Tuesday, December 2, 2025

गुरु तेग बहादुर सिंह जी को नमन्

शहीद हुए जो माँ के खातिर, जीते थे जो शर्तों पे। 
गुरु तेग बहादुर जन्मा था जो, अमृतसर की धरती में।। 
झुके नहीं वो लड़ते थे, अपनी अंतिम सासों तक, 
अभी निकलना बाकी है इतिहास के परतों से।। 
पांच भाई को लेकर जिसने, हुआ रवाना दिल्ली को, 
पकड़ ना आया फिर भी वो औरंगी फर्मानी से। 
मतिदास को रेता जिसने, मुगलों की उस आरी से। 
भाई दयाला को जिसने बीच चौक पर उबाला था। 
सतीदास को उन मुगलों ने, रुई लपेट जलाया था। 
दिया यातना था मुगलों ने, अपने मजहब लहराने को, 
पर डिगा ना पाए, झुका ना पाये उन वीरों को, 
जो मातृभूमि पर हँसते हँसते शीश चढ़ाने जाते थे।। 

किया कैद था गुरु तेग को, शूलों के एक पिंजरे में। 
दिया यातना था फिर भी, वह वीर जो ना डोला था। 
किया वार था, एक प्रहार था, उस मुगली तलवारों ने। 
कर दिया अलग गुरु तेग को फिर से, फेका था चौराहों में। 
टुकड़े टुकड़े अंगों को, टांगा था दीवारों में। 
नहीं उठाना शीश गुरु का, ऐसा औरंगी फर्मानी था। 
धड़ के टुकड़ों को भी उसने, नहीं बक्शा था मुगलों ने। 
वीर हुआ धरती पर ऐसा, शीशगंज के गुरुद्वारे में। 
हुआ दुबारा दाह गुरु का, सुना कहीं इतिहासों में। 
हुए वीर बहादुर ऐसे, रहेंगे सदा एहसासों में। 
बन प्राणवायु गुरु तेग बहादुर, सदा रहेंगे सासों में। 
बन गये मिशाल अब तेग बहादुर, लोगों के विश्वाशों में।। 
लोगों के विश्वाशों में।। 

वीर रानी, राज रानी, अबक्का अबक्का।।

वीर अबक्का की गाथाएँ, 
बहुत सुनी कथाओं में। 
कुंदन बन चमकी थी वो, 
उस जलती ज्वालाओं में।। 
शहीद हुई जो सबसे पहले, 
नहीं लिखा इतिहासों में। 
हुए 500 आज जनम के, 
जो जीवित है विश्वासों में।। 

पूर्तगालों की सेना ने, 
जब वार किया था 55 में। 
हरा ना सके थे फिर भी रानी को
वीरता की जो मिशाल थी। 
डटकर किया सामना था जिसने, 
साख बचाने उल्लाल की। 
साख बचाने उल्लाल की।।
शहीद हुई जो सबसे पहले, 
नहीं लिखा इतिहासों में। 
हुए 500 आज जनम के, 
जो जीवित है विश्वासों में।। 


सन् 58 में भी उसने 
रानी को जब घेरा था। 
झुकी नहीं वो रानी फिर भी, 
पूर्तों को जिसने खदेड़ा था।
शहीद हुई जो सबसे पहले, 
नहीं लिखा इतिहासों में। 
हुए 500 आज जनम के, 
जो जीवित है विश्वासों में।। 


भेद रहा था सागर तट को, 
भारत में घुस आने को। 
उल्लालों की सेना लेकर, 
निकल पड़ी भगाने को। 
सन् 67 में पूर्तों ने, 
फिर से हमला डाला था। 
दिया करारा उन पूर्तों को, 
निकले थे जो कब्जाने को।। 
शहीद हुई जो सबसे पहले, 
नहीं लिखा इतिहासों में। 
हुए 500 आज जनम के, 
जो जीवित है विश्वासों में।। 

बार बार के हमलों ने भी, 
झुका ना पाये रानी को, 
अग्निबाण से उस रानी ने, 
पूर्तों को जब घेरा था। 
वीर बहादुर शौर्य पराक्रम, 
लड़े बहुत सीमाओं में। 
किया वार जब तुलुनाडु में, 
उस पूर्ति सेनाओं ने। 
नहीं टूटने दिया मान को
झुका ना पाये रानी को। 
टूटी नहीं अबक्का फिर भी
ऐसी माँ भवानी थी।। 
शहीद हुई जो सबसे पहले, 
नहीं लिखा इतिहासों में। 
हुए 500 आज जनम के, 
जो जीवित है विश्वासों में।। 

