना कि राज्य से नक्सलियों का प्रभाव कम हो जाने के बाद से उनके जीवन स्तर में सुधार हुआ है। हैरत की बात तो यह है कि सर्वे में शामिल करीब 60 फीसदी लोगों ने नक्सलियों के मुठभेड़ में मारे जाने के दावों को फर्जी बताया। इन लोंगों का मानना है कि उन्हें इन मुठभेड़ों की सचाई पर संदेह है। केवल 34 प्रतिषत लोगों ने सुरक्षा एजेंसियों द्वारा नक्सलियों को मार गिराने को सहीं माना जबकि 60 प्रतिषत लोगों ने इसे गलत ठहराया।
योजना आयोग के भूतपूर्व सदस्य एवं नेशनल एडवायजरी काउंसिल (राष्ट्रीय सलाहकार परिषद) के वर्तमान सदस्य श्री एन. सी. सक्सेना द्वारा एक साक्षात्कार के दौरान कहा कि विकास की रफ्तार में कहीं न कहीं आदिवासियों के हितों की अनदेखी की जा रही है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देष में हो रहा विकास आदिवासियों को संपन्न न बनाते हुए उनका नुकसान कर रहा है, घर से बेदखल होने के बाद आदिवासियों का व्यवस्थापन सहीं रूप से न होना विकास के प्रति कू्रर मजाक है, वन संपदाओं का उपयोग जहां व्यावसायिक मुनाफे के लिए हो रहा है, इसके साथ ही वन से जुड़े आदिवासियों के हितों का संरक्षण नहीं किया जा रहा है, एसी स्थिति में आदिवासियों में असंतोष बढ़ रहा है। यह उल्लेखनीय है कि श्री सक्सेना द्वारा उड़ीसा के कालाहांडी जिले के नियामगिरी क्षेत्र में पर्यावरण की सुरक्षा के कारण तथा उनसे जुड़े आदिवासियों के हितों को ध्यान रखकर बेदांत परियोजना को नामंजूर करने की सिफारिश की गई थी, जिसके पश्चात राजनीति में उथल-पुथल मची हुई है, यदि विकास का अर्थ मानव जीवन को स्वस्थ बनाना है तो किसी थी परियोजना में आदिवासी हितों का संरक्षण एक प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए और यदि आदिवासियों के हितों की तिलांजली देकर पूंजीपति प्रेरित मुनाफे को महत्व देते हुए विकास की परिकल्पना की जाती है तो उसका तीव्र विराध खास तौर पर किया जाना समय की पुकार है।
नक्सल पीडि़त क्षेत्रों में आदिवासियों के लिए निर्धारित पैसों में से कितना पैसा खर्च हो पाता है। एक अनुमान के अनुसार भ्रष्टाचार देष पर हर साल 2,50,000 करोड़ रूप्ये से ज्यादा का बोझ डाल रहा है। यह सरकारी पैसा बड़ी संख्या में गरीबों के पास पहंुचना था, लेकिन भ्रष्ठ लोगों की जेबों में पहुंच रहा है। 2009 में लोकसभा चुनाव में 10000 करोड़ रूप्ये की रकम खर्च हुई थी जिसमें से 1300 करोड़ रूपये चुनाव आयोग द्वारा, 700 करोड़ रूपये केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा, 8000 करोड़ राजनीतिक पार्टियों और 543 सीटों के उम्मीदवार द्वारा खर्च किये गये थे। 
संयुक्त राष्ट्र संघ के ताजे रिपोर्ट बतलाते हैं कि दुनिया एक बार फिर खाद्यान्न संकट के मुहाने पर खड़ी है। भारत जैसे विकासषील देषों में हर साल खाद्यान्न के दाम करीब 15 फीसदी तक बढ़ रहे हैं। ‘‘युनाइटेड नेषन वर्ल्ड फूड प्रोग्राम‘‘ का कहना है कि पूरे दुनिया में भूखे लोगों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है । इन दिनों मंहगाई लोगों का जीवन मुष्किल बना दिया है। मगर जब सट्टा बाजार में कमोडिटी (वस्तुओं) के दाम बढ़ते हैं तो बाजार से जुड़े लोग मुनाफा काटते हैं। मुनाफाखोरी का यह खेल खाद्यान्न संकट का अहम कारण है। संयुक्त राष्ट्र संघ के विषोषज्ञों का मानना है कि कमोडिटी मार्केट का खेल ही दुनिया में भूख व खाद्यान्न संकट तेजी से बढ़ा रहा है। यूएन विषोषज्ञों के अनुसार दुनिया भर में पेंषन, बड़ी निधियां व बड़े बैंकों ने भारी मात्रा में जिस कमोडिटी बाजार में पैसा लगाया है इसके चलते खाद्यान्न के मामले में अस्थिरता बढ़ रही है।