नौका डूबी नाव भी डूबा, 
उल्लाली सेनानी का, 
शत् शत् वंदन् करे ये धरती, 
वीर अबक्का रानी का। 
वीर अबक्का रानी का।। 

शहीद हुई जो सबसे पहले, 
नहीं लिखा इतिहासों में। 
हुए 500 आज जनम के, 
जो जीवित है विश्वासों में।। 

Saturday, November 22, 2025

चार घोड़े चालीस मील

वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।। 

लहू से था लतपथ, रास्ता भी लहू था, 
लहू थी वो गलियाँ, वो चौक भी लहू था। 
छोटी सी धोती में, वो गोरों को तरेरता, 
वो देख भी रहा था, तो आँख भी लहू था। 
पेड़ पर जो लटका, पर झुकता नहीं था। 
वही था, वही था, ये तिलका वही था।। 
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।। 

हमें याद है, हम ये भूले नहीं हैं, 
सिक्खों की वीरता पर, डायर की वो गोलियां
जलिया के बागों में, खून की वो होलियाँ
सन् तेरह की होली को, हमनें भुलाया कहाँ हैं। 
लहू के निशानों को, हमने मिटाया कहाँ है। 
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा। 

मानगढ़ की पहाड़ी पर, आस्था जो चली थी
भीलों के हुज़ूमों में, भिलनियाँ भी खड़ी थी। 
गोरों की तोपों ने  आगें जो उगली। 
आगस्टस की बंदूक से गोली जो निकली। 
पड़ी थी वहाँ बहनें, माताएँ पड़ी थी। 
लाशों के ढेर  में वो बिखरी पड़ी थी। 
भीलों की धरती पर आज मौत फिर खड़ा था। 
पड़ी थी जो लाशें, उसमें दुधमुहाँ पड़ा था। 
उसमें दुधमुहाँ पड़ा था।। 

मानगढ़ की पहाड़ी पर, आस्था का था वो मेला। 
भीलों के हुज़ूमों में था, वीरों का वो रेला। 
गोरों की तोपों ने जब, उगली थी आगें। 
आगस्टस की गोली ने, रोकी थी सांसें। 
पड़ी थी जो लाशें, उसमें दुधमुहाँ पड़ा था। 
पड़ी थी जो लाशें उसमें दुधमुहाँ पड़ा था। 
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।। 

द्वार भी खुले थे, बोले थे फिर भी, 
आती थी उसमें, हजारों की टोलियाँ। 
भागे नहीं थे, आखिर में फिर भी, 
भीलों ने खेली थी, खूनों की होलियाँ। 
भीलों ने खेली थी, खूनों की होलियाँ।। 
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।। 

रांची के जेलों की यातना, हमें याद है। 
चालकंद की वो दुष्टता, हमें अब भी याद है। 
याद है हमें, हमारी मातृभूमि को हमसे छीनना। 
पर डिगा कहाँ सके तुम, डिगाने से तनिक भर, 
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।। 

चूड़ियों की खनक, हम सभी ने सुनी है। 
पायलों की झंकार भी, हम सभी ने सुना है। 
सुनाता हूँ आज मैं, जो कभी ना सुना है। 
जेलों के बेड़ियों में, होती है खनक भी, 
बिरसा के बेड़ियों की वो, खनक हमने सुनी है।।
बिरसा के बेड़ियों की वो, खनक हमने सुनी है।।
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।। 

पड़ा था जब सूखा, उस सोने के खान में। 
गोरों ने मांगा था था, फिर भी लगान में। 
लटका के रखा था, दस दिन तक उसको। 
कर दिया न्यौछावर
इस मिट्टी के खातिर उसने अपना शरीर......... 
प्रजा को बचाने जो निकला था वीर। 
प्रजा को बचाने जो निकला था वीर।। 
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।। 

लड़ा था मेरा देश, सारा समाज भी लड़ा था। 
गोंड भी लड़े थे, मुंडा भी लड़ा था। 
संथाल भी लड़े थे, परलकोट भी लड़ा था। 
रमोतिन मढ़ीया भी लडी थी, धुरुआ राम भी लड़ा था। 
जगरतन भरता भी लड़ा था, वीर झाड़ा सिरहा भी लड़ा था। 
हरचंद् नायक भी लड़ा था, सुखदेव पातर हलबा भी लड़ा था। 
चिंतु हलबा भी लड़ा था, डेबरी धुर लड़ी थी। 
लड़ा था वो गुंडाधुर भी, मेरे देश के सम्मान में। 
बस्तर के वो वीर थे, हो गये शहीद वो, 
महान भूमकाल में, महान भूमकाल में।। 
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।। 

एक था महान हुआ, बस्तर की जमीन पर, 
आंच को ना आने दिया, पुरखों की जमींर पर। 
बचा के रखा था जिसने, परलकोट की उस थाती को, 
ठाकुर गैन्दसिंग था नाम जिसका, 
छूने ना दिया अंतिम सांस तक जिसने, 
बस्तर की उस पवित्र माटी को। 
बस्तर की उस पवित्र माटी को।। 
वो खंजर भी देखा, वो मंजर भी देखा, 
वो वीरों का सैलाब था, वो रुकता कहाँ था। 
नहीं मिटा सके, तेरे मिटाने से तनिक भी। 
हमने वो लहू का, समंदर भी देखा।। 




Sunday, September 28, 2025

Chhattishgarh Gondwana Gond Mahasabha

छत्तीसगढ़ गोंडवाना गोड महासभा के सौजन्य से व्यापार मेला का दो दिवसीय आयोजन दिनांक 21 व 22 दिसंबर 2024 को नागारची सामाजिक भवन रायपुर छत्तीसगढ़ में किया गया। जिसमे मुझे भी सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला।
इस प्रकार के आयोजन #सामाजिक_स्वावलंबन की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। सभी आयोजकों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
व्यापार मेला

जनजाति गौरव समाज

जनजाति गौरव समाज जगदलपुर जिले के तत्वावधान में भगवान् बिरसा मुण्डा जी के 150 वीं जयंती पर जनजाति गौरव दिवस का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित होने का मौक़ा मिला। कार्यक्रम में जनजाति समाज के गौरवशाली अतीत, बस्तर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों जैसे #वीरनारायण_सिंह, #शहीद_गुण्डाधुर, #गैन्द_सिंग, #रामाधीन_गोंड, #धुरवाराम_मड़िया,#रमोतिन_माड़िया, #वीर_झाड़ा_सिरहा, #जागरतन_भतरा, #हरचंद_नाइक, #सुखदेव_पातर_हल्बा, #चिंतु_हल्बा, #डेबरी_धुर के योगदान पर तथा देश के प्राकृतिक संसाधन, खनिज संसाधन व वन संसाधन कहे जाने वाले #जल #जंगल व #ज़मीन को अपने संघर्षों से संरक्षित व सुरक्षित रखने में जनजाति समाज के योगदान पर व जनजातीय ज्ञान परंपरा के बारे में बात करने का मौक़ा मिला। इस कार्यक्रम ने विशेष रूप से जनजाति गौरव समाज के प्रांत संरक्षक के रूप में #छत्तीशगढ़_राज्य_के_कैबिनेट_मंत्री_श्रीमान_केदार_कश्यप जी, संत आर्शीवचन के निमित्त #वासूदेव_जी_महाराज ( #अलेख_महिमा) , #श्री_विनायक_गोयल_जी_विधायक_चित्रकूट, संभाग अध्यक्ष श्री #तुलूराम_जी, संभाग उपाध्याय श्री #परिस_राम_बेसरा, जिला अध्यक्ष श्री #संतोष_नाग जी एवं #समरसता की दृष्टि को ध्यान में रखते हुए अन्य सगा-समाजों के 40 अध्यक्षों को आमंत्रित किया गया था।
कार्यक्रम में भगवान् बिरसा मुण्डा जी का पुजा अर्चना करके भगवान बिरसा मुंडा चौक के लिये प्रस्तावित भूमि का भूमि पुजन किया गया। जनजाति गौरव दिवस कार्यक्रम में कैबिनेट मंत्री श्रीमान केदार कश्यप जी के द्वारा मंच से दो प्रकार का घोषणा किया गया जिसमें पहला जगदलपुर के पी जी महाविद्यालय चौक को अब से #बिरसा_मुण्डा_चौक से जाना जायेगा तथा दूसरा अगले वर्ष 15 नवम्बर 2025 को भगवान बिरसा मुण्डा जी की आदमकद मूर्ति का अनावरण जायेगा। जनजाति गौरव समाज जगदलपुर के सभी सगाजनों को हार्दिक शुभकामनाएँ।

Sunday, September 21, 2025

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय द्वारा रविवार को अपना पहला पूर्व छात्र सम्मेलन आयोजित किया।