यूएनडीए के रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में 2 करोड़ 20 लाख मीटिक टन अनाज की कमी है। पूरी दुनिया में एक तरफ विकास का ढिंढोरा पीटा जा रहा है वहीं एक बड़ी आबादी को पेट भर खाना तक नसीब नहीं है। इन सभी मानव निर्मित समस्याओं के समाधान के उपाय हमे अब तलाषने ही होंगे।
आज अगर हम विकास की बात करते हैं तो उस विकास में सिर्फ सिमित लोगों का विकास ही शामिल हैं, संपन्नता की पहुंच सिर्फ कुछ ही लोगों तक सिमित है और देष की बाकी जनता उसी बदहाल जीवन जीने के लिए मजबूर है, देष की आजादी के 65 वर्ष पूर्ण करने के बाद भी साक्षरता का लक्षित दर अभी तक हासिल नही किया जा सका है, यूनेस्को के ताजे आंकड़े बताते हैं कि भारत अभी तक मात्र 65 फीसदी साक्षरता का दर हासिल कर सका है, जो कि लक्ष्य से कोसो दूर है। 
ग्रामीण भारत की समस्याओं को प्रखर ढंग से उठाने वाले व मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्रकार पी. साईंनाथ ने भी मीडिया के कारपोरेटीकरण की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए पिछले दिनों कहा था कि पिछले कुछ वर्षो से यह देखा जा रहा है कि, मीडिया आम आदमी से दूर होते चले जा रहे हैं, और पत्रकारों की नौकरी भी इसमें काफी असुरक्षित हो गई है। पिछले दो वर्षों में देशभर में करीब 3 हजार से अधिक पत्रकारों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी है। इसका सबसे बड़ा कारण मीडिया का बाजारवाद के प्रति बढ़ती आस्था है। आज मीडिया विज्ञापन, बालीवुड और कारपोरेट घराने तक सीमित हो गया है। वह कुछ वर्षों से इतना व्यावसायिक होता जा रहा है कि खबरों की खरीद फरोख्त से नहीं बच सकता। आजादी के बाद इतना बड़ा कृषि संकट देश में पैदा नहीं हुआ था आर्थिक मंदी के दौर में 5 करोड़ लोगों ने अपनी नौकरी गंवाई लेकिन मीडिया के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है । अधिकतर अखबारों में कृषि तथा आम जनता से जुड़े मुद्दों को कवर करने के लिए पूर्ण कालिक पत्रकार नहीं है। यहां तक कि अंग्रजी के दो बड़े अखबारों में तो रिसेषन, आर्थिक मंदी के इस्तेमाल पर रोक लगी है। कारपोरेट जगत ने मीडिया का अपहरण कर लिया है। उन्होंने कहा कि आज मीडिया में आदिवासियों और दलितों का एक भी प्रतिनिधित्व नहीं है। आज भुखमरी, गरीबी, नक्सली हिंसा के सवाल गौंण होकर रह गये है। आज नक्सलवाद चरम पर है देष में इस पर बहस तो खूब हो रहे हैं राष्ट्रीय गोष्ठियां आयोजित की जा रहीं है कि आखिर इन सबका निदान कब तक संभव है।

लेखक परिचय- लेखक डॉ. आशुतोष मंडावी कुषाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विष्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ़ के स्थापना से ही जुडे़ हुए हैं और वर्तमान में विज्ञापन एवं जनसंपर्क अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं। आपकी सामाजिक मुद्दों पर आधारित लेखन में गहरी रूचि है समय-समय पर आपके लेख विभिन्न पत्र-पतिकाओं प्रकाषित होते रहते हैं।