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय द्वारा रविवार को अपना पहला पूर्व छात्र सम्मेलन आयोजित किया। छत्तीसगढ़ राज्य के 25वें वर्षगांठ समारोह के हिस्से के रूप में विश्वविद्यालय के कठाडीह परिसर में आयोजित यह एक ऐतिहासिक कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम में 2007 से लेकर 2025 तक के 100 से अधिक पूर्व छात्र शामिल हुए।
मुख्य अतिथि और कुलपति महादेव कावरे (आईएएस) ने इस सम्मेलन को विश्वविद्यालय के इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण बताया। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह आयोजन पूर्व छात्रों और उनके विश्वविद्यालय के बीच मजबूत संबंध स्थापित करेगा, जिससे विश्वविद्यालय समृद्ध होगा और आजीवन संबंध मजबूत होंगे।
कुलसचिव सुनील कुमार शर्मा ने भी पूर्व छात्रों से उनके सहयोग की अपील की। उन्होंने नवगठित पूर्व छात्र संघ को अपने योगदान के माध्यम से विश्वविद्यालय की प्रगति में मदद करने के लिए सकारात्मक कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित किया।
कार्यक्रम का एक मुख्य आकर्षण "एक पेड़ माँ के नाम" शीर्षक से वृक्षारोपण अभियान था। प्रत्येक पूर्व छात्र ने परिसर में एक पौधा लगाया, जो विकास, स्मृति और स्थिरता का प्रतीक था। प्रतिभागियों को परिसर का एक निर्देशित दौरा भी कराया गया, जिसमें टीवी स्टूडियो, रेडियो स्टेशन, पुस्तकालय और छात्रावास शामिल थे।

Thursday, September 18, 2025

मंजिल

अनजान मुशफिर तुम भी हो, 
अनजान मुशफिर हम भी हैं.
अनजान डगर ये क्या जाने, 
रस्ते पे कहीं एक मंजिल भी है.

सरिता की धारा को हमने, 
क्या यूँ ही बहते देखा है.
जल की धारा क्या जाने है, 
इस रस्ते पे कहीं मंजिल भी है.

अनजान निशाना को आखिर, 
कब तक यूँ ही साधोगे.
तीर बेचारा क्या जाने,
कहीं तुम्हारी मंजिल भी है.

यौवन

जितने यौवन हो गये तुमसे, 
उतने यौवन बीते होंगे.
हर यौवन मे सावन आये, 
उतने यौवन मीठे होंगे.

अथक प्रशंसा ना हो मुझसे, 
फिर भी सावन मीठा होगा.
तेरा यौवन जैसे सावन, 
श्रृंगार सामने झूठा होगा.

तेरे यौवन की तरुणाई, 
जैसे सावन घिर घिर आई. 
यौवन को तुम पल्लवित करना, 
वरना साजन रूठा होगा.

Wednesday, September 17, 2025

सफलता

परिस्थितियों की धूप-छाँव में,
राहें बनतीं अपने आप में।
सफलता कोई संयोग नहीं,
यह विज्ञान है—नियम यही।
बीज मिले तो अंकुर फूटे,
मेहनत से ही सपने छूटे।
जब घटक सब जुड़ जाते हैं,
निश्चित फल तब आ जाते हैं।
संघर्षों से मत डर जाना,
हर नियम को अपनाना।
परिस्थितियाँ जब साथ मिलेंगी,
सफलता निश्चित हाथ आएगी।

Tuesday, September 16, 2025

चिड़ियों से बात करता हूँ।

जंगल के किनारे एक गाँव है, 
नदी है पेड़ है पहाड़ है। 
पेड़ पर पक्षियाँ हैं, 
पक्षियों की चहचहाहट है। 
कभी कभी मै चिड़ियों से बात करता हूँ। 

घर पर गाय है बैल है भैंस है
घर की रखवाली के लिए एक कूत्ता है
सभी मेरे से दोस्त हैं।  
पास ही एक जंगल है
साल है साजा है डुमर है। 
और भी ना जानें कितने अनगिनत पेंड़ है
मैं पेड़ों की पूजा करता हूँ। 
जो मेरे गाँव की हर ज़रूरत पूरी करते है। 
गाँव मे एक तालाब है
हम सभी साथ में तालाब जाते हैं। 

इन्ही से है मेरा जीवन
इनके बिना मैं कुछ भी नहीं।। 
धरती, नदियाँ, पेड़ मेरे पुराने साथी हैं
हम सबका रिश्ता है अटूट है, अमर है
जल जंगल जमीन, जन और जानवर।
इन पाँच चीजों मे बसती मेरी आत्मा है।। 

संवेदना

पशु पक्षियों की आवाज़ें 
उनके संचार और व्यवहार का हिस्सा हैं, 
पेड़ पौधों की बातें अक्सर 
हमें सुनाई देतें हैं। 
वे अपनी भाषा में हमसे बात करते हैं
हम सभी पहले कभी साथ रहते थे। 
साथ साथ बड़े होते थे। 
वो मुझसे प्रेम करते थे। 
मैं उनके लिये कुछ भी करने के लिए तैयार था। 
आज हम अलग अलग हो गये हैं। 
मैं उनके साथ नहीं रहता। 
वो मुझसे प्रेम भी नहीं करते। 
संवेदना तो बहुत है पर
आज मैं उनके लिए कुछ नहीं कर सकता। 
बस जो कर सकते हैं उनको
 मैं देख सुन व पढ़ ही सकता हूँ
इन अखबारों के माध्यम से। 

गोटुल

गोटुल
मानव जीवन की पहली पाठशाला हूँ
 मैं गोटुल हूँ
मानव मूल्यों, संस्कारों तथा आचार विचार व
व्यवहार को गढ़ने का काम किया है। 
मैंने भारतीय ज्ञान परंपरा को विकसित 
करने का काम किया है।
लोकसंगीत को सुरों में पिरोया है। 
लोकगीतों को विस्तार दिया है।
लोकनाट्य, लोककला जैसे विधा को 
एक आयाम दिया है। 
आज दुनियाँ में सुर संगीत की पहली पाठशाला रही हूँ मैं। 
दुनिया के ज्ञान परंपरा की संवाहक हूँ मैं। 
आदिम युग से मशीन युग तक ले सफर को देखा है मैंने। 
आदिम मानव से रोबोट मानव तक यात्रा का साक्षी होने का गौरव मुझे प्राप्त है। 
मेरी पाठ शाला में मानव मन मे संवेदना पहली जरूरत होती थी। 
पर आज के रोबोट मानव मे इंटलीजेंसी पहली जरूरत हो गई है। 

Sunday, September 14, 2025

मैं बातें नहीं करता।

पशु पक्षियों की आवाज़ें 
उनके संचार और व्यवहार का हिस्सा हैं, 
पेड़ पौधों की बातें अक्सर 
हमें सुनाई देतें हैं। 
वे अपनी भाषा में हमसे बात करते हैं
हम सभी पहले कभी साथ रहते थे। 
साथ साथ बड़े होते थे। 
वो मुझसे प्रेम करते थे। 
मैं उनके लिये कुछ भी करने के लिए तैयार था। 
आज हम अलग अलग हो गये हैं। 
मैं उनके साथ नहीं रहता। 
वो मुझसे प्रेम भी नहीं करते। 
संवेदना तो बहुत है पर
आज मैं उनके लिए कुछ नहीं कर सकता। 
बस जो कर सकते हैं उनको
 मैं देख सुन व पढ़ ही सकता हूँ
इन अखबारों के माध्यम से। 

एक गाँव है।

जंगल के किनारे एक गाँव है, 
नदी है पेड़ है पहाड़ है। 
पेड़ पर पक्षियाँ हैं, 
पक्षियों की चहचहाहट है। 
कभी कभी मै चिड़ियों से बात करता हूँ। 

घर पर गाय है बैल है भैंस है
घर की रखवाली के लिए एक कूत्ता है
सभी मेरे से दोस्त हैं।  
पास ही एक जंगल है
साल है साजा है डुमर है। 
और भी ना जानें कितने अनगिनत पेंड़ है
मैं पेड़ों की पूजा करता हूँ। 
जो मेरे गाँव की हर ज़रूरत पूरी करते है। 
गाँव मे एक तालाब है
हम सभी साथ में तालाब जाते हैं। 

इन्ही से है मेरा जीवन
इनके बिना मैं कुछ भी नहीं।। 
धरती, नदियाँ, पेड़ मेरे पुराने साथी हैं
हम सबका रिश्ता है अटूट है, अमर है
जल जंगल जमीन, जन और जानवर।
इन पाँच चीजों मे बसती मेरी आत्मा है।। 


Saturday, September 13, 2025

प्रेम संगीत

मिलना और बिछुड़ना हर पल
प्रेम यही है प्रीत यही है, 
हार किसी का जीत किसी की
जीवन की तो रीत यही है।। 

सुख की इच्छा सब कोई चाहे, 
दुख की चाह करे ना कोई। 
सुख- दुख के जो फेर ना पड़ता, 
जीवन का तो ध्येय यही है।। 

रात अंधेरी, दिन है उजाला, 
जीवन का है यही फसाना। 
धूप छाव के फेर ना पड़ना, 
जीवन का संगीत यहीं हैं।। 

मिलना और बिछुड़ना हर पल
प्रेम यही है प्रीत यही है, 
हार किसी का जीत किसी की
जीवन की तो रीत यही है